Bihar Politics: उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा को बीजेपी में विलय करने के दबावों के बीच सात महीने की बड़ी राहत मिल गई है, क्योंकि पार्टी के नेता और गठबंधन सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश को 5 अगस्त को विधान परिषद के लिए मनोनीत किया गया है। इसके चलते ही आरएलएम प्रमुख और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली कैबिनेट में मंत्री के रूप में अपना कार्यकाल जारी रखेंगे।

एमएलसी के तौर पर उनका कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त हो जाएगा, उसी दौरान 12 सीटें रिक्त हो जाएंगी। इसके चलते बीजेपी और उसके सहयोगी के बीच गहन वार्ता का एक नया दौर शुरू होने की संभावना है। बीजेपी नेता देवेश कुमार द्वारा अपना कार्यकाल पूरा होने से सात महीने पहले अपने पद से इस्तीफा देने के बाद दीपक प्रकाश एमएलसी बने हैं।

6 महीने तक मंत्री के तौर पर रहे

दीपक प्रकाश ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल के बीच 22 दिनों का अंतराल था। लगभग छह महीने तक मंत्री के रूप में कार्य किया, जबकि उनके पास किसी भी सदन में कोई सीट नहीं थी। पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर जवाब देने के लिए कहा गया था। अब जब आरएलएम नेता दीपक प्रकाश राज्य एमएलसी बन गए हैं, तो लगता यही है कि तो यह माना जा रहा है कि उन्हें 7 महीने की मोहलत मिल गई है।

उपेंद्र कुशवाहा का दांव

बीजेपी सूत्रों ने बताया कि उपेंद्र कुशवाहा के पास अपनी पत्नी स्नेहलता, या पार्टी के किसी अन्य नेता तो मंत्री बनाने का मौका था लेकिन उन्होंने अपने गैर-विधायक बेटे के लिए एक पद सुरक्षित करने पर जोर दिया। एक बीजेपी नेता ने कहा, “एनडीए हाल ही में रिक्त हुई 10 सीटों में से आरएलएम को एक एमएलसी सीट दे सकता था, लेकिन बीजेपी को उम्मीद थी कि कुशवाहा अपनी पार्टी का हमारे साथ विलय कर लेंगे। इससे पहले भी पार्टी ने आरएलएम-बीजेपी विलय की इसी उम्मीद के साथ कुशवाहा को राज्यसभा का कार्यकाल दिया था।”

बीजेपी कर रही है पुनर्विचार

बिहार के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए बीजेपी कुशवाहा की मांगों को किस हद तक पूरा कर सकती है, इस मुद्दे पर पुनर्विचार करती नजर आ रही है। बीजेपी नेता ने कहा, “अब जब बीजेपी के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं, जो कुशवाहा के एक प्रमुख नेता हैं, तो पार्टी उपेंद्र कुशवाहा को क्यों खुश करती रहे? सात महीने बाद आरएलएम प्रमुख को एक और कठिन चुनौती का सामना करना पड़ेगा।”

इस मुद्दे पर आरएलएम के ही नेता ने कहा, “फिलहाल हमने प्रकाश के लिए सात महीने का कार्यकाल स्वीकार कर लिया है क्योंकि तत्काल कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं था। लोग चाहे जितनी भी बातें करें कि भाजपा हम पर विलय का दबाव डाल रही है, लेकिन सच्चाई यही है कि हम एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई हैं।”

संवैधानिक अनिवार्यता का खेल…

राज्य में हाल के राजनीतिक घटनाक्रम अनुच्छेद 164(4) के तहत संवैधानिक अनिवार्यता पर केंद्रित हैं, जिसके अनुसार किसी भी गैर-निर्वाचित व्यक्ति को मंत्रिमंडल मंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद के लिए निर्वाचित या मनोनीत होना अनिवार्य है। दीपक प्रकाश जेडीयू के नीतीश कुमार और वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल में मंत्रिमंडल में हुए विभिन्न बदलावों के दौरान अपनी छह महीने की छूट अवधि की सीमा पार कर चुके हैं, जिसके चलते एक जनहित याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी चुनौती दी गई है।

बिहार मंत्रिमंडल से प्रकाश को हटाए जाने से बचने के लिए बीजेपी नेता कुमार ने सात महीने पहले ही अपनी एमएलसी सीट छोड़ दी। इससे राज्यपाल द्वारा मनोनीत सीट खाली हो गई, जिससे चुनाव चक्र की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल नामांकन संभव हो गया। आरएलएम ने फिलहाल एक सीट हासिल कर ली है, लेकिन हाल के घटनाक्रम बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बढ़ते मतभेदों को उजागर करते हैं।

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