पंजाब की राजनीति में एक बार फिर शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के पुराने गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस बहस को और हवा तब मिली जब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पहली बार खुलकर इस संभावित वापसी पर टिप्पणी की और इसे लेकर तीखा राजनीतिक हमला बोला। उनके बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या सच में दोनों पार्टियां फिर से साथ आने की तैयारी में हैं या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है।

9 जून को मालेरकोटला जिले के शामसपुर गांव में आयोजित ‘लोक मिलनी’ कार्यक्रम में भगवंत मान ने शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के संभावित गठबंधन पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर ये दोनों दल फिर से साथ आते हैं, तो यह जनता की भलाई के लिए नहीं बल्कि सत्ता हासिल करने की “बेताब कोशिश” होगी।

मान ने आरोप लगाया कि इन दलों के पास जनता के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं है और वे सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए गठबंधन करते हैं। उनके अनुसार, पंजाब के संसाधनों के दोहन और आम लोगों के हितों को नजरअंदाज करने की राजनीति का दौर अब खत्म हो चुका है।

“सत्ता के लिए मजबूरी में गठबंधन” का आरोप

मुख्यमंत्री मान ने यह भी कहा कि एसएडी और बीजेपी वर्षों तक एक-दूसरे के खिलाफ तीखे आरोप लगाते रहे हैं, इसलिए अगर वे फिर साथ आते हैं तो यह उनके अपने ही पुराने बयानों और टकरावों के खिलाफ होगा। उन्होंने इसे “सत्ता में वापसी की बेताब कोशिश” बताया। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी पहले कई बार भाजपा को “ईडी पार्टी” और अकाली दल को “बेअदबी-नशा राजनीति” से जोड़कर आलोचना कर चुके हैं।

विपक्ष और अंदरूनी राजनीति की अलग राय

हालांकि भाजपा और एसएडी की ओर से अभी तक गठबंधन पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस संभावना को लेकर चर्चा लगातार जारी है। भाजपा के कुछ नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब भाजपा अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने कई मौकों पर यह संकेत दिया है कि पंजाब में मजबूत वापसी के लिए अकाली दल के साथ गठबंधन “जनभावना” का हिस्सा हो सकता है। वहीं भाजपा के मौजूदा पंजाब अध्यक्ष केवेल सिंह ढिल्लों ने कहा कि पार्टी 117 सीटों पर अकेले तैयारी कर रही है, लेकिन भविष्य के सभी विकल्प खुले हैं।

शिरोमणि अकाली दल का जवाब और पलटवार

शिरोमणि अकाली दल की ओर से वरिष्ठ नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि पार्टी का पूरा ध्यान संगठन को मजबूत करने पर है और अभी किसी गठबंधन पर विचार नहीं किया जा रहा। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल अनावश्यक रूप से इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं। हालांकि, शिरोमणि अकाली दल के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर यह भी कहा कि “अगर गठबंधन की चर्चा हो रही है तो इसके पीछे पूरी तरह धुआं नहीं, कुछ आग जरूर है।”

सूत्रों के अनुसार, शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की हाल की दिल्ली यात्रा और उसी समय भाजपा और कांग्रेस से जुड़े कुछ नेताओं की मौजूदगी ने भी राजनीतिक अटकलों को बढ़ा दिया है। हालांकि इसे सिर्फ संयोग भी माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, पंजाब की मौजूदा चुनावी स्थिति इस चर्चा की सबसे बड़ी वजह है। शिरोमणि अकाली दल का ग्रामीण मालवा क्षेत्र में प्रभाव माना जाता है, जबकि भाजपा शहरी इलाकों में मजबूत है। ऐसे में दोनों दलों का साथ आना चुनावी गणित के हिसाब से फायदेमंद माना जा रहा है।

एसएडी और बीजेपी का गठबंधन 1996 में शुरू हुआ था। इसके बाद 1997, 2007 और 2012 में दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई। लेकिन सितंबर 2020 में किसान आंदोलन और कृषि कानूनों के मुद्दे पर यह गठबंधन टूट गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका लगा और वह 73 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई।

फिलहाल दोनों दल सार्वजनिक रूप से किसी भी तरह की बातचीत से इनकार कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक संकेत और बयान यह दिखाते हैं कि गठबंधन की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान इसे “सत्ता में वापसी की बेताब कोशिश” बता रहे हैं। पंजाब की राजनीति में आने वाले महीनों में यह बहस और तेज हो सकती है कि क्या पुराने साथी फिर से साथ आएंगे या नहीं।

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पंजाब के दाखा से बागी अकाली विधायक मनप्रीत सिंह अयाली मंगलवार को चंडीगढ़ में खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) में शामिल होने वाले हैं। अयाली ने हाल ही में शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) से इस्तीफा दे दिया था। शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले SAD से अलग होकर बना एक गुट है। अमृतपाल के पिता तरसेम सिंह और फरीदकोट के सांसद सरबजीत सिंह खालसा की मौजूदगी में अयाली पार्टी में शामिल होंगे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक