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Bihar Election: बिहार में किस दल को मिलता रहा है मुस्लिम वोटरों का साथ, 38 सीटों पर जीत-हार में रहती है अहम भूमिका

बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में करीब चार दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटरों का न सिर्फ दबदबा है बल्कि वो उम्मीदवारों की हार-जीत तय करते हैं।

muslim voter, bihar electionBihar election 2020: इस चुनाव में मुस्लिम वोट किधर जाएगा इसका अनुमान लगाना इतना आसान नहीं होगा।

बिहार चुनाव में अब ज्यादा वक़्त नहीं बचा है। ऐसे में सभी राजनीतिक पार्टियां जातीय समीकरण साधने और चुनावी गोटी बिठाने में जुटी हुई हैं। बिहार आबादी के लिहाज से देश का तीसरा बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के बाद मुसलमानों की आबादी यहां सबसे ज्यादा है। ऐसे में एनडीए और महागठबंधन दोनों की नज़र मुस्लिम वोटों पर रहेगी।

बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में करीब चार दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटरों का न सिर्फ दबदबा है बल्कि वो उम्मीदवारों की हार-जीत तय करते हैं। इन सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 40 फीसदी तक है। ये वोट महा गठबंधन का परंपरागत वोट बैंक कहे जाते हैं। लेकिन अन्य राज्यों में मुस्लिमों का वोट बीजेपी या एनडीए को मिला है। ऐसे में इस चुनाव में मुस्लिम वोट किधर जाएगा इसका अनुमान लगाना इतना आसान नहीं होगा।

2015 के विधानसभा चुनाव में 23 मुस्लिम विधायक चुनकर आए थे। 2000 के चुनावों के बाद ये पहली बार था, जब इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम विधायक जीते थे। 2000 के चुनाव में 29 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। अभी राजद के 11, कांग्रेस के 6 और जेडीयू के 5 मुस्लिम विधायक है। वहीं भाजपा के 53 में से एक भी विधायक मुस्लिम नहीं है।

पिछले 6 साल में बिहार में तीन चुनाव हो चुके हैं। जिनमें 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव और 2015 का विधानसभा चुनाव है। तीनों ही बार ज्यादातर मुस्लिम वोट राजद के साथ गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में 60% से ज्यादा मुस्लिम वोट राजद-कांग्रेस गठबंधन को मिले थे। इस चुनाव में जेडीयू को 21% मुसलमानों ने वोट किया था।

2019 लोकसभा चुनाव में महागठबंधन को 77% से ज्यादा मुस्लिम वोट मिले थे। वहीं एनडीए को सिर्फ 6% मुसलमानों ने वोट किया था। वहीं 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद-कांग्रेस और जदयू के महा गठबंधन को मुसलमानों के 77.6% वोट मिले थे। जबकि, भाजपा और उसके सहयोगियों को महज 7.8% वोट मिले थे।

राज्य में 16 फीसदी मुस्लिम आबादी और करीब 14 फीसदी यादव वोटरों को राजद अपना वोट बैंक समझता रहा है। इसी के सहारे लालू-राबड़ी ने पंद्रह वर्षों तक शासन किया। अब लालू के लाल भी उसी वोट बैंक की बदौलत सत्ता में वापसी का सपना देख रहे हैं लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ये राह आसान नहीं है। राज्य में कमोबेश साल 2010 के चुनाव सी परिस्थितियां हैं। सत्तारूढ़ जेडीयू और बीजेपी दोनों एकसाथ हैं। तेजस्वी के मुकाबले अभी भी नीतीश बड़ा चेहरा हैं। इसके अलावा नीतीश ने अब दलित वोटों को साधने के लिए जीतनराम मांझी को भी साथ कर लिया है।

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