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गुजरात में लामबंद हुए दलित, मरे हुए पशुओं को उठाने से इनकार, समाज में बराबरी की मांग

गांव में उच्च जातियों पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए, लोर में दलितों ने मवेशियों के शवों को नपटने के काम को अपनी "प्रथागत" सेवा के हिस्से के रूप में बंदकर दिया है। उनका कहना है यह एक "गंदी और अवैतनिक" नौकरी है जो उन्हें मजबूरन करनी पड़ती है।

Author May 16, 2019 10:16 AM
गुजरात में दलितों ने मवेशियों के शव उठाना बंद कर दिया है। (pc- indian express)

Behind Gujarat boycott: करीब छह महीने पहले विक्रम ठाकोर नामक एक व्यक्ति की भैंस की मौत हो गई थी। वह शव को ट्रैक्टर के साथ मेहसाणा के लोर गांव के बाहरी इलाके में एक निर्जन स्थान पर ले गया। विक्रम ने कहा, “हमने उस शव को खुद ठिकाने लगाया,” गांव में दलितों ने दो साल पहले मवेशियों के शव उठाना बंद कर दिए हैं। कुछ महीने पहले, मेरे घर के पास एक कुत्ते की मौत हो गई थी और मुझे इसे इसी तरह से निपटाना पड़ा था।” गांव में उच्च जातियों पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए, लोर में दलितों ने मवेशियों के शवों को नपटने के काम को अपनी “प्रथागत” सेवा के हिस्से के रूप में बंदकर दिया है। उनका कहना है यह एक “गंदी और अवैतनिक” नौकरी है जो उन्हें मजबूरन करनी पड़ती है।

दलितों ने यह फैसला इसलिए लिया है क्योंकि सवर्णों ने दलितों का सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक दलित दूल्हे ने घोड़े पर शादी की बारात निकाली तो गांव के सवर्णों ने 8 मई को दलितों के सामाजिक बहिष्कार का आह्वान किया। एक शिकायत के आधार पर, पुलिस ने सामाजिक बहिष्कार के आदेश के लिए गांव के सरपंच और उप सरपंच सहित पांच उच्च जाति के पुरुषों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

लोर में ठाकोर बहुसंख्यक हैं, जिनकी आबादी 1,600 से अधिक है। विक्रम और लोर के कई अन्य ठाकुरों ने संकेत दिया कि यद्यपि वे शवों को नहीं निपटने के दलितों के दावे को पसंद नहीं करते हैं, लेकिन वे उन्हें मजबूर नहीं कर सकते। ठाकोर ने इस आरोप से इनकार किया कि यह मुद्दा कथित बहिष्कार से जुड़ा है। मुकेश श्रीमाली ने कहा “हमारी पुरानी पीढ़ी जानवरों के शवों को उठाती थी और यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से जारी है। हम (दलितों) को इसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिल रहा था और लंबे समय तक यह सेवा हम पर एक प्रथा के रूप में लागू थी। उन्हें लगता है कि दलितों को यह करना होगा।”

लोर के ताल-सह-मंत्री (राजस्व क्लर्क), वर्षा ठाकोर ने कहा, “समझौता के लिए हुई एक बैठक के दौरान (सामाजिक बहिष्कार के लिए पांच लोगों को गिरफ्तार किए जाने के बाद), गैर-दलितों की एक प्रमुख शिकायत यह थी कि दलित अब जानवरों के शवों को नहीं उठाते हैं।”
भीखाभाई परमार (81) -महुल के दादा, जिनकी शादी के बाद दलितों ने कथित तौर पर सामाजिक बहिष्कार का सामना किया का कहना है “हम इसे सामाजिक मजबूरी से बाहर निकालने और घर्षण से बचने के लिए करते थे। मैंने मरे हुए जानवरों को उठाया है। जब हम शव उठाते थे तो गैर-दलितों ने हमारे साथ घृणा का व्यवहार किया।”

लोर के एक अन्य दलित विष्णु सेनवा ने कहा कि दलितों को हमेशा धार्मिक कार्यों और सामुदायिक कार्यक्रमों के दौरान अलग-अलग और अंधेरी जगह पर बैठने के लिए कहा जाता है। उन्होंने कहा “हम मांग कर रहे हैं कि सभी को एक साथ खाना चाहिए। हालांकि, वे सपाट रूप से मना कर देते हैं। इसके अलावा, गांव के नाई गैर-दलितों के दबाव में नाई दलितों के बाल नहीं काटता।” हालांकि, कम से कम दो ठाकोर समुदाय की महिलाओं ने संकेत दिया कि सवर्णों समुदाय दलितों का बहिष्कार कर रहे है। एक महिला ने कहा। “वे कहते हैं कि हमें उनके साथ बैठना और एक साथ भोजन करना चाहिए। हम कैसे अनुमति दे सकते हैं? ” एक अन्य महिला ने कहा, “हमें मृत जानवरों को उठाना पड़ता है और उन्हें निपटाने की व्यवस्था करनी पड़ती है। यदि वे (दलित) अपना काम नहीं करते हैं, तो हमें क्या करना चाहिए?”

सामाजिक कार्यकर्ता मार्टिन मैकवान ने कहा कि लोर गुजरात का एकमात्र गाँव नहीं था जहाँ दलितों ने शव उठाना बंद कर दिया है। “ऊना के बाद (2016 में दलितों द्वारा दलितों को भगाने की सार्वजनिक धमकी) के बाद, मैंने एक अध्ययन किया और पाया कि गुजरात में लगभग 30 गाँव थे जहाँ दलितों ने मृत पशुओं को उठाना बंद कर दिया था। ये दर्शाता है है कि संबंध आगे बदलने जा रहा है। दलित युवक स्पष्ट हैं कि वे किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं करेंगे। ”

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