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बंगाल: वोटर कार्ड में ‘अन्य’ अंकित कराने में हो रही दिक्कत से नाराज हैं किन्नर

बंगाल किन्नर संघ की प्रमुख रंजीता सिन्हा के मुताबिक बंगाल में सवा पांच लाख के करीब किन्नर हैं, जिसमें से पांच लाख के करीब का नाम मतदाता सूची में शामिल हैं।

कृष्णनगर महिला महाविद्यालय की प्रधानाचार्य मानबी बंद्योपाध्याय।

शंकर जालान

पिछले लोकसभा चुनाव के ऐन पहले यानी अप्रैल 2014 में किन्नरों को तीसरे लिंग यानी अन्य के रूप में मान्यता मिलने पर किन्नर समुदाय के लोगों में जितनी खुशी देखी गई थी। इस फैसले के पांच साल बाद आज वे उतने ही मायूस हैं, जिसका कारण है कि इन पांच सालों में सूबे के करीब सवा पांच लाख किन्नरों में से महज 1426 किन्नरों के मतदाता पहचान पत्र (वोटर कार्ड) में लिंग के स्थान पर महिला या पुरुष की जगह ‘अन्य’ अंकित हो पाया है। बंगाल किन्नर संघ की प्रमुख रंजीता सिन्हा के मुताबिक बंगाल में सवा पांच लाख के करीब किन्नर हैं, जिसमें से पांच लाख के करीब का नाम मतदाता सूची में शामिल हैं, लेकिन ‘अन्य’ के रूप में नहीं, बल्कि महिला या पुरुष के रूप में। रंजीता ने बताया कि किन्नरों के नाम के आधार उन्हें महिला या पुरुष के श्रेणी में डाल दिया जाता है। मसलन किसी किन्नर का नाम रेणु है तो उसके वोटर कार्ड में लिंग के स्थान पर महिला और किसी किन्नर का नाम पवन है तो लिंग के स्थान पर पुरुष अंकित है, जबकि हमारी मांग है कि किन्नर ना तो पुरुष है और ना महिला। कानूनी तौर उनके लिए महिला या पुरुष के स्थान पर अन्य अंकित होना चाहिए, लेकिन नहीं हो पा रहा है। 2014 से 2019 तक इन पांच साल में महज 1426 किन्नरों को ही महिला या पुरुष के स्थान पर ‘अन्य’ अंकित कराने में सफलता मिली है, जिनमें से एक वे खुद हैं।

उत्तर कोलकाता लोकसभा इलाके के रवींद्र सरणी के निवासी अनूप शर्मा नामक किन्नर का आरोप है कि जब उनके समुदाय के लोग वोटर कार्ड में ‘अन्य’ अंकित की मांग को लेकर विभिन्न दलों के सांसद, विधायक व पार्षद के पास जाते हैं तो उन्हें टका का जवाब मिलता है चुनाव आयोग के पास जाओ। जब वे लोग चुनाव आयोग के पास जाते हैं कि वहां बैठे अधिकारी उन्हें यह कहते हुए टाल देते हैं कि क्या फर्क पड़ता है वोटर कार्ड में महिला हो या पुरुष या फिर ‘अन्य’। शोभा बाजार की रहने वाली७ किन्नर पार्वती दास ने बताया कि 2015 में जब तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने मानबी बंद्योपाध्याय को कृष्णनगर महिला महाविद्यालय की प्रधानाचार्य और 2018 में जोइता मंडल को इस्लामपुर लोक अदालत का जज नियुक्त किया गया तो उन्हें आशा जगी थी कि अब उनके समुदाय के लोगों को अपने-अपने वोटर कार्ड में पुरुष या महिला की जगह ‘अन्य’ अंकित कराने में कोई विशेष दिक्कत नहीं होगी, लेकिन मायूसी ही हाथ लगी।

चाहे रंजीता सिन्हा हो या अनूप शर्मा या फिर पार्वती दास। इन सभी की बात इस नजरिए से जायज लगती है कि पांच साल पर केवल 1426 किन्नरों के वोटर कार्ड में ‘अन्य’ अंकित किया जाना, चुनाव आयोग की उदासीनता और नेताओं की गैर जिम्मेदाराना हरकतों को दर्शाता है। मालूम हो कि दो दशक पहले 1998 में मध्य प्रदेश के भोपाल की रहने वालीं किन्नर शबनम मौसी ने विधानसभा का चुनाव जीता था। इसके तीन साल बाद 2001 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की किन्नर आशादेवी और मध्य प्रदेश के कटनी की किन्नर कमला जान ने न केवल नगरपालिका का चुनाव जीता था, बल्कि मेयर भी बनी थीं। देश में किन्नर के विधायक व मेयर और सूबे में प्रधानाचार्य व जज बनने के बावजूद किन्नरों को दस्तावेजों पर ‘अन्य’ का वो हक नहीं मिल पा रहा है, जिनके वे कानूनी तौर हकदार हैं। कृष्णनगर महिला महाविद्यालय की प्रधानाचार्य मानबी बंद्योपाध्याय कहती है कि उनके समुदाय और समाज के बीच बनी अदृश्य खाई को पाटने के लिए वे प्रयासरत हैं। वे कहती हैं कि शबनम मौसी का विधायक और आशादेवी व कमला जान जैसी किन्नरों का मेयर बनना यह दर्शाता है कि किन्नर किसी से कम नहीं। मानबी ने कहा- यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस समुदाय को लेकर पूर्वाग्रह हमारी न्याय व्यवस्था में भी हैं।

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