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नृत्य : शशरेक अंबरदार का भरतनाट्यम

भरतनाट्यम नृत्यांगना और साहित्य कला परिषद की उपसचिव सिंधु मिश्र के शिष्य शशरेक अंबरदार ने पिछले दिनों एलटीजी सभागार में आयोजित समारोह में नृत्य प्रस्तुत किया।

भरतनाट्यम नृत्यांगना और साहित्य कला परिषद की उपसचिव सिंधु मिश्र के शिष्य शशरेक अंबरदार ने पिछले दिनों एलटीजी सभागार में आयोजित समारोह में नृत्य प्रस्तुत किया।

शास्त्रीय नृत्य जगत में पुरुष कलाकार गिने-चुने हैं। कुछ कलाकार हैं भी तो उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। भरतनाट्यम नृत्यांगना और साहित्य कला परिषद की उपसचिव सिंधु मिश्र के शिष्य शशरेक अंबरदार ने पिछले दिनों एलटीजी सभागार में आयोजित समारोह में नृत्य प्रस्तुत किया। उनका नृत्य ऊर्जा और स्फूर्ति से परिपूर्ण था। शशरेक सेंट स्टीफंस कालेज के छात्र हैं। वे अर्थशास्त्र से स्नातक कर रहे हैं। साथ ही, वह चौदह साल से सिंधु मिश्र से भरतनाट्यम सीख रहे हैं। उन्हें बालश्री सम्मान भी मिल चुका है। वह बाल कलाकारों के साथ लंदन के रॉयल अलबर्ट हॉल में अपना नृत्य प्रदर्शन कर चुके हैं।

इसके अलावा, जर्मनी, जापान, आइसलैंड व दुबई की कला यात्रा भी कर चुके हैं। वे अपने गुरु के और अन्य कलाकारों के साथ सामूहिक प्रस्तुतियों में शिरकत करते रहे हैं। यह उनकी पहली एकल प्रस्तुति थी, जो नए कलाकार के लिए एक चुनौती होती है। इसे शशरेक ने बखूबी निभा कर अपनी कला प्रतिभा का परिचय दिया।
एलटीजी सभागार में आयोजित कार्यक्रम में शशरेक के साथ संगत कलाकारों में हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के कलाकार मौजूद थे। शशरेक ने दोनों संगीत पर आधारित रचनाओं पर सहज होकर नृत्य किया। उनके साथ मृदंगम पर एमवी चंद्रशेखर, बांसुरी पर जी रघुरामन व तबले पर सचिन शर्मा ने संगत किया। जबकि, उनकी गुरु सिंधु मिश्र ने नटुवंगम पर संगत किया। गायक जी इंलगोवन और नीतिन शर्मा ने गीतों, पदों और अन्य रचनाओं को सुरों में पिरोया।

शशरेक अंबरदार ने अपने नृत्य का आरंभ गणेश स्तुति से किया। तुलसीदास की रचना-गाइए गणपति जगवंदन- राग चारूकेशी और आदि ताल में निबद्ध थी। उन्होंने राग नाटई और तिश्र जाति में निबद्ध अलरिपु में भरतनाट्यम की तकनीकी बारीकियों को उकेरा। उनकी प्रस्तुति में रामचरितमानस का पुष्पवाटिका प्रसंग समाहित था। यह राग गोरखकल्याण और आदि ताल में निबद्ध था। इस प्रस्तुति में उन्होंने राम के भावों को शृंगारिक वर्णन पेश किया। शशरेक ने पदम नदनार पर भाव प्रस्तुत किया। गोपालकृष्ण भारती की इस रचना में शिव भक्त के भावों का वर्णन किया गया था। निम्न वर्ग के उस भक्त को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। वह शिव वाहन नंदी से आग्रह करता है कि वह सामने से थोड़ा सरक जाए ताकि वह भगवान का दर्शन कर सके।

उनकी अगली पेशकश शिवाष्टकम थी। आदि शंकराचार्य विरचित तस्मै नम: परम कारण कारणाय पर आधारित इस रचना में शिव के सम्मोहक रूप का विवेचन था। इस प्रस्तुति में तांडव अंश की प्रधानता थी। यह राग भोपाली और खंड जाति के ताल में निबद्ध थी। शशरेक ने अपनी प्रस्तुति को तिल्लाना से विराम दिया। यह राग मधुवंती और आदि ताल में निबद्ध था। भरनाट्यम की तकनीकी पक्ष के साथ पद संचालन और अंग संचालन की लयात्मक गतियों से उन्होंने समां बांध दिया।
आजकल जहां युवाओं को पश्चिमी और फिल्मी दुनिया से प्रभावित माना जाता है। ऐसे में शशरेक का इतने समर्पण और लगन से शास्त्रीय नृत्य सीख रहे हैं। वे आज के युवाओं के लिए प्रेरणा स्वरूप माने जा सकते हैं। क्योंकि, शास्त्रीय नृत्य सिर्फ एक नृत्य विधा नहीं है। बल्कि यह जीवन को संस्कारित और पूर्णता देती है, जो आज के समय की मांग है।

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