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मुश्किल में लालू के दोनों लाल, तेज प्रताप को बदलना पड़ा चुनाव क्षेत्र, तेजस्वी को पिता से हरी झंडी नहीं

वैशाली जिले के तहत आने वाली महुआ सीट पारंपरिक रूप से जेडीयू का गढ़ रहा है लेकिन 2015 में राजद-जेडीयू गठबंधन होने के नाते लालू यादव ने अपने बेटे की इस सीट से सेफ लॉन्चिंग कराई थी और उनकी जीत भी हुई थी।

Author नई दिल्ली | Updated: September 9, 2020 10:00 AM
bihar election, RJD, tej pratapBihar election 2020: लालू यादव के दोनों लाल तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव की चुनावी गाड़ी फंसती दिख रही है। (express photo)

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू यादव और दोनों बेटे भले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमलावर हों, चिराग पासवान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हों और राज्य में अगली सरकार बनाने का दावा कर रहे हों लेकिन लालू यादव के दोनों लाल तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव की चुनावी गाड़ी फंसती दिख रही है। बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने तो महुआ विधानसभा छोड़ कर अपना रुख हसनपुर की ओर कर लिया है।

सोमवार को तेज प्रताप ने हसनपुर में रोड शो भी किया। उनकी पूरी टीम अब यहां फोकस कर रही है। वैशाली जिले के तहत आने वाली महुआ सीट पारंपरिक रूप से जेडीयू का गढ़ रहा है लेकिन 2015 में राजद-जेडीयू गठबंधन होने के नाते लालू यादव ने अपने बेटे की इस सीट से सेफ लॉन्चिंग कराई थी और उनकी जीत भी हुई थी। इस बार दोनों दल अलग-अलग हैं, ऐसे में तेज प्रताप की राह मुश्किल है। 2010 के चुनाव में इस सीट से जेडीयू के रवींद्र राय ने राजद के जगेश्वर राय को हराया था। हालांकि, 2000 और 2005 में राजद से ही दसई चौधरी ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। वो लंबे समय से अलग-अलग दलों में रहते हुए यहां से जीतते रहे थे।

एक दिन पहले ही तेज प्रताप यादव के ससुर और पूर्व मंत्री चंद्रिका राय ने उन पर निशाना साधा था और कहा था कि तेज प्रताप भगोड़े हैं। वो महुआ से भागकर कहीं भी जाएं चुनाव जीतने वाले नहीं हैं। चंद्रिका राय ने आरोप लगाया था कि लालू यादव के परिवार ने यादवों का इस्तेमाल पैसे और पॉवर के लिए किया है लेकिन अब लोग जागरूक हो चुके हैं। पिछले महीने चंद्रिका राय ने राजद छोड़कर जेडीयू का दामन थाम लिया था।

पूर्व उपमुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव भी राघोपुर में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, जबकि यह सीट उनकी पुश्तैनी सीट रही है। साल 2010 को छोड़ दें तो 1995 के विधान सभा चुनाव से लेकर आज तक यह सीट लालू परिवार के कब्जे में रही है। 1995 और 2000 में खुद लालू यादव यहां से चुने गए थे। उनके बाद 2005 में यहां से राबड़ी देवी ने जीत दर्ज की थी। हालांकि, 2010 में राबड़ी देवी को हार का मुंह देखना पड़ा था। उन्हें जेडीयू के सतीश कुमार यादव ने हराया था लेकिन 2015 में तेजस्वी यादव ने यहां से सियासी पारी का आगाज किया था।

राघोपुर सीट भी वैशाली जिले के तहत और हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के तहत आता है। इस सीट पर राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का बड़ा प्रभाव है। राजद की सभी जीत में रघुवंश प्रसाद सिंह की बड़ी भूमिका रही है लेकिन फिलहाल वो पार्टी से नाराज चल रहे हैं। पिछले महीनों उन्होंने राजद के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। लिहाजा, हार की आशंका को देखते हुए तेजस्वी ने भी राघोपुर सीट बदलकर कोई दूसरी सीट से चुनाव लड़ने का मन बनाया था लेकिन सूत्र बताते हैं कि लालू यादव इस पर राजी नहीं हुए।

ऐसी सूरत में तेजस्वी यादव को अब रघुवंश सिंह की शरण में जाना होगा। माना जा रहा है कि इसी वजह से रामा सिंह की राजद में एंट्री अटक गई है। रघुवंश सिंह रामा सिंह को पार्टी में शामिल कराए जाने के खिलाफ थे। बता दें कि रामा सिंह का भी राघोपुर सीट पर प्रभाव रहा है। रामा सिंह और रघुवंश सिंह में अदावत पुरानी है। लालू यादव भी रघुवंश सिंह की कीमत पर रामा सिंह को पार्टी में शामिल कराए जाने के खिलाफ थे।

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