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Bihar Election: कभी सीएम नीतीश के खास थे उपेंद्र कुशवाहा, जानें कैसे लेक्चरर से तय किया केंद्रीय मंत्री तक सफर

साल 2004 में जब सुशील मोदी लोकसभा चुनाव जीतकर केन्द्र में चले गए तो नीतीश के समर्थन से कुशवाहा बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिए गए।

upendra kushwaha bihar election 2020 rlspरालोसपा मुखिया उपेन्द्र कुशवाहा बसपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रहे हैं। (फाइल फोटो)

बिहार की राजनीति में उपेन्द्र कुशवाहा एक बड़ा नाम रहे हैं। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से लेकर अब आगामी विधानसभा चुनाव में सीएम पद के उम्मीदवार बनने तक के सफर में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी सीएम नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले उपेन्द्र कुशवाहा आज नीतीश कुमार के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। वैशाली के एक कॉलेज में लेक्चरर के पद से मानव संसाधन राज्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले उपेन्द्र कुशवाहा काफी महत्वकांक्षी नेता रहे हैं और उनकी महत्वकांक्षाएं ही हैं, जो उन्होंने ऐन चुनाव के मौके पर महागठबंधन से अपनी राह जुदा कर एक नए गठबंधन के साथ चुनाव में उतरने का फैसला किया है।

बतौर लेक्चरर की थी करियर की शुरुआतः बिहार के वैशाली जिले में जन्मे उपेन्द्र कुशवाहा छात्र जीवन में ही राजनीति से जुड़ गए थे और 1993 तक लोकदल पार्टी के महासचिव भी रहे। इसके बाद वैशाली के बीआर अंबेडकर विश्विद्यालय से एमए की पढ़ाई करने के बाद वह मुजफ्फरपुर के समता कॉलेज से राजनीति विभाग में लेक्चरर के पद पर भी रहे। इसके बाद जॉर्ज फर्नांडिज, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली समता पार्टी के टिकट पर पहली बार साल 1995 में जंदाहा विधानसभा चुनाव लड़ा। हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद साल 2000 के विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा ने जंदाहा सीट से ही चुनाव लड़ा और इस बार जीत हासिल की। विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद कुशवाहा, नीतीश कुमार के करीब आ गए। इसी का नतीजा था कि साल 2004 में जब सुशील मोदी लोकसभा चुनाव जीतकर केन्द्र में चले गए तो नीतीश के समर्थन से कुशवाहा बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिए गए। बता दें कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को सीएम के बाद दूसरा सबसे बड़ा नेता माना जाता है। यही वजह रही कि वह बिहार के भावी सीएम की कतार में भी गिने जाने लगे थे।

हालांकि 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा जंदाहा सीट से चुनाव हार जाते हैं। हालांकि उस चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और जोड़-तोड़ करने के बाद भी कोई पार्टी सरकार नहीं बना पायी। इसके बाद अक्टूबर 2005 में ही फिर से चुनाव हुए लेकिन इस बार भी दलसिंहपुर सीट से उपेन्द्र कुशवाहा को हार का सामना करना पड़ा और इसकी वजह से कुशवाहा सरकार में जगह नहीं बना सके।

उपेन्द्र कुशवाहा और नीतीश कुमार में ऐसे हुई थी मनमुटाव की शुरुआतः 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के नेतृत्व में जदयू और भाजपा ने बिहार में सरकार बनायी लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा को इसमें जगह नहीं मिली। माना जाता है कि तभी से ही दोनों नेताओं के बीच मनमुटाव की शुरुआत हो गई थी। इसके बाद कुशवाहा ने नीतीश का साथ छोड़कर एनसीपी की सदस्यता ग्रहण कर ली। एनसीपी ने उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया लेकिन महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हुई हमलों की घटनाओं के बाद कुशवाहा ने एनसीपी भी छोड़ दी।

साल 2009 में कुशवाहा की फिर से जदयू में एंट्री हुई और पार्टी ने उन्हें 2010 में राज्यसभा भी भेज दिया लेकिन उस दौरान भी पार्टी लाइन से हटकर बयानबाजी करने के चलते उन्हें फिर से जदयू छोड़नी पड़ी।

साल 2013 में उपेन्द्र कुशवाहा ने जोरदार तरीके से पटना के गांधी मैदान से नई पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के गठन का ऐलान किया। उपेन्द्र कुशवाहा ने नीतीश की तरह राज्य के कुर्मी और कोरी मतदाताओं के वोटबैंक पर टारगेट किया। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जदयू और भाजपा की राहें जुदा हो गई और मौका पाकर रालोसपा ने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया।

इसका रालोसपा को फायदा मिला और पार्टी के तीन सांसद भाजपा की लहर में चुनाव जीत गए। जिसके बाद उपेन्द्र कुशवाहा को केन्द्र की सरकार में राज्यमंत्री का पद मिला। जब बिहार में जदयू और भाजपा फिर से साथ आए तो कुशवाहा ने भाजपा से नाता तोड़कर महागठबंधन का हाथ थाम लिया। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी। हाल ही में कुशवाहा ने महागठबंधन से नाता तोड़कर बसपा के साथ नए गठबंधन में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि कुशवाहा की बिहार के ओबीसी और दलित मतदाताओं को लामबंद करने की रणनीति कितनी सफल होती है?

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