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बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस में बागी सुर: बीच बैठक इस्‍तीफे की पेशकश, राजद से गठबंधन जारी रखने पर भी सवाल

बिहार युवा कांग्रेस के अध्यक्ष गुंजन पटेल ने पूछा कि पार्टी राज्य की 52 फीसदी आबादी को छोड़कर सत्ता में आने की उम्मीद कैसे कर सकती है? इस मुद्दे को कांग्रेस के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष प्रवीण सिंह कुशवाहा ने भी उठाया।

Author Translated By प्रमोद प्रवीण पटना | July 19, 2020 11:36 AM
shakti singh gohil bihar election congress obcकांग्रेस के वरिष्ठ नेता और बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है। (फाइल फोटो)

बिहार में चुनाव से पहले ही कांग्रेस के अंदर बगावत के सुर बुलंद हो गए हैं। पार्टी में पिछड़े वर्ग के नेताओं ने पिछड़े समुदाय को टिकट बंटवारे और पार्टी संगठन में पद देने के मामले में तरजीह नहीं देने के आरोप लगाए हैं। इन नेताओं ने आरोप लगाया है कि पार्टी में सिर्फ ऊंची जाति, दलित और मुस्लिमों को ही प्राथमिरता दी जा रही है।

बिहार कांग्रेस के अंदर ओबीसी नेताओं के एक धड़े ने राजद के साथ चल रहे गठबंधन पर भी सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि पार्टी ने ओबीसी राजनीति राजद को स्थानांतरित कर दिया है। सूत्रों ने बताया कि बुधवार (15 जुलाई) को बिहार प्रदेश कांग्रेस चुनाव समिति और प्रदेश कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई थी जिसमें बिहार प्रभारी महासचिव शक्ति सिंह गोहिल भी मौजूद थे। इस बैठक में विवाद इतना बढ़ गया कि पिछड़े वर्ग से आनेवाले एक नेता ने पार्टी के सभी पदों से अपने इस्तीफे की भी घोषणा कर दी। बताया जा रहा है कि जब ये पार्टी में सोशल इंजीनियरिंग की अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे थे, तब उन्हें रोका गया था।

इसी बैठक में बिहार युवा कांग्रेस के अध्यक्ष गुंजन पटेल ने पूछा कि पार्टी राज्य की 52 फीसदी आबादी को छोड़कर सत्ता में आने की उम्मीद कैसे कर सकती है? इस मुद्दे को कांग्रेस के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष प्रवीण सिंह कुशवाहा ने भी उठाया। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस प्रकरण को टिकट पाने का हथकंडा करार दिया है, जबकि कुछ नेताओं का मानना है कि यह पार्टी के लिए बुरा विकल्प पैदा कर सकता है।

कैलाश पटेल, जिन्होंने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया, ने कहा, “कांग्रेस सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रही है। मैं आपको कई उदाहरण दे सकता हूं। जब राजद-जद (यू) -कांग्रेस का गठबंधन 2015 में सत्ता में आया, तो कांग्रेस को चार मंत्री पद दिए गए। पार्टी ने इनमें से दो मंत्री पद उच्च जातियों और एक-एक मुस्लिम और दलित (नेता) को दिए। इसके बाद पीसीसी में फेरबदल हुआ। राज्य इकाई के अध्यक्ष भी उच्च जाति से आते हैं।”

उन्होंने कहा, “चार कार्यकारी अध्यक्ष में से दो उच्च जातियों से हैं, एक दलित हैं और एक मुस्लिम हैं। अभियान समिति के प्रमुख भी ऊंची जाति से आते हैं। अगर कांग्रेस की रणनीति सवर्णों को लुभाने की है, जो बीजेपी में चले गए हैं… मैं समझ सकता हूं कि यह रणनीति हो सकती है … तो हम राजद के साथ अपना गठबंधन कैसे जारी रख सकते हैं, क्योंकि उच्च जातियां राजद से घृणा करती हैं?”

कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि 2015 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन इनमें से मात्र 12 फीसदी टिकट ही ओबीसी वर्ग को दिए गए थे। उन्होंने कहा कि यह गलत धारणा है कि हिन्दुत्व की विचारधारा की वजह से हिन्दू वोटर बीजेपी की तरफ लामबंद हैं। उन्होंने कहा, “भाजपा राजनीतिक रूप से हर समुदाय तक पहुंच बना रही है और उन्हें पार्टी में प्रतिनिधित्व और आवाज दे रही है। लेकिन हम ओबीसी नेतृत्व को कुचल रहे हैं। तीन दशकों में हमारे सामाजिक आधार का विस्तार नहीं हुआ है। हमने बिहार में ओबीसी राजनीति को राजद को आउटसोर्स कर दिया है।”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बीजेपी और जेडीयू दोनों गठबंधन में हैं लेकिन दोनों दल ओबीसी और ईबीसी समुदाय पर फोकस कर रहे हैं। बीजेपी ने इसे जेडीयू को आउटसोर्स नहीं किया बल्कि ओबीसी और ईबीसी समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व दे रहे हैं।

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