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30 साल से नक्सलियों का गढ़ है बस्तर, पार पाने के लिए ये 5 बड़ी कोशिश कर चुकी है सरकार

एक समय था जब बस्तर के अधिकांश इलाके में युवाओं के हाथ में हथियार और लोकतंत्र के खिलाफ आवाज मुखर होती थी। बस्तर को लाल आतंक का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन आज बस्तर के हालात में बहुत बदलाव आया है।

Chhattisgarh, 7 naxal killed, Dantewada-Bijapur, District Reserve Guard, stf, 2 INSAS rifles, police naxal Encounter underway, Hindi news, news in hindi, Jansattaप्रतीकात्मक तस्वीर।

करीब 40,000 वर्ग किलोमीटर में फैले बस्तर इलाके में लौह-अयस्क का प्रचुर भंडार है। जनजाति बहुल इस इलाके में 12 विधानसभा क्षेत्र हैं। 1980 के दशक के आखिर से यह बड़े नक्सलियों का पनाहगाह रहा है। एक समय था जब बस्तर के अधिकांश इलाके में युवाओं के हाथ में हथियार और लोकतंत्र के खिलाफ आवाज मुखर होती थी। बस्तर को देश में लाल आतंक का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन आज बस्तर के हालात में बहुत बदलाव आया है।

बस्तर को नक्सलियों से मुक्त कराने के लिए सरकार की 5 बड़ी कोशिश

सुरक्षा बलों का इस्तेमाल
केंद्र सरकार ने बस्तर में नक्सलियों का उन्मूलन करने के लिए राज्य के 25,000 पुलिसकर्मियों के अलावा अर्धसैनिक बल के करीब 55,000 जवानों को तैनात कर रखा है। सुरक्षा बलों पर कई हमलों के बाद भी उनके अदम्य साहस और बलिदान के आगे नक्सली अब लगभग हार मान चुके है। नक्सली अब निराशा में सबसे पहले सुरक्षबलों को ही टारगेट बनाते है क्योंकि उन्हें भी पता है कि जब तक सुरक्षाबल तैनात रहेंगे नक्सलियों के मंसूबे कामयाब नहीं होंगे। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भी सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद है। बस्तर क्षेत्र में वर्तमान में 150 से अधिक पैरामिलिट्री कंपनियों को तैनात किया गया है।आईटीबीपी, सीआईएसएफ और बीएसएफ की टुकड़ियों की तैनाती भी हो गयी है।

आत्मसमर्पण की योजनाएं
आदिवासी इलाके के भटके हुए नौजवानों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए राज्य सरकार की कवायद धीरे-धीरे रंग ला रही है। सरकार का दावा है कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास योजना में शामिल करने के उत्साहजनक परिणाम आये है। इसके साथ ही कई नक्सली समर्पण के बाद मिलने वाली भारी भरकम रकम के लालच में भी आत्मसमर्पण को प्रेरित हो रहे है। नक्सलियों में आपसी फूट भी आत्मसमर्पण की एक प्रमुख वजह है। जंगलों में सुरक्षा बलों के ताबड़तोड़ ऑपरेशन भी नक्सलियों में सरेंडर की मुख्य वजह है।

विकास के बल पर तस्वीर बदलने की कोशिश
लाल आतंक का गढ़ माने जाने वाले बस्तर में सरकार विभिन्न योजनाओं के जरिये आदिवासियों में अपनी पैठ बना चुकी है। सरकार ने कौशल विकास जैसे कार्यक्रमों से बस्तर के युवाओं में एक उम्मीद की किरण जगाई है। दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जैसे इलाकों में लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए पसंद के अनुसार प्रशिक्षण ले रहे है। आतंक का रास्ता छोड़ स्वयं सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं ने स्वावलम्बी बनने की दिशा में कदम बढाया है। इन महिलाओं ने लाइवलीहुड कालेज से सिलाई-कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण लेकर अपना स्वसहायता समूह तैयार किया और जिला प्रशासन के सहयोग से कैंटीन, दुकान आदि खोल आर्थिक मजबूती पायी।

गांव वालों को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश
छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वाधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में आम लोगों तक सरकारी योजनाओ की पहुँच बनाकर उनको लोकतंत्र की मुख्यधारा में लाने का काम किया जा रहा है। प्रशासन की ओर से युवाओं में लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाने हेतु ग्रामीणों से वार्तालाप किया जा रहा है, खेलकूद, नौकरी के लिए प्रशिक्षण आदि के माध्यम से युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा रहा है। कैम्प लगाकर प्रशिक्षित युवाओं को रोजगार प्रदान किया रहा। आमलोगों और प्रशासन के बीच बनते संबंधों से कई बार नक्सली अपने ही लोगों पर हमला करने से बाज नहीं आते।

नक्सलियों से बातचीत और सार्थक प्रयास
कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने नसलियों से बातचीत की पेशकश की थी। सरकार की योजनाओं की बात करते हुए उन्होंने कहा कि हम नक्सल इलाकों में विकास को प्राथमिकता देते है। आयुष्मान भारत योजना की शुरुवात बस्तर संभाग के बीजापुर जिले से ही शुरू की गयी थी। दुर्भाग्यवश नक्सलियों से बातचीत का दौर अधिकतर शर्तों के साथ ही हुआ, कभी नक्सलियों द्वारा किसी को अगवा करने के बाद तो कभी किसी को रिहा करने की शर्त पर। फिलहाल प्रशासन कभी नरम तो कभी गरम रुख के जरिये नक्सलियों से पेश आता है लेकिन आम आदिवासियों से प्रशासन लोकतंत्र की राह में आने की लगातार अपील करता आया है।

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