दशकों तक बंगाल एक अपवाद था। यहां क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के दम पर एक दौर में वाममोर्चा और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने लंबे अरसे तक राज किया। अब बंगाल की राजनीति का नया स्वरूप सामने आया है। वर्ग और क्षेत्रीय अस्मिता की लीक छोड़कर बंगाल ने सत्ता विरोधी लहर में राष्ट्रवाद की राह पकड़ी है। मजबूत राजनीतिक ध्रुवीकरण सामने आया है। राजनीतिक लामबंदी के पुराने संकेतक – वर्गीय एका, भाषाई पहचान और क्षेत्रीय गौरव – एक तरह से विस्थापित हो गए हैं। भाजपा की चुनावी रणनीति के आगे ममता बनर्जी की लड़ाकू छवि धराशायी हो गई।

इसके पीछे जानी-पहचानी वजह है : सत्ता-विरोधी लहर। तृणमूल कांग्रेस के लंबे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोप, भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े विवाद और नौकरशाही की मनमानी को लेकर रोजमर्रा की शिकायतों ने तृणमूल कांग्रेस की उस नैतिक साख को कमजोर कर दिया है, जो कभी उसकी लोकप्रियता का आधार थी। समय के साथ, असंतोष व्यापक होता गया। डीए (महंगाई भत्ता) लागू नहीं किए जाने से सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी भी रंग लाई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सत्ता में आने के 45 दिनों के भीतर राज्य में सातवें वेतन आयोग को लागू करने और सरकारी नौकरियों में रिक्तियों को भरने का वादा किया था।

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चुनावों के दौरान राजनीतिक हिंसा के लिए जाने जाने वाले इस राज्य में, भाजपा ने लोगों की सुरक्षा का सवाल उठाया। आरजी कर अस्पताल में बलात्कार-हत्या को बड़ा आंदोलन बनाया। आम मतदाता में बिना किसी डर के अपने मताधिकार का प्रयोग करने का विश्वास पैदा हुआ और वे यह तय कर सके कि वे किसे वोट देना चाहते हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 5.23 लाख पहली बार मतदान करने वाले मतदाता थे, वहीं इस वर्ष मतदाता सूची में 20 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 1.31 करोड़ मतदाता दर्ज थे। युवा वर्ग पर उस आंदोलन का असर हुआ। भाजपा ने मतदाताओं में असंतोष को सफलतापूर्वक परिवर्तन की मांग में बदल दिया है। भाजपा ने खुद को विकल्प के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ताकत के रूप में प्रस्तुत किया, जो बंगाल में सब कुछ ठीक कर देना चाहती है।

इन समीकरणों के साथ संस्थाओं की भूमिका अहम रही है। चुनाव आयोग के द्वारा मतदाता सूचियों की विशेष गहन संशोधन जैसी प्रक्रियाएं राजनीतिक विवाद का विषय बनीं। तार्किक विसंगतियों के नए मानदंडों के कारण लाखों लोगों के नाम कटे। उनके मामले अभी लंबित हैं। चुनावी समीकरण का एक अहम आर्थिक पहलू भी है। भाजपा ‘दोहरे इंजन के विकास’ के नारे – यानी राज्य और केंद्र सरकार के बीच समन्वय से विकास में तेजी आ सकती है – मतदाताओं के एक बड़े वर्ग, विशेषकर बेरोजगारी और अनिश्चित आजीविका का सामना कर रहे युवा मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। औद्योगिक गतिरोध और सीमित निजी निवेश वाले इस राज्य में व्यापक विकास का वादा अहम साबित हुआ। इससे जुड़ा सवाल निम्न-मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग के मतदाताओं के रुझान का है।

वाममोर्चा के पतन के बाद निम्न-मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग के मतदाताओं के बीच खालीपन की स्थिति रही। सरकार तक उनकी बातें पहुंचाने का विकल्प तृणमूल खड़ा नहीं कर पाई थी। एक विश्वसनीय विकल्प के अभाव में, भाजपा ने विपक्षी राजनीति के इस शून्य को भरना शुरू किया। अपने अलग-अलग संगठनों के जरिए इस वर्ग में धीरे-धीरे पैठ बनाई।

बंगाल की राजनीति में बदलाव भाजपा का नया विमर्श

अपने इतिहास के अधिकांश दौर में, बंगाल का राजनीतिक विमर्श भाषाई और सांस्कृतिक विशिष्टता की प्रबल भावना से ओत-प्रोत रहा है। यह पहचान अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर दिखती रही। यह धारणा बनी कि बंगाली पहचान में बहुसंख्यकवादी धार्मिक राजनीति की जगह नहीं, लेकिन चुनावी नतीजों ने अलग संकेत दिया है। भाजपा की रणनीतिक सफलता यह रही कि उसने धार्मिक राष्ट्रवाद के भीतर भाषाई और सांस्कृतिक विशिष्टताओं की बंगाली पहचान को समाहित कर इसे एक व्यापक वैचारिक ढांचे के भीतर पुनर्परिभाषित किया। इस तरह बंगाल में नए तरह का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भाजपा ने प्रस्तुत किया है।

बंगाल की जीत के शिल्पकार केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह रहे हैं, जिन्होंने चुनाव से पहले राज्य में अभूतपूर्व समय बिताया था। इस साल नव वर्ष के मौके पर शाह ने पश्चिम बंगाल में अपने पार्टी सहयोगियों से कहा था, ‘दिल पे लिख लो, इस बार हमारी सरकार।’ चुनाव के दौरान भाजपा के प्रमुख चेहरा रहे शुभेंदु अधिकारी ने पहले ही हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का दावा किया था। उनका दावा था कि 1905 (बंगाल विभाजन, जिसे दो साल बाद रद्द कर दिया गया था) के बाद यह पहली बार है जब राज्य में हिंदू एकजुटता देखने को मिली है। जहां तक तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी का सवाल है, इस चुनाव में उनकी छवि को करारा झटका लगा है।

अजेय समझी जाने वाली ममता बनर्जी ने कहा था कि वह सभी सीटों पर उम्मीदवार हैं। विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के एक दिन बाद, 30 अप्रैल को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक वीडियो संदेश में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से कहा था कि पार्टी विधानसभा की 294 सीटों में से 226 सीटें जीतेगी।

अब बंगाल की राजनीति में ‘परिबोर्तोन’ लाने वाली भाजपा के बदलाव के नारे के आगे परास्त हो चुकी है। वर्ष 2011 में 34 वर्षों के वामपंथी शासन को समाप्त करते हुए मुख्यमंत्री बनने के बाद, ममता बनर्जी ने भाजपा के विरुद्ध मुखर आवाज के रूप में अपनी और अपनी पार्टी की स्थिति को मजबूत किया था। उन्होंने 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की लहर को रोक दिया, और हर बार सीटों और वोटों में वृद्धि की। घोटालों और विवादों के कारण उनके कई पार्टी नेताओं को जेल जाना पड़ा, इसके बावजूद ममता बनर्जी बंगाल में लोकप्रिय नेता बनी रहीं और एक प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में उनकी छवि बरकरार रही। वर्ष 2011 में तृणमूल को 184 सीटें और 38.93 फीसद मत मिले। 2016 में 211 सीटें और 44.91 फीसद मत और 2021 में तृणमूल को 215 सीटें और 48.02 फीसद मत मिले।

लेकिन इस बार इस तेजतर्रार नेता का चुनाव प्रचार – उनकी मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ रणनीति, चुनाव आयोग को निशाना बनाना और भाजपा को बाहरी करार देने का टैग – मतदाताओं को लुभाने में विफल रहा। तृणमूल कांग्रेस ने न केवल उत्तरी बंगाल में, बल्कि अपने गढ़ दक्षिणी बंगाल में भी सीटें गंवाईं। अब बनर्जी के लिए चुनौती यह भी है कि चुनाव परिणामों के बाद अपने समर्थकों को एकजुट कैसे रखेंगी। उनके और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी (जो तृणमूल के महासचिव और सांसद हैं) के इर्द-गिर्द केंद्रित पार्टी में जमीनी स्तर के नेताओं को एकजुट रखना मुश्किल होगा। इस बात के आसार हैं कि केंद्रीय एजेंसियां भ्रष्टाचार के मामलों में जांच के दायरे में आए कई तृणमूल नेताओं और मंत्रियों पर शिकंजा कसेंगी।

ईडी की छापेमारी के दौरान राजनीतिक परामर्श कंपनी – आइपैक – के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास में जबरन घुसने के मामले में बनर्जी खुद भी जांच के दायरे में हैं।

अब चुनाव नतीजों के बाद भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह सुसंगत शासन की योजना प्रस्तुत करे। बंगाल की जनता से किए वादे पूरे करे। बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता की न केवल रक्षा करे, बल्कि इसके गौरव को और मजबूत करे। उसके विरोधियों के लिए भी चुनौती उतनी ही कठिन है – एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में अपनी रणनीतियों, भाषा और मान्यताओं पर पुनर्विचार करना, जो अब पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। जिस बंगाल के जनमानस में करीब चार दशक तक वामपंथी वैचारिकता की गहरी पैठ थी, उस जनमानस में पहले ममता बनर्जी की मध्यमार्गी धारा का बदलाव और अब भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का वैचारिक महापरिवर्तन निश्चित रूप से बहुत बड़ा रूपांतरण है। अब भाजपा के सामने बंगाल को विकास से संवारने की महती चुनौती होगी।

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चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के जैसे नतीजे सामने आए हैं, उनसे साफ है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में जहां मतदाताओं ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया, वहीं असम और पुदुचेरी में लोगों ने मौजूदा सरकार पर भरोसा कायम रखा। इसमें चौंकाने वाले नतीजे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से आए, जहां चुनाव प्रचार के क्रम में बहुस्तरीय उतार-चढ़ाव के बावजूद लोगों के लिए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल था कि सत्ताधारी पार्टियों का प्रदर्शन बेहद कमजोर हो सकता है। इन राज्यों में इतने बड़े उलटफेर की उम्मीद कम ही लोगों ने की थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक