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सूरजकुंड : मेले की कला में भंवरी की परंपरा

2015 में भंवरी देवी की मृत्यु हो गई तो परिवार ने उनकी परंपरा को निभाए रखा। आज उनकी पुत्रवधु गुलाब देवी उनकी परंपरा को निभा रही हैं। बड़ी चौपाल के अपने घर के सामने ही स्टाल लगाने वाली गुलाब देवी बताती हैं कि...

Author Published on: February 7, 2019 6:06 AM
2015 में भंवरी देवी की मृत्यु हो गई तो परिवार ने उनकी परंपरा को निभाए रखा।

अनूप चौधरी

सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला आज बेशक हर साल करोड़ों लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका हो, इस मेले को सजाने, संवारने और मुकाम तक पहुंचाने की बुनियाद को जानी अनजानी कई हस्तियों ने मजबूत किया है। इन्हीं में एक नाम है भंवरी देवी का, जो पहले सूरजकुंड मेले में गोबर लीपने आई थीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंशीलाल ने 1987 में सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले को शुरू करवाया था। मेला अरावली की पहाड़ियों की मनोरम छटा के बीच लगाया गया था इसलिए इसे स्थायी निर्माण के बगैर पारंपरिक देहाती छाप देने का निर्णय लिया गया। इसी में इसकी दीवारों को गोबर से लीपने का निर्णय लिया गया। ऐसे में मेले को पारंपरिक रूप देने के लिए कुछ महिला श्रमिकों को गोबर लिपाई के लिए बुलाया गया था। इन्हीं महिला श्रमिकों में एक थीं राजस्थान के नागौर की रहने वाली भंवरी देवी। भंवरी देवी ने लिपाई का काम खत्म होने के बाद मेला अधिकारियों से आग्रह किया कि एक कोने में वह भी अपना कुछ सामान बेच सकती हैं क्या?

मेला अधिकारियों ने तुरंत उनके आग्रह को स्वीकार कर लिया। भंवरी ने घर के रद्दी सामान से सजावटी सामान तैयार किया और मेले में बेचना शुरू कर दिया। मेले में आने वाले लोगों को दिखाने के लिए वे घर से हाथ की आटा चक्की भी ले आईं। इसके बाद वे हर साल कई महीने पहले से ही मेले की तैयारी करने लगीं। यही नहीं भंवरी ने हर साल मेले की दीवारों को विभिन्न शैलियों में गोबर लिपाई कर कच्चे-पक्के रंगों से सजाने में भी कोई कसर नहीं रखी। 2015 में भंवरी देवी की मृत्यु हो गई तो परिवार ने उनकी परंपरा को निभाए रखा। आज उनकी पुत्रवधु गुलाब देवी उनकी परंपरा को निभा रही हैं। बड़ी चौपाल के अपने घर के सामने ही स्टाल लगाने वाली गुलाब देवी बताती हैं कि कसीदाकारी और गोटे का काम उन्होंने अपनी सास से ही सीखा है।

वे इस कला के माध्यम से बंदनवार, लड़ी, झूमर, हाथ से तैयार राजस्थानी गुडिया, गोटा एंब्रायडरी की चोली, कठपुतली और राजस्थानी साफा भी तैयार करती हैं। मदनलाल मेघवाल का कहना है कि यह मेला अब उनके परिवार की परंपरा से जुड़ा है। वह यहां कमाई नहीं बल्कि अपनी मां की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। दिल्ली के चांदनी चौक से मेला देखने आए अमर शर्मा का कहना है कि भीड़भाड़ और प्रदूषित माहौल से निकल कर उन्हें सुकून मिलता है। यहां पूरानी आटा चक्की और हस्तशिल्प देखकर हमें अपने पूर्वजों के रहन-सहन की जीवनशैली का एहसास होता है।

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