बिहार में माओवादी आंदोलन लगभग खत्म हो गया है। पिछले हफ़्ते सुरेश कोड़ा उर्फ मुस्तकीम ने मुंगेर में राज्य पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स (STF) के सामने हथियार डाल दिए। उनकी पहचान बिहार के आखिरी एक्टिव हथियारबंद माओवादी कमांडरों में से एक के तौर पर हुई थी। सुरेश कोड़ा पर 3 लाख रुपये का इनाम था और जो 25 साल से भगोड़ा घोषित था। उसके सरेंडर के बाद बिहार को संगठित माओवादी हिंसा से मुक्त घोषित करने की आधिकारिक घोषणा हुई। लेकिन बिहार में माओवादी आंदोलन की कहानी पुरानी है।

जनवरी 2005 में हुई थी एसपी की हत्या

जनवरी 2005 की बात है जब मुंगेर के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (SP) के सी सुरेंद्र बाबू एक ऑपरेशन से लौट रहे थे। तभी खड़गपुर हिल्स में एक लैंडमाइन ने उनके काफ़िले को उड़ा दिया। भीमबांध के जंगलों में माओवादियों द्वारा किए गए इस धमाके में SP और चार दूसरे पुलिसवाले मारे गए। इससे पता चलता है कि तब राज्य में नक्सली दस्ते कितनी बेखौफ होकर काम कर रहे थे।

डायरेक्टर जनरल ऑफ़ ऑपरेशंस और STF कुंदन कृष्णन 2000 के दशक की शुरुआत में बिहार में माओवादी हिंसा में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी को याद करते हैं। उसी समय माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) और पीपल्स वॉर ग्रुप (PWG) का मर्जर होकर CPI (माओवादी) बना, जिसने बड़े शहरी और ग्रामीण हमले किए।इनमें पटना के एक जेलर की हत्या और नवंबर 2005 में जहानाबाद जेलब्रेक शामिल है। यहां विद्रोहियों ने 389 कैदियों को छुड़ा लिया। इसके बाद जून 2005 में पूर्वी चंपारण के मधुबन ब्लॉक पर एक साथ हमला हुआ, जिसमें पुलिस स्टेशनों, बैंकों, ब्लॉक ऑफिसों और स्थानीय राजनीतिक हस्तियों के घरों को निशाना बनाया गया जिसमें लगभग दो दर्जन लोग मारे गए थे।

डीजी कृष्णन ने क्या बताया?

डीजी कृष्णन बिहार में नक्सलवाद की शुरुआत का पता पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में 1960 के दशक के नक्सलबाड़ी आंदोलन से लगाते हैं। प्रशांत बोस जैसे युवा इस आंदोलन से प्रभावित थे। वह अविभाजित बिहार में पारसनाथ और धनबाद इलाकों में अपनी पकड़ बनाने के लिए चले गए और दूसरों को भी अपनी तरफ खींच लिया।

STF चीफ कहते हैं, “प्रशांत बोस के एक साथी एकवारी के एक टीचर जिन्हें वहां मास्टर साब (जगदीश महतो) के नाम से जाना जाता था, उन्होंने मगध इलाके में अपनी पहुंच बढ़ाई और चतरा जिले में कुलेश्वरी ज़ोन बनाया।” इसी समय डॉ. विनयन और उनकी मजदूर किसान संघर्ष समिति (MKSS) की लीडरशिप में पार्टी यूनिटी ग्रुप, ग्रामीण पटना, जहानाबाद और औरंगाबाद में एक्टिव हो गया।

मई 1970 में रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट सेंटर (RCC) के कैडरों ने सिंहभूम (अब झारखंड में) में जादूगोड़ा पुलिस पिकेट पर हमला किया और 9 राइफलें लूट लीं, जो इस इलाके में माओवादियों की सबसे पुरानी दर्ज हथियारबंद कार्रवाइयों में से एक थी। बाद में RCC का MCC में विलय हो गया और MCC और पार्टी यूनिटी (जो MKSS की हथियारबंद विंग थी) बड़े ग्रुप के तौर पर उभरे। ये ग्रुप अक्सर न सिर्फ़ सरकार से, बल्कि एक-दूसरे से और CPI (ML) जैसे विरोधी ग्रुप से भी लड़ते थे। लेकिन आखिरकार ये ग्रुप एक हो गए।

CPI (माओवादी) कैसे बना?

1998 में पार्टी यूनिटी का कोंडापल्ली सीतारमैया के PWG में मर्जर हो गया और फिर 2004 में आखिरी मर्जर हुआ जिससे आज का CPI (माओवादी) बना। डीजी कृष्णन इस दौर में एक बड़े डेमोग्राफिक बदलाव को देखते हैं। उन्होंने बताया, शुरू में MCC में ज़्यादातर सभी बैकग्राउंड के जमीनहीन मज़दूर थे। लेकिन जगदीश महतो के असर में, ग्रुप का डेमोग्राफिक बदल गया, जिससे पासवान जैसे ग्रुप CPI (ML) के साथ जुड़ गए। 1997 और 1999 के बीच ये ग्रुप लगातार लड़ते रहे, एक-दूसरे के कैडर और घरों को सिस्टमैटिक तरीके से खत्म करते रहे। इसी लड़ाई के दौरान गया सांसद के पिता राजेश पासवान की हत्या कर दी गई।”

2004 के मर्जर के बाद अंदरूनी लड़ाई काफी हद तक खत्म हो गई, जिसका नतीजा 2007 की शुरुआत में बिहार के जमुई ज़िले के एक दूर के गांव चोरमारा में हुई 9वीं यूनिटी कांग्रेस थी। डीके कृष्णन कहते हैं कि हालात तब बदलने लगे जब बिहार ने यह माना कि पारंपरिक पुलिसिंग गुरिल्ला सेना का मुकाबला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, “इस हिंसा की वजह से पुलिस को मॉडर्नाइज़ होने के लिए मजबूर होना पड़ा। केंद्र सरकार के LWE को सबसे बड़ा अंदरूनी सुरक्षा खतरा मानने के बाद, IB और MHA में LWE डिवीज़न बनाने से खास फंडिंग फ्लो हुआ।”

20 एकड़ में बना खास STF ट्रेनिंग सेंटर

बिहार ने 20 एकड़ में एक खास STF ट्रेनिंग सेंटर बनाया और 2,000 लोगों की एक खास फोर्स बनाई। जवाबी हमले का असर डेटा से पता चलता है। 2004 में, बिहार में LWE हिंसा की 342 घटनाएं हुईं, जिसमें 218 आम लोगों की मौत हुई। 2024 और 2025 में, घटनाओं की संख्या घटकर हर साल सिर्फ़ 13 रह गई, जिसमें सिक्योरिटी फोर्स का कोई हताहत नहीं हुआ और लेवी का पैसा भी नहीं मिला। अकेले 2025 में सिक्योरिटी फोर्स ने 229 चरमपंथियों को गिरफ्तार किया और विस्फोटक, डेटोनेटर और हथियारों का एक बड़ा जखीरा बरामद किया।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार इस समय के साथ माओवादी लीडरशिप में लगातार कमी आ रही है। 2001 में 11 एक्सट्रीमिस्ट मारे गए थे, जबकि 2015 में गिरफ्तारियों की संख्या सबसे ज़्यादा 585 थी। 2005 से बिहार पुलिस ने 8,500 से ज़्यादा संदिग्ध माओवादी कैडर और ओवरग्राउंड वर्कर को गिरफ्तार किया है। अकेले पिछले पांच सालों (2020–2025) में बिहार STF और सेंट्रल एजेंसियों ने 42 टॉप-टियर कमांडरों (जोनल से लेकर सेंट्रल कमेटी के सदस्यों तक) को बेअसर या गिरफ्तार किया है, जिससे रीजनल कमांड स्ट्रक्चर को असरदार तरीके से खत्म कर दिया गया है।

डीजी कृष्णन के अनुसार नक्सलियों में कमी का एक और संकेत 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव थे। उन्होंने बताया, “दशकों से गया, जमुई और रोहतास जैसे जिलों में पोलिंग स्टेशनों को लैंडमाइन और बूथ कैप्चरिंग के खतरे के कारण सुरक्षित ज़ोन में शिफ्ट करना पड़ा था। सालों में पहली बार चुनाव आयोग को एक्सट्रीमिस्ट खतरों के कारण एक भी पोलिंग बूथ शिफ्ट नहीं करना पड़ा।”

चोरमारा में जहां माओवादियों की 2007 की यूनिटी कांग्रेस हुई थी, वहां वोटरों ने अपने असली बूथों पर वोट डाला और 41.55% वोटिंग हुई। चकरबंधा पहाड़ियों में जहां 2016 में हुए धमाके में 10 CoBRA जवान मारे गए थे, ऐसे तारचुआ जैसे बूथों पर वोटिंग बढ़कर 79% हो गई। रोहतास में जहां 2002 में DFO संजय सिंह की हत्या हुई थी, उस कोरहास गांव में 74% वोटिंग हुई। पढ़ें सुरेश कोड़ा पर दर्ज हैं 60 मामले

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देवजी ने तेलंगाना पुलिस के सामने तीन और नक्सलियों (सीनियर माओवादी लीडर मल्ला राजी रेड्डी, बड़े चोक्का राव उर्फ दामोदर, और नुने नरसिम्हा रेड्डी उर्फ गंगन्ना) के साथ सरेंडर कर दिया। इसके बाद देवजी का परिवार उनसे मिलने तेलंगाना के जगतियाल ज़िले के कोरुतला शहर से हैदराबाद गया। 62 वर्षीय देवूजी से मिलना उनके परिवार के लिए बहुत बड़ा अनुभव था। पढ़ें पूरी खबर