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बिहार के बड़े पलटीमार: जीतनराम 5 तो नागमणि 11 बार कर चुके हैं दल-बदल

नागमणि अपने साथ 10 फीसदी कुशवाहा वोट होने का दावा करते हैं और दक्षिणी बिहार की कुछ सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं।

bihar election jitanram manjhi pappu yadavबिहार के ये नेता अब तक कई राजनैतिक पार्टियों में शामिल हो चुके हैं। (फाइल)

बिहार में एक बार फिर दल-बदल का खेल शुरू है। एक दिन पहले ही (20 अगस्त) को जहां पूर्व सीएम जीतनराम मांझी ने महागठबंधन छोड़ दिया है, वहीं राजद सुप्रीमो लालू यादव के समधी समेत तीन विधायक राजद छोड़कर जदयू में शामिल हो गए हैं। राजद ने भी सियासी पलटवार में जदयू छोड़कर आए पूर्व मंत्री श्याम रजक को पार्टी में शामिल किया। राज्य में पलटीमार नेताओं की फौज है जिन्होंने सियासी नफा-नुकसान के लिए कई बार दल-बदल किया हो। इस लिस्ट में सबसे ऊपर पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि का नाम है।

नागमणि: राजनीति में दल-बदल के लिए पूर्व केन्द्रीय मंत्री नागमणि का नाम काफी जाना-पहचाना है। साल 1977 में पहली बार विधायक बने नागमणि अब तक 11 बार पार्टी बदल चुके हैं। स्थिति ये है कि नागमणि से शायद ही कोई दल अछूता हो, जहां उन्होंने सदस्यता ग्रहण ना की हो। पिता जगदेव प्रसाद की पार्टी शोषित समाज दल से राजनीति में एंट्री करने वाले नागमणि अब तक जनता दल, राजद, राजद (लोकतांत्रिक), बीजेपी, लोक जनशक्ति पार्टी, जदयू, एनसीपी, आजसू में शामिल हो चुके हैं।

इसके अलावा उन्होंने अपनी पार्टी समरस समाज पार्टी भी बनाई लेकिन 2017 में उन्होंने उसका विलय उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) में कर लिया। वो पार्टी के उपाध्यक्ष बनाए गए लेकिन 2019 में यहां से भी वो विदा हो लिए। बाद में उन्होंने जदयू ज्वाइन कर ली। नागमणि अपने साथ 10 फीसदी कुशवाहा वोट होने का दावा करते हैं और दक्षिणी बिहार की कुछ सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं।

जीतनराम मांझीः साल 1980 में सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आए पूर्व सीएम जीतनराम मांझी भी अभी तक 5 बार पार्टी बदल चुके हैं। सबसे पहले साल 1980 में वह कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक बने थे। इसके बाद साल 1995 में लालू प्रसाद यादव से प्रभावित होकर जनता दल में शामिल हो गए। बाद में राजद बनने पर वो इसके हिस्सा हो गए। 10 साल तक राजद में रहने के बाद जीतनराम मांझी जदयू में शामिल हो गए। इसी दौरान वह 9 माह तक बिहार के सीएम भी रहे।

हालांकि जब जदयू द्वारा उन्हें सीएम पद से हटने को कहा गया तो वह नहीं माने और इस बात को लेकर नीतीश कुमार के साथ उनके संबंधों में खटास आ गई और उन्होंने जदयू छोड़ दी। इसके बाद जीतनराम मांझी ने हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा का गठन किया और फिलहाल उसके अध्यक्ष हैं। नई पार्टी के गठन के बाद भी उनका एक दल से दूसरे दल में आना-जाना जारी है। बता दें कि हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के गठन के बाद वह एनडीए के साथ गए लेकिन जब बीजेपी और नीतीश कुमार साथ आए तो वह एनडीए छोड़कर महागठबंधन में चले गए। हालांकि मांझी ने अब महागठबंधन को भी टाटा बाय-बाय बोल दिया है।

रमई रामः बिहार में सरकार में मंत्री रहे रमई राम फिलहाल राजद के साथ हैं। लेकिन राजद में आने से पहले वह भी कई राजनैतिक पार्टियों में रहने का अनुभव ले चुके हैं। जीतनराम मांझी की तरह रमई राम भी सरकारी नौकरी छोड़कर साल 1969 में राजनीति में सक्रिय हुए थे। रमई राम ने पार्टियां तो कई बदली लेकिन वह हर बार बोचहां विधानसभा से ही चुनाव लड़े और जीते भी। बता दें कि रमई राम बोचहा विधानसभा का 11वीं बार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। राजद से पहले रमई राम जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल, जदयू और उसके बाद शरद यादव की पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल में भी रहे। हालांकि लोकतांत्रिक जनता दल के राजद में विलय के साथ ही वह फिर से राजद में लौट आए हैं।

पप्पू यादव: 1990 में निर्दलीय विधायक के तौर पर जीतकर अपनी राजनीति का आगाज़ करने वाले राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव भी कई दलों में सियासी पारी खेल चुके हैं। अपने इलाके में नेताजी के नाम से मशहूर पप्पू यादव लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद में रह चुके हैं। वह लालटेन चुनाव चिन्ह पर जदयू के तत्कालीन उम्मीदवार और पार्टी अध्यक्ष शरद यादव की मधेपुरा संसदीय सीट से हरा चुके हैं। उनका नाता मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और लोक जनता पार्टी से भी रहा है। 2015 में उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले अपनी नई पार्टी बनाई। उनकी पार्टी जन अधिकार पार्टी 40 सीटों पर लड़ी पर एक भी सीट नहीं जीत सकी।

नरेंद्र सिंहः सिंह चार दशक के अपने राजनीतिक करियर में आधा दर्जन बार दल-बदल कर चुके हैं। 1980 के दशक में उन्होंने कांग्रेस के साथ अपना सियासी आगाज़ किया, लेकिन 1990 आते-आते वो जनता दल में शामिल हो लिए और अपनी सीट बचने में कामयाब रहे। वो जमुई की चकई सीट से कई बार विधायक रहे हैं। उनका नाता जब लालू से टूटा तो साल 2000 में निर्दलीय जीत कर आए। फिर नितीश सरकार में मंत्री बने। बाद में जदयू में शामिल हुए। नीतीश सरकार में वह लगातार मंत्री रहे। बाद में जीतन राम मांझी खेमे में गए। 2015 में जब मांझी ने HAM बनाई तो नरेंद्र सिंह उसमें भी रहे, लेकिन जल्द ही उन्होंने फिर जदयू में वापसी कर ली। इस साल फिर उन्होंने जदयू से नाता तोड़ लिया। अभी वो अरुण कुमार, यशवंत सिन्हा के साथ बिहार नव निर्माण मोर्चा के हिस्सा हैं।

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