राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे विश्वेंद्र सिंह ने शुक्रवार को कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। यह फैसला उन्होंने कांग्रेस की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर आरोप लगाने और भरतपुर-डीग की पार्टी इकाइयों पर स्थानीय निकाय चुनाव में असल पार्टी कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाने के दो दिन बाद लिया।
शुक्रवार सुबह सोशल मीडिया पर अपना बयान साझा करते हुए विश्वेंद्र सिंह ने कहा, “घुट-घुटकर जीने से बेहतर है कि स्वाभिमान के साथ मर जाऊं।”
विश्वेंद्र सिंह के आरोपों के एक दिन बाद डोटासरा ने पार्टी में मतभेद की खबरों को प्रचार बताया था। उन्होंने कहा था, “हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है। यह बीजेपी का टूलकिट है। बीजेपी प्रचार करती है और कांग्रेस में मतभेद दिखाने की कोशिश करती है।”
सिंह ने लिखा, “मैंने जीवन में हमेशा अपने प्रिय गिरिराज महाराज की वाणी और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर ही निर्णय लिए हैं। आज कुछ छोटे-मोटे तथाकथित नेताओं द्वारा दिए गए निराधार बयानों ने मेरे कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया है। मेरी अंतरात्मा भी क्षुब्ध और दुखी है। जिस पार्टी के लिए मैंने अपना जीवन बलिदान किया, अगर वह मेरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण का इस तरह से प्रतिफल देती है, तो मैं अत्यंत आहत हूं।”
इससे पहले, भरतपुर और डीग के कांग्रेस जिला अध्यक्षों ने कथित तौर पर सिंह के खिलाफ पार्टी हाई कमान को शिकायत भेजी थी। 30 सितंबर को एक पोस्ट में पूर्व मंत्री ने आरोप लगाया था कि दोनों ने वास्तविक पार्टी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करते हुए अपने चहेतों को टिकट बांटे और कहा कि मतदाताओं ने चुनावों में इसका जवाब दिया है।
सिंह ने भरतपुर-डीग में कांग्रेस के पतन के लिए कौन जिम्मेदार है? उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा था कि मतदाता अब जिला अध्यक्षों और डोटासरा को जवाबदेह ठहराने के लिए तैयार हैं। सिंह ने कहा कि भरतपुर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह जिला है और वहां कांग्रेस को मजबूत होना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय नेतृत्व ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है।
एक अलग पोस्ट में उन्होंने डोटासरा को भी निशाना बनाते हुए कहा था कि उन्होंने पिछली कांग्रेस सरकार में अपने परिवार के सदस्यों को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया। उन्होंने कहा कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं को तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे देना चाहिए, या कांग्रेस पार्टी के उच्च कमान को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर देना चाहिए।
भाजपा ने पिछले कई वर्षों में इसी तरह के आरोप लगाए हैं और कांग्रेस और डोटासरा ने कई मौकों पर इनका खंडन किया है।
सिंह ने शुक्रवार को कहा, “मैंने हमेशा गरिमा, सम्मान और आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन जिया है। मैंने कभी अपने सिद्धांतों और आदर्शों से समझौता नहीं किया। मेरे कार्यकर्ता चापलूसी की मौजूदा परंपरा से नाराज हैं। अगर सच बोलना और झूठ का साथ न देना पाप है, तो मैं हर बार ऐसा करूंगा। मैं न तो गलत करता हूं और न ही गलत को बर्दाश्त करता हूं।”
उन्होंने कहा कि उनका सार्वजनिक जीवन जनता के लिए है और मैं उनके लिए जीता हूँ और उनके लिए मरूंगा। मेरे खून की हर बूंद मेरे कार्यकर्ताओं, मेरे मतदाताओं, मेरे निर्वाचन क्षेत्र के लोगों और राज्य के लिए बही है और बहती रहेगी। मेरा सार्वजनिक जीवन एक खुली किताब है। यह बेदाग है, मैंने कभी भी अपनी प्रतिष्ठा पर कोई दाग नहीं लगने दिया है और न ही कभी लगने दूंगा।”
कांग्रेस के भीतर, डोटासरा के खिलाफ उनके अचानक किए गए तीखे हमले ने इस अटकल को जन्म दिया था कि वह भाजपा में शामिल होने की राह पर हो सकते हैं।
भाजपा से भी सांसद रह चुके हैं विश्वेंद्र सिंह
विश्वेंद्र सिंह भरतपुर के पूर्व शाही परिवार से ताल्लुक रखते हैं। वह भरतपुर के आखिरी शासक ब्रजेंद्र सिंह के बेटे हैं, जिनका 1995 में निधन हुआ था। क्षेत्र के प्रभावशाली जाट नेताओं में गिने जाने वाले विश्वेंद्र सिंह पहले बीजेपी के सांसद भी रह चुके हैं।
उन्होंने 1989 में जनता दल के टिकट पर भरतपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार संसद में प्रवेश किया। इसके बाद 1993 में कांग्रेस के टिकट पर नदबई विधानसभा सीट से विधायक चुने गए।
1999 में वह भाजपा में शामिल हुए और भरतपुर से लोकसभा चुनाव जीता। 2004 में भी उन्होंने इसी सीट से लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद 2013 और 2018 में कांग्रेस के टिकट पर डीग-कुम्हेर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। राजनीति के अलावा विश्वेंद्र सिंह अपने परिवार में सामने आए आंतरिक विवादों को लेकर भी कई बार सुर्खियों में रहे हैं।
2020 का विद्रोह
छह साल पहले, 2020 में विश्वेंद्र सिंह उस समय सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के नेतृत्व में अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ हुई बगावत में अहम भूमिका निभाई थी।
उस समय सरकार के चीफ व्हिप महेश जोशी की शिकायत पर स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) ने दो अलग-अलग FIR दर्ज की थीं। दोनों FIR में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A (राजद्रोह) और धारा 120B (आपराधिक साजिश की सजा) के तहत मामले दर्ज किए गए थे।
पहली FIR विश्वेंद्र सिंह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के बीच हुई कथित बातचीत को लेकर दर्ज की गई थी। बगावत और कथित ऑडियो लीक सामने आने के बाद विश्वेंद्र सिंह को पर्यटन मंत्री के पद से हटा दिया गया था और कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से भी निलंबित कर दिया गया था।
शिकायत में हालांकि विश्वेंद्र सिंह या गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया था। इसमें कहा गया था कि सोशल मीडिया और टेलीविजन चैनलों पर एक बातचीत का ऑडियो चलाया गया, जिसमें दो लोगों को बातचीत करते हुए सुना जा सकता है। शिकायत में उनकी कथित बातचीत का विवरण भी दर्ज किया गया था।
महेश जोशी की शिकायत में कहा गया था कि इस बातचीत में दोनों लोग पैसे के लेन-देन और अशांति फैलाकर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई और कानूनी रूप से स्थापित सरकार को गिराने की साजिश की योजना बना रहे हैं। यह राजद्रोह के दायरे में आता है। इसलिए नियमों के अनुसार साजिशकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाए। जोशी ने शिकायत के साथ कथित बातचीत की ऑडियो क्लिप भी जमा की थी।
सचिन पायलट खेमे के जयपुर लौटने के बाद नवंबर 2021 में हुए कैबिनेट विस्तार में विश्वेंद्र सिंह को फिर से पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी दी गई। उन्हें नागरिक उड्डयन विभाग भी सौंपा गया। दोबारा मंत्री बनाए जाने के बाद विश्वेंद्र सिंह की नजदीकियां सचिन पायलट के बजाय अशोक गहलोत के साथ बढ़ती हुई दिखाई दीं।
अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने दिया इस्तीफा, कौन होगा पंजाब कांग्रेस का नया अध्यक्ष?
अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है। बृहस्पतिवार को वड़िंग ने अपने X अकाउंट के बायो में बदलाव किया और खुद को पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का पूर्व अध्यक्ष बताया। इसी के साथ पंजाब में चर्चा शुरू हो गई है कि पार्टी का नया अध्यक्ष कौन होगा। पढ़ें पूरी खबर।
