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विधानसभा चुनावों में हार से बिहार में भी होगी बीजेपी को मुश्किल, NDA के साथी सीट के लिए बना सकते हैं दबाव

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के खराब प्रदर्शन का असर बिहार में एनडीए पर भी पड़ सकता है।

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है. (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

पांच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन का असर बिहार में एनडीए पर भी पड़ता दिख रहा है। भाजपा के लचर प्रदर्शन के कारण बिहार एनडीए की सहयोगी पार्टियों जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को लगने लगा है कि अब भाजपा उन्हें ‘इग्नोर’नहीं कर पायेगी। राजनीतिक विश्लेषक सुरूर अहमद कहते हैं, ‘इस परिणाम के चलते जदयू व लोजपा की बारगेनिंग पावर बढ़ गयी है और आनेवाले समय में ये पार्टियां भाजपा के साथ आसानी से समझौते नहीं करेंगी।’सूत्रों से पता चला है कि जदयू कई सीटों पर अपना दावा ठोकने का मन बना रहा है। ये सीटें परंपरागत तौर पर भाजपा की रही हैं।

खबरों की मानें, तो पटना साहिब और दरभंगा लोकसभा सीटों पर जदयू अपना दावा ठोक सकता है। ये दोनों सीटें भाजपा के पास हैं। पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा और दरभंगा सीट से कीर्ति आजाद सांसद हैं। दोनों ही खासा नाराज चल रहे हैं और गाहे-बगाहे भाजपा की बखिया उधेड़ते रहते हैं। पटना साहिब सीट 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आयी है और तब से ही भाजपा का इस सीट पर कब्जा है। दरभंगा सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस का कब्जा था। बाद के वर्षों में राजद, जनता दल और भाजपा बारी-बारी से इस सीट पर जीतती आयी है। पिछले दो बार से लगातार भाजपा ने यहां जीत दर्ज की है।

गौरतलब हो कि 2014 के चुनाव में महज दो सीटों पर जीतनेवाला जदयू वर्ष 2019 के आम चुनाव मे बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए भाजपा को राजी कर चुका है। अभी तक सीटों के बंटवारे का जो गणित सामने आ रहा है, उसके मुताबिक जदयू और भाजपा 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यानी कि भाजपा को जीती हुई पांच लोकसभा सीटें छोड़नी होंगी। लेकिन, पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद इस समीकरण में भी बदलाव के आसार नजर आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि लंबे समय से चुप्पी साध कर बैठी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने भी अब सम्मानजनक सीटों की मांग रख दी है।
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लोजपा एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘इस चुनाव परिणाम के बाद भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों की अनदेखी नहीं कर पाएगी। भाजपा को अब समझना होगा कि नरेंद्र मोदी कोईगाय की पूंछ नहीं हैं कि उन्हें पकड़ कर पार्टी चुनावी वैतरणी पार कर लेगी।’उन्होंने आगे कहा, ‘भाजपा के लिए यह झटका जरूरी था। यह 2019 के लिए एक सबक है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार अब नौजवानों और किसानों के बारे में गंभीरता से सोचेगी।’

उल्लेखनीय हो कि 2014 के लोकसभा चुनाव में लोजपा को सात सीटें मिली थीं, जिनमें से पार्टी ने छह सीटों पर जीत दर्ज की थी। अब चूंकि नीतीश कुमार भी एनडीए का हिस्सा हैं, तो तय हुआ था कि भाजपा व जदयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। बाकी छह सीटों में से दो सीटें रालोसपा को और लोजपा को चार सीटें मिलेंगी। लेकिन, रालोसपा के एनडीए से अलग हो जाने के कारण अब लोजपा को छह सीटें मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इस पर आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं आया है।

लोजपा के राष्ट्रीय महासचिव शिव नारायण मिश्रा ने कहा, ‘पहले हमें चार सीटें ऑफर की गई थीं, लेकिन रालोसपा के एनडीए छोड़ देने से उम्मीद है कि छह सीटें मिलेंगी।’सूत्रों ने बताया कि छह लोकसभा सीटों के अलावा लोजपा एक राज्यसभा सीट भी चाहती है। सूत्रों से यह भी पता चला है कि लोजपा मुखिया और केंद्र में मंत्री राम विलास पासवान खुद राज्यसभा के रास्ते संसद जाना चाहते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस चुनाव परिणाम से साफ हो गया है कि वर्ष 2019 के आम चुनाव में भाजपा अपने बूते सरकार नहीं बना सकती है। इसके लिए भाजपा को क्षेत्रीय पार्टियों की जरूरत पड़ेगी।

क्षेत्रीय पार्टियों को भी इसका अहसास है, इसलिए वे भी इसका फायदा उठायेंगी। कुल मिलाकर भाजपा के लिए आनेवाला वक्त मुश्किलों भरा होगा। यही नहीं, अगर इस चुनाव परिणाम को जनता का मूड मान लिया जाए, तो 2019 का चुनाव भाजपा के लिए कठिन होगा। और तो और भाजपा को लेकर लोगों की नाराजगी का असर सहयोगी पार्टियों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषक सुरूर अहमद कहते हैं, ‘चुनाव परिणाम से जाहिर हो गया है कि लोगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ गुस्सा है और वर्ष 2019 के आम चुनाव में इस गुस्से का खामियाजा भाजपा की सहयोगी पार्टियों को भी भुगतना पड़ सकता है।’  (स्टोरी सौजन्य- उमेश कुमार राय)

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