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बंगाल: 75 साल से सिर उठाए खड़ी एक धरोहर, हावड़ा ब्रिज या रबींद्र सेतु

2150 फुट लंबा यह पुल इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है। इसके दोनों पायों के बीच की दूरी 1500 फुट है। अब इससे रोजाना लगभग सवा लाख वाहन और पांच लाख से ज्यादा पैदल यात्री गुजरते हैं। सेतु बनने के बाद इस पर पहली बार एक ट्राम गुजरी थी। 1993 में ट्रैफिक काफी बढ़ने के बाद सेतु पर ट्रामों की आवाजाही बंद कर दी गई।

हावड़ा ब्रिज या रबींद्र सेतु

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की पहचान से जुड़े हावड़ा ब्रिज या रबींद्र सेतु ने 75 साल का सफर पूरा कर लिया है। इस मौके पर उसे रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया है। यहां हुगली नदी में एक रिवर क्रूज के साथ ही एक भव्य कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। वर्ष 1937 से 1942 के बीच बने इस ब्रिज को आम लोगों के लिए तीन फरवरी, 1943 को खोला गया था। लेकिन जापानी सेना की बमबारी के डर से उस दिन कोई बड़ा समारोह नहीं किया गया। पहले हावड़ा व कोलकाता के बीच ठीक उसी जगह एक पीपे का पुल था। 14 जून, 1965 को इस ब्रिज का नाम बदल कर रवींद्र सेतु कर दिया गया। 18वीं सदी में हुगली नदी पार करने के लिए कोई पुल नहीं था। तब नावें ही नदी पार करने का एकमात्र जरिया थीं।

वर्ष 1862 में बंगाल सरकार ने ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के मुख्य अभियंता जार्ज टनर्बुल को हुगली पर पुल की संभावनाओं का पता लगाने का काम सौंपा था। उससे पहले जार्ज ने ही हावड़ा में कंपनी का रेलवे टर्मिनस तैयार किया था। वर्ष 1874 में 22 लाख रुपए की लागत से नदी पर पीपे का एक पुल बनाया गया जिसकी लंबाई 1528 फीट और चौड़ाई 62 फीट थी। इस कैंटरलीवर पुल को बनाने में 26 हजार 500 टन इस्पात का इस्तेमाल किया गया। इसमें से 23 हजार पांच सौ टन इस्पात की आपूर्ति टाटा स्टील ने की थी। बन कर तैयार होने के बाद यह दुनिया में अपनी तरह का तीसरा सबसे लंबा पुल था। पूरा पुल महज नदी के दोनों किनारों पर बने 280 फुट ऊंचे दो पायों पर टिका है।

इसकी खासियत यह है कि इसके निर्माण में इस्पात की प्लेटों को को जोड़ने के लिए नट-बोल्ट की बजाय धातु की बनी कीलों यानी रिवेट्स का इस्तेमाल किया गया है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी वायुसेना ने इस पुल को नष्ट करने के लिए भारी बमबारी की थी। लेकिन संयोग से इसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा। उस बमबारी को ध्यान में रखते हुए पुल के तैयार होने के बाद कोई उद्घाटन समारोह आयोजित नहीं किया गया। पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष विनीत कुमार कहते हैं कि यह इंजीनियरिंग का महज एक नायाब नमूना ही नहीं है। रवींद्र सेतु देश और दुनिया के लोगों के लिए कोलकाता की पहचान है। वे बताते हैं कि पुल के इतिहास पर शीघ्र एक फोटो प्रर्दशनी आयोजित की जाएगी। इसके अलावा इसे सिडनी हार्बर की तर्ज पर एलईडी बत्तियों से सजाया जाएगा। नदी में क्रूज के दौरान आयोजित समारोह में हावड़ा ब्रिज पर एक काफी टेबल बुक का भी विमोचन किया गया।

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