ताज़ा खबर
 

गीता चंद्रन का भरतनाट्यम नृत्य, शब्द और भाव की परतें

धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में मुकदमा दर्ज होने के बाद संभल कूच का ऐलान करने वाले एक क्षेत्रीय समाचार चैनल के मुख्य महाप्रबंधक सुरेश चव्हाण की लखनऊ में गिरफ्तारी के बाद संभल में ऐहतियात के तौर पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है।

गीता चंद्रन का भरतनाट्यम नृत्य,

शब्द और भाव की कई परतें होती हैं। शब्द और उसके भाव एक-दूसरे के सहचर व पूरक हैं। भाषा, साहित्य, संवाद व संचार का अस्तित्व तभी संभव है जब शब्द हैं और उनके भाव हैं। जैन साहित्य और वैदिक साहित्य में भी यही चर्चा की गई है। इन्हीं भावों को भरतनाट्यम नृत्यांगना गीता चंद्रन ने अपने नृत्य में समेटा। नाट्य वृक्ष के रजत जयंती पर दो दिवसीय नृत्य समारोह का आयोजन किया गया। कमानी सभागार में आयोजित उत्सव की पहली शाम गीता चंद्रन ने भरतनाट्यम नृत्य पेश किया। उन्होंने परंपरागत भरतनाट्यम में वैदिक साहित्य और जैन साहित्य को मोहक अंदाज में पेश किया। आमतौर पर, भरतनाट्यम में जावली, पदम, शब्दम, कीर्तन वगैरह को नृत्य में पिरोया जाता रहा है। नृत्यांगना गीता चंद्रन ने शुरुआत नृत्य ‘शब्द’ और ‘भाव’ से किया।

ध्रुपद शैली में रचना ‘ओंकार पंच स्वरित नादम’ को कलाकारों ने गाया। उस पर भावों को नृत्यांगना ने विवेचित किया। अगले अंश में, उन्होंने शब्द और भाव के जरिए रस की उत्पत्ति को लावण्यम के जरिए दर्शाया। इसके लिए उन्होंने व्यासराया तीर्थ की मशहूर कृति ‘कृष्णानि बेगनि बारो’ का चयन किया था। नृत्यांगना गीता चंद्रन ने बहुत बारीकियों से यशोदा, नायिका राधा और भक्त के भावों को निरूपित किया। जहां यशोदा और बाल कृष्ण के बाल सुलभ भावों में वात्सल्य रस का समावेश था, वहीं राधा और कृष्ण के मिलन के प्रसंग में श्रृंगार रस प्रवाहित था। भक्ति रस को दर्शाने के क्रम में, भगवान के चरण कमल को हस्तकों को बेहद खूबसूरत अंदाज में दर्शाया। स्थाई व संचारी भावों के जरिए प्रसंगों को नृत्यांगना ने भावानुकूल तरीके से विवेचित किया।

एक सत्य को विद्वान अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। वैदिक व जैन साहित्य में सत्य को अनेकांत रूप में व्याख्यायित किया गया है। वेद के सूक्त ‘एकम् सत् बहुधा वदंति विप्र’ को आधार बनाकर, गीता चंद्रन ने इसकी परिकल्पना प्रकृति के तत्त्वों-वायु, जल, बीज, गन्ने की मिठास और धर्म से की। प्रकृति के सभी प्राणी एक वायु से ही सांस ग्रहण करते हैं। नदियों का जल प्रवाहित होकर सभी की प्यास बुझाता है और खुद को समुद्र में विलीन कर लेता है। अलग-अलग खेतों के ईख की मिठास एक-सी होती है। वही, इक्षवाकु वंश में जन्मे राम और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव प्रेम का संदेश देते हैं। इन प्रतीकों के जरिए नृत्यांगना ने सूक्त की व्याख्या परिपक्वता और निपुणता के साथ किया। उन्होंने अगले प्रसंग में वाल्मिकी रामायण के अंश को पेश किया। इसमें उन्होंने पहली नजर में सीता के सौंदर्य को देखकर अभिभूत हुए, रावण के भावों को विवेचित किया। संभवत: इस तरह का प्रयास पहली बार किसी नृत्यांगना ने किया हुआ। उन्होंने इस प्रस्तुति में एक अनछुए पहलू को उजागर किया।

उन्होंने अपने नृत्य का समापन परंपरागत तिल्लाना से किया। इसका समापन श्लोक ‘आकाश पतितम तोयम यथा’ से हुआ। इस भरतनाट्यम प्रस्तुति की साहित्य परिकल्पना लेखिका सुधामई रघुनाथन की थी। इसके अलावा, संगीत रचना में के वेंकटेश्वरन व डॉक्टर एस वासुदेवन ने सहयोग किया था। संगत कलाकारों में शामिल थे-नटुवंगम पर शरण्या चंद्रन, गायन पर के वेंकटेश्वरन व राधिका कठल, मृदंगम पर आर श्रीगणेश, वायलिन पर जीआर प्रसाथ और बांसुरी पर रजत प्रसन्ना।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App