साल 2006 में ममता बनर्जी ने निर्णायक कदम उठाया जिससे उनकी साख तेजी से बढ़ी और वह सत्ता के शिखर पर पहुंच गईं। जब लेफ्ट सरकार ने हुगली जिले से सिंगूर में टाटा मोटर्स के नैनो प्लांट लगाने के लिए राज्य के आलू-उत्पादक क्षेत्र में 1000 एकड़ उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण किया, तब ममता ने इसके विरोध में एक जमीन-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन शुरू किया, तब ममता बनर्जी ने इसका पुरजोर विरोध किया और जमीन-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन ने बंगाल की राजनीति की दिशा ही बदल दी और लेफ्ट फ्रंट के 34 साल पुराने वर्चस्व के अंत की कथा लिख दी।

दो दशक बाद ममता बनर्जी अपने चौथे कार्यकाल में आने की कोशिश कर रही हैं और इस सीजन में अच्छी फसल हुई तो इस चुनावी अभियान के बीच आलू पट्टी फिर से चर्चा में आ गई है। इस बार लंबे चले जाड़े की मदद से पश्चिम बंगाल में आलू का उत्पादन 140 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, हुगली जिले में लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित मेघसर के हरे-भरे खेत भी, आलू की भारी पैदावार के बीच हुए सड़ रहे आलूओं की दुर्गंध को छिपा नहीं पा रहे हैं।

आलू बेल्ट में हो रही सियासत

विधानसभा चुनाव की तारीख अब बस 10 दिन दूर है, ऐसे में आलू बेल्ट में सियासत तेजी से शुरू हो गई है। बांकुरा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने टीएमसी सरकार पर किसानों को बाहरी बाजारों तक पहुंचने से रोकने का आरोप लगाया था और भाजपा सरकार बनने पर नीतियों में बदलाव का वादा किया था, फिर इसके एक दिन बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिले के दौरे के दौरान भाजपा पर ग्रामीण मजदूरों के सामने आए संकटों के समय सोते रहने और झूठों की आतिशबाजी करने का आरोप लगाया।

ममता बनर्जी ने कहा, “वे दावा करते हैं कि बंगाल में आलू की खेती बर्बाद हो रही हैं। मैं पूछ रही, जब बाढ़ जमीनों को तबाह कर देती है, तो आप कहां होते हैं? आप तो सोते और खर्राटे लेते रहते हैं।” मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि बंगाल का कृषि विभाग घर-घर जाकर सर्वे करता है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि हर प्रभावित किसान को पूरा मुआवजा मिले। उन्होंने कहा,” किसानों को बीमा के लिए एक भी पैसा देने की जरूरत नहीं हैं, इसका पूरा खर्च सरकार उठाती है।” उन्होंने कहा,”सरकार इस क्षेत्र को मॉर्डन बनाने के लिए कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं को लगातार बढ़ा रही है और किसानों को खेती के आधुनिक औजार भी बांट रही है।

दो दिन पहले सिंगुर में आए अमित शाह ने अपने भाषण में बंगाल सरकार पर आरोप लगाया कि राज्य सरकार आलू किसानों को मदद नहीं दे रही। इस दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मौजूद थे।

किसान झेल रहे नुकसान

इस इलाके में पीड़ित किसानों का कहना है कि यह संकट राजनीति से अधिक बड़ा है। मेघसर गांव में देबब्रत बेरा बेबसी से देख रहे हैं कि आलू के 800 बोरे बिना बिके पड़े हैं, उन्होंने कहा, “यह भाजपा या टीएमसी की बात नहीं है। यह 90 दिनों तक कड़ाके की ठंड में मेहनत करने और फिर फेंक देने की बात है।” उनकी 80 साल की मां कौसहा ने कहा, बार-बार अर्जी देने के बाद भी उन्हें टीएमसी सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना के तहत न तो विधवा पेंशन मिली है और न ही कोई और फायदा।

10 बीघे की खेती करने वाले देबब्रत बेरा ने कहा, “इसकी बुवाई में करीबन 40000 प्रति बीघा की लागत लगती है, लेकिन बदले में हमें 15000 रुपये के आसपास मिलते हैं। सरकार ने कहा कि वह हर एक किसान से 70 पैकेट खरीदेगी। अगर उसमें एक भी आलू खराब मिला तो पूरा पैकेट अस्वीकृत कर दिया जाएगा।”

आगे कहा, “बाजार में दाम भी गिर गए हैं, हम 50 किलो की एक बोरी 80 रुपये में बेंच रहे हैं। जीने के लिए कम से कम 450 रुपये तो यह होना ही चाहिए।”

कई सालों से बंगाल में आलू की अतिरिक्त पैदावार से ओडिशा, झारखंड, बिहार और असम के बाजारों की जरूरतें पूरी होती रही है। पर कोलकाता में खुदरा कीमतों को काबू में रखने के मकसद से, राज्यों के बीच आवाजाही पर हाल में लगाए गए बैन क कारण किसानों को अपने आलू के खरीदार ढूंढने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

एक और आलू किसान बिप्लप बेरा ने देबब्रत बेरा की चिंता को सही ठहराया। उन्होंने कहा, “एक 50 किलो को बोरा 100 रुपये में बिक रहा। हमने महीनों तक मेहनत की, लेकिन बाजार हमारे काम को धूल की तरह व्यवहार कर रहा।”

कोल्ड स्टोरेज भी फुल

जिले में एक कोल्ड स्टोरेज ईकाई की क्षमता 2.1 टन लाख है, जिसमें माल भरा हुआ साफ दिखता है। हजारों आलू के बोरे 2 डिग्री सेल्सियस से भी कम तापमान वाली ठंडी और संकरी गलियों में ढेर बनाकर रखे गए हैं, जिन्हें बेहतर कीमतों की उम्मीद में सुरक्षित रखा जा रहा है।

साल 1989 से कोल्ड स्टोरेज चला रहे इसके मालिक रमेश पेरिवाल ने कहा, इस साल आलू का उत्पादन अब तक का सबसे अधिक है। उन्होंने कहा, आलू की बुवाई अक्तूबर के आखिर में आरंभ होती है और दिसंबर तक चलती है। हर साल मार्च के बीच में तापमान तेजी से बढ़ जाता है, जो 34 से 36 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। किसानों को 15 मार्च तक अपनी उपज कोल्ड स्टोरेज यूनिट्स में रख देनी होती है, क्योंकि आलू की खेती के लिए सही तापमान 30 डिग्री सेल्सियस होता है। इस तरह किसानों के पास 80 से 90 दिन ही बचते हैं। इस बात पैदावार 15 से 20 फीसदी अधिक हुई है। मेरे 40 साल के अनुभव में यह अब तक की सबसे अच्छी पैदावार है।

रमेश पेरिवाल ने कहा, “किसानों को कटाई के दौरान पहले ही नुकसान उठाना पड़ा था। प्रति एकड़ पैदावार के मामले में बंगाल सबसे आगे हैं, लेकिन खेती के लिए कम समय मिलता है। राज्य के पास क्षमता और कुशल किसान है, लेकिन उसे एक मजबूत नीति प्रोत्साहन की जरूरत है।”

उद्योग के प्रतिनिधियों ने सुझाया हल

उद्योग के प्रतिनिधियों का इस पर कहना है कि इसका तुरंत हल यह है कि अतिरिक्त पैदावार को राज्य के बाहर भेजा जाए। पश्चिम बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन के सुभाजित साहा ने कहा कि 140 लाख टन के कुछ उत्पादन में से लगभग आधा हिस्सा स्थानीय खपत से ज्यादा है। उन्होंने कहा कि निर्यात पर लगी पाबंधियों की वजह से दूसरे राज्यों को अपनी खेती बढ़ाने का मौका मिल गया। उदाहरण के लिए, यूपी ने उन बाजारों पर कब्जा कर लिया।”

हालांकि कीमतों में भारी अंतर बना हुआ है, एक ओर किसानों को प्रति किलो सिर्फ 2-3 रुपये मिल रहे हैं, तो दूसरी ओर शहरी उपभोक्ता इसके मुकाबले लगभग दस गुना अधिक पैसे दे रहे हैं।

यह भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल चुनाव: AIMIM और हुमायूं कबीर का गठबंधन टूटने से 43 सीटों पर बदलेगा खेल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से चंद दिन पहले एआइएमआइएम का हुमायूं कबीर की पार्टी (आम जनता उन्नयन पार्टी) गठबंधन से अलग होने से एक बार फिर सियासी समीकरण तेजी से बदलने के आसार बढ़ने लगे हैं। खास तौर पर मुर्शिदाबाद, मालदा और दिनाजपुर समेत तीन जिलों की 43 विधानसभा सीटों पर इसका असर पड़ सकता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें