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‘कब तक हमारे बच्चे चावल, नमक खाकर रहेंगे’, बेरोजगारी व परिवार के लिए फिर शहर जा रहे मजदूरों ने सुनाई आपबीती

कोरोना महामारी और लॉकडाउन से पहले बिहार के किशनगंज निवासी मुरारी लाल गुड़गांव में स्थित एक झोपड़ी में रहते थे और एक निर्माण स्थल पर काम करते थे। लॉकडाउन की घोषणा की गई तो उनकी आय का स्त्रोत भी चला गया।

कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के चलते रोजगार में आई भयंकर कमी के बाद मई की शुरुआती में शहरी प्रवासी मजदूरों की एक बड़ी आबादी पैदल, ट्रेनों और अन्य वाहनों के जरिए बिहार में अपने गृह नगर लौट आई। मगर कोविड-19 के बीच महीनों तक बिना किसी काम के और कृषि कीमतें गिरने के वजह से इस आबादी को एक बार फिर शहरों का रुख करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। ये शहर जाने के लिए एक बार अपने घरों से निकल पड़े हैं। इधर शहर भी धीरे-धीरे फिर से पटरी पर लौट रहे हैं और कंपनियां अपने मजदूरों के वापस लौटने के लिए बेताब बैठी हैं।

प्रवासी मजदूर मनीष कुमार ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने दिल्ली से अपने गृह नगर लौटने के लिए चार दिन ट्रेन में बिताए। मगर शहर लौटने के लिए एक रियल स्टेट कंपनी ने उनके लिए विमान के टिकट की व्यवस्था की है। अब भागलपुर स्थित घर से घर लौटने के लिए उन्हें दो घंटे लगेंगे। कुमार कहते हैं, ‘मैं कंपनी का नाम नहीं जानता और ना ही मैं जानना चाहता हूं। मेरे बच्चे भूखे हैं।’

कुमार को पिछले सप्ताह एक ठेकेदार योगेंद्र सिंह का फोन आया। सिंह ने बताया कि दस लोगों के एक समूह को दिल्ली लाया जा रहा है, जहां से उन्हें हरियाणा के मानेसर में एक निर्माण स्थल पर ले जाया जाएगा। इसके लिए वो मुझपर ‘एक एहसान’ कर रहे थे क्योंकि मेरी पत्नी उनकी चचेरी बहन थी। बता दें कि उसी ने पति को काम दिलाने के लिए सिंह से गुजारिश की थी। इसके अलावा अन्य नौ लोग किशनगंज के थे।

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सिंह ने बताया कि मजदूरों के बुलाने का काम पिछले दो सप्ताह से शुरू हो चुका है। उन्होंने बताया, ‘सालों से मुझे फोन आते थे जब लोग दिल्ली और हरियाणा में काम की व्यवस्था चाहते थे। इस बार काम जल्दी शुरू करने की जरुरत है क्योंकि टारगेट पूरा करना है। मजदूरों को लाने के लिए हवाई टिकट की व्यवस्था की जा रही है।’

कोरोना महामारी और लॉकडाउन से पहले बिहार के किशनगंज निवासी मुरारी लाल गुड़गांव में स्थित एक झोपड़ी में रहते थे और एक निर्माण स्थल पर काम करते थे। लॉकडाउन की घोषणा की गई तो उनकी आय का स्त्रोत भी चला गया। झोपड़ी किराए पर ली गई थी और भोजन की व्यवस्था के लिए पैसे भी खत्म हो रहे थे। मुरारी लाल बताते हैं कि जब भी वो काम के लिए बाहर जाते उन्हें पुलिस से बचना पड़ता। उन्हें हर समय डर रहता था क्योंकि घर पर पत्नी, बच्चे और बूढ़ी मां थी।

वो कहते हैं मैंने उन्हें घर वापस ले जाने के लिए काफी कोशिशें की और आखिरकार एक ट्रक में बिठाकर वापस गांव भेज दिया। मगर अब मैं वापस शहर लौट रहा हूं। मुरारी लाल कहते हैं, ‘बिहार में कोई काम नहीं है। गांव में खर्च भी है। मेरे बच्चे कब तक चावल और नमक खाएंगे? वो सब्जियां कैसे खरीदेंगे। यहां मानसून है और हमें एक नई छत की जरुरत होगी। हम खाद और बीज कैसे खरीदेंगे? शहर में कोरोना वायरस है और गांव में नहीं है, मगर कोई भी पिता नहीं चाहता कि उसके बच्चे भूखे रहें।’

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