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20-30 रुपए रोज कमाती थी, लॉकडाउन में वो भी नहीं रहा तो तो रिक्शा चलाने लगी बच्ची, बोली- परिवार को भूखे नहीं मरने दे सकती

देशभर में कोरोना के केस बढ़ने के साथ ही लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया था, इसके चलते लाखों की संख्या में लोग अपना रोजगार गंवा चुके हैं।

कोरोनावायरस महामारी की वजह से भारत में बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार छिन गया है। इसकी सबसे बुरी मार अब तक गरीब और प्रवासी मजदूर वर्ग पर पड़ी है। लाखों की संख्या में बड़े शहरों से घर लौटे लोगों के पास अब खाने तक के पैसे नहीं हैं। वहीं, सेठों से उधार लेकर गरीबों के पास भी उधार चुकाने के बेहद कम जरिए हैं। ऐसे में लोग मजदूरी और दिन-प्रतिदिन काम कर के किसी तरह गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। बिहार के सासाराम की रहने वाली नंदिनी की भी ऐसी ही कहानी है। नंदिनी नाबालिग है और बाल श्रम कानून के तहत वैसे तो उसका किसी भी तरह का काम करना गैरकानूनी होना चाहिए, पर नंदिनी परिवार का गुजारा चलाने के लिए रिक्शा चला रही है।

द टेलिग्राफ अखबार के मुताबिक, नंदिनी से जब रिक्शा चलाने की वजह पूछी जाती है, तो उसका कहना है कि वह अपने परिवार को भूख से नहीं मरने दे सकती। नंदिनी के परिवार में मां के अलावा दो छोटी बहनें और एक भाई है। उसके सौतेले पिता ने लॉकडाउन के दौरान तो किसी तरह परिवार का खर्च उठा लिया, पर इसके बाद अनलॉक के दौरान वे भी काम की तलाश में उत्तराखंड चले गए, ताकि कुछ पैा कमाया जा सके। नंदिनी की परेशानी की एक वजह यह भी है कि बिहार में कई गरीब परिवारों की तरह ही उसके परिवार के पास भी राशन कार्ड नहीं है।

इन परिस्थितियों के चलते ही नंदिनी को घर का गुजारा चलाने के लिए एक सेठ से संपर्क करना पड़ा, जो कि लोगों को किराए पर रिक्शा चलाने के लिए देते हैं। नंदिनी के मुताबिक, वह रिक्शा चलाकर हर दिन जो पैसे कमाती है, उसमें से 50 रुपए उसे सेठ को ही देने होते हैं। बचे हुए 60 से 70 रुपए वह घर ले जाती है। नंदिनी का कहना है कि वह कुछ ही सवारियों को लाने-ले जाने के बाद थक जाती है।

नंदिनी का कहना है कि पहले वह अपने पिता के साथ घरों, लोकल कोर्ट और दफ्तरों में टॉयलेट की सफाई कर के 20-30 रुपए कमा लेती थी। लेकिन लॉकडाउन के बाद वह काम भी छिन गया। इसके बाद लॉकडाउन के दौरान उसके परिवार को पैसे और राशन तो मिले। लेकिन उसके बाद से अब तक कोई भी उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया है, यहां तक की सरकारी अधिकारी भी नहीं। इन्हीं हालात के चलते नंदिनी पिछले तीन हफ्ते से हर दिन सासाराम की सड़कों पर रिक्शा चलाने निकल जाती है। नंदिनी का कहना है कि उसे रिक्शा चलाना बिल्कुल पसंद नहीं, लेकिन वह स्कूल भी नहीं जाना चाहती, क्योंकि उसे अपने परिवार का ख्याल रखना होता है।

सासाराम में एक लड़की के रिक्शा चलाने के बारे में जब रोहतास के जिलाधिकारी पंकज दीक्षित से पूछा गया, तो उन्होंने इस मामले को सुनने के बाद जांच कराने की बात कही, साथ ही सरकार के नियमों के अनुसार हरसंभव मदद की बात कही।

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