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बीजेपी का चुनावी दावा- एनडीए काल में अपराध के मामले में 3 से 23वें नंबर पर आया बिहार, पर NCRB के आंकड़ों ने खोल दी पोल; चार पैमाने पर हाल बेहाल

भाजपा ने अपने चुनाव अभियान को धार देते हुए बिहार भाजपा इकाई के फेसबुक पेज पर एक वीडियो अपलोड किया। इसमें बिहार में अपराध में कमी आने का दावा किया गया, जो सच नहीं है...

बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। (पीटीआई)

बिहार में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और राजनीतिक पार्टियां जनता को लुभाने के लिए जोरदार चुनाव प्रचार में जुट गई हैं। इसी कड़ी में भाजपा ने अपने चुनाव अभियान को धार देते हुए बिहार भाजपा इकाई के फेसबुक पेज पर एक वीडियो अपलोड किया। वीडियो में दावा किया गया कि राज्य में एनडीए शासनकाल में कानून व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार आया है। वीडियो में दावा किया गया कि सूबे में ना सिर्फ आपराधिक गतिविधियां रुक गई हैं बल्कि सांप्रदायिक हिंसा भी रुक गई है।

वीडियो में अन्य राज्यों से तुलना कर दावा किया गया कि बिहार में अपराधों की संख्या कम हुई है। ये भी दावा किया गया कि साल 2005 में एनडीए के सत्ता संभालने के बाद आरजेडी प्रमुख लालू यादव के 15 साल के शासन के तुलना में अपराधों में कमी आई है। वीडियो में ऐसे कई दावे किए गए जो जमीनी हकीकत से काफी दूर हैं।

वीडियो में किए गए दावों की पड़ताल में क्या सामने आया?
पहला दावा- अपराध के मामले में बिहार का स्थान 23वां
वीडियो में दावा किया गया कि जब कुल अपराध पर आंकड़े की बात आती है तो बिहार इस मामले में मौजूदा समय में 23वें स्थान पर है, जो कि इससे पहले तीसरे स्थान पर था। हालांकि वीडियो में ये नहीं बताया गया कि भाजपा किस साल या समय को आधार मान रही है, मगर बताया गया कि डेटा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) से लिया गया।

Bihar, Jharkhand Coronavirus LIVE Updates

इधर NCRB के प्रकाशित आंकड़ों की जब जांच की गई तो पता चला कि समग्र (कुल) अपराध के मामले में बिहार 23वें स्थान पर नहीं है। बिहार आईपीसी की विभिन्न धाराओं में दर्ज कुल आपराधिक मामलों में चौथे स्थान पर है। अगर वीडियो में आईपीसी के तहत दर्ज आपराधिक मामलों और राज्य कानून के तहत दर्ज अपराधों को जोड़ लिया जाए, तब भी बिहार सातवें स्थान पर है। एनसीआरबी ने साल 2018 तक का डेटा जारी किया और 2019 का डेटा अभी जारी नहीं किया गया है।

दूसरा दावा- राज्य में एक लाख की आबादी पर अपराध पीड़ियों की संख्या सिर्फ 222
वीडियो में भाजपा ने दावा किया बिहार में एक लाख की आबादी में सिर्फ 222 लोग अपराध पीड़ित हैं जबकि राष्ट्रीय स्तर पर ये आंकड़ा 383 है। एनसीआरबी के आंकड़े को देखें तो भाजपा का ये दावा सही है। मगर इसे किसी उपलब्धि की तरह नहीं माना जा सकता है। बिहार देश में सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में से एक हैं और प्रति एक लाख लोगों पर पीड़ितों की संख्या की जनसंख्या के आधार पर गणना की जाती है। चूंकि बिहार में एक बड़ी आबादी निवास करती है, भले अपराध की संख्या अधिक हो मगर प्रति लाख जनसंख्या के आधार पर अपराध पीड़ितों की संख्या कम ही होगी।

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश की बात करें तो साल 2018 में राज्य में आईपीसी की विभिन्न धाराओं और स्थानीय कानूनों के तहत 5,85,157 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। ये संख्या किसी भी राज्य से अधिक है। मगर राज्य में अधिक जनसंख्या (अनुमानित 22.30 करोड़) होने की वजह से ये संख्या प्रति लाख पर महज 262 बैठती है।

तीसरा दावा- अपराध में 34 फीसदी की कमी
वीडियो में भाजपा ने दावा किया है कि एनडीए के सत्ता में आने के बाद से राज्य में 34 फीसदी अपराध में कमी आई है। बिहार में एनडीए की सरकार 2005 में बनी थी। मगर साल 2004 और उससे पहले के राज्यवार अपराध के आंकड़े एनसीआरबी की वेबसाइट पर उपलब्ध ही नहीं थे। मगर स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से मिले आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार में साल दर साल आपराधिक मामलों में बढ़ोतरी हुई है।

बिहार में लालू यादव के सत्ता में बिताए समय को भाजपा और राजद ‘जंगल राज’ कहते रहे हैं। दोनों पार्टियों ने आरोप लगाया कि उस समय अपराधी बेलगाम थे। हालांकि स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वेबसाइट पर उपलब्ध 2001 से 2019 के डेटा से पता चलता है कि राज्य में अपराध के मामलों में हर साल बढ़ोतरी हुई है। द वायर की एक खबर के मुताबिक बिहार में साल 2001 में 95,942 संज्ञेय अपराध दर्ज किए गए जो 2004 में बढ़कर 1,15,216 हो गए। हालांकि 2005 में इसमें दस हजार की कमी आई।

आकड़े के मुताबिक बिहार में 2019 में 2,69,095 संज्ञेय अपराध के मामले दर्ज किए गए जो 2004 की अपराध संख्या से 1,53,880 ज्यादा है। हाल में राज्य के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने इस तथ्य पर बताया कि पहले एफआईआर कम दर्ज होती थीं। उन्होंने बताया, ‘अब सभी पुलिस स्टेशन को निर्देश है किसी की शिकायत को नजरअंदाज ना करें। इसकी वजह से बिहार में अधिक आपराधिक घटनाएं दर्ज की जा रही हैं।’

चौथा दावा- बिहार में दंगे और नरसंहार नहीं होता
वीडियो में भाजपा ने दावा किया कि बिहार में दंगे या नरसंहार नहीं हुए हैं। हालांकि एनसीआरबी का डेटा भाजपा के इस दावे का खंडन करता है। आंकड़ों से पता चलता है कि सांप्रदायिक या धार्मिक हिंसा के मामले में बिहार चोटी पर है। एनसीआरबी पहले दंगों के आंकड़े जारी करता था। हालांकि साल 2017 से ये सांप्रदायिक और धार्मिक दंगों पर अलग-अलग आंकड़े जारी कर रहा है। डेटा के मुताबिक 2018 में 167 सांप्रदायिक और धार्मिक दंगों के साथ बिहार पहले पायदान पर रहा। इन दंगों से 339 लोग प्रभावित हुए। बिहार में उस साल कुल 10,276 दंगे हुए।

साल 2018 में रामनवमी त्योहार के दौरान प्रदेश के नौ जिले में सांप्रदायिक दंगों हुए। पिछले साल फरवरी में सीतामढ़ी में सांप्रदायिक हिंसा हुई जहां एक मुस्लिम शख्स को पीट-पीटकर भीड़ ने आग लगा दी।

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