जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर अपना पहला चुनाव बांकीपुर विधानसभा सीट से लड़ सकते हैं। यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद खाली हुई है। जिसकी वजह से बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हो रहा है। इस सीट पर 30 जुलाई को मतदान होगा। बिहार विधानसभा चुनाव के अभी 8 महीने हुए हैं। ऐसे में अगर प्रशांत किशोर इस सीट से चुनाव जीतते हैं तो यह उनकी पार्टी के लिए पहली जीत होगी।

जन सुराज पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, प्रशांत किशोर, जिन्होंने नवंबर 2025 में अपनी पार्टी के पहले विधानसभा चुनाव में किसी भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ा था, अब बिहार के प्रतिष्ठित बांकीपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं, जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन द्वारा खाली की गई थी।

बांकीपुर सीट पटना के अंतर्गत आती है, जिसे भाजपा ने 1995 से लगातार चुनावों में जीता है। बांकीपुर से पांच बार विधायक रहे नवीन ने इस साल की शुरुआत में भाजपा अध्यक्ष के रूप में जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी बनने और उसके बाद राज्यसभा के लिए चुने जाने के मद्देनजर सीट से इस्तीफा दे दिया था ।

इस सीट की अहमियत को देखते हुए सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा अपने गढ़ को बरकरार रखने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने की उम्मीद है, जिससे राज्य की राजधानी में एक बेहद रोमांचक उपचुनाव की टक्कर होने की संभावना है।

हालांकि जन सुराज पार्टी की कोर कमेटी 5 जुलाई को बांकीपुर से अपने उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा करेगी। सूत्रों ने बताया कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व किशोर की उम्मीदवारी के लिए जोर लगा रहे थे।

जन सुराज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने गुरुवार को पत्रकारों से कहा, “जन सूरज पार्टी ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। पार्टी की कोर कमेटी की बैठक के बाद 5 जुलाई को इसकी औपचारिक घोषणा की जाएगी। भाजपा के कुशासन से परेशान बांकीपुर के लोग प्रशांत किशोर को यहां से चुनाव लड़ते देखने की मांग कर रहे हैं। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी हमारे चुनाव अभियान के सूत्रधार प्रशांत किशोर के प्रति यही भावना रखते हैं।”

हालांकि भाजपा ने अभी तक अपने उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पार्टी के उम्मीदवारों में नील रंजन घोष जो एक अनुभवी पार्टी कार्यकर्ता हैं और नवीन के करीबी माने जाते हैं सबसे आगे चल रहे हैं। विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने भी अभी तक इस सीट के लिए अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

भाजपा के लिए दांव पर क्या लगा है?

भाजपा के लिए, बांकीपुर 1995 से पार्टी का गढ़ रहा है, जिसे पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में उनके बेटे नितिन नवीन ने संभाला था।

अप्रैल में नीतीश कुमार की जगह बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद सम्राट चौधरी के लिए यह उपचुनाव पहली बड़ी चुनावी परीक्षा साबित होगी। हार, या कम अंतर से जीत भी उनकी राजनीतिक पकड़ को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएगी और विपक्ष को उनके नेतृत्व को चुनौती देने का नया मौका देगी।

एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, “चूंकि नितिन नवीन अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इसलिए पदोन्नति के तुरंत बाद अपने गृह क्षेत्र को खोना राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के लिए एक शर्मनाक मनोवैज्ञानिक झटका होगा।”

पटना के शहरी क्षेत्र विशेष रूप से बांकीपुर का प्रभावशाली कायस्थ मतदाता वर्ग और व्यापारी समूह बिहार में भाजपा की शहरी पहचान का आधार हैं। पार्टी को यह साबित करना होगा कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भी उसके मुख्य शहरी मतदाता पूरी तरह से वफादार बने हुए हैं।

जन सुराज के लिए क्या दांव पर लगा है?

प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी के लिए यह उपचुनाव राजनीतिक वापसी का एक महत्वपूर्ण अवसर होगा। बिहार चुनावों में पार्टी ने राज्य की 243 सीटों में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे एक भी सीट नहीं मिली और वह केवल 3.4% वोट शेयर हासिल हुए। बांकीपुर पार्टी के बारे में प्रचलित धारणा को “महज प्रचार” से बदलकर “संभावित विकल्प” के रूप में प्रस्तुत करने का तत्काल अवसर प्रस्तुत करता है।

अगर प्रशांत किशोर इस सीट से चुनाव लड़ते हैं, तो उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक साख दांव पर लग जाएगी। उन्होंने इस उपचुनाव को “सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के पिछले दरवाजे पर जनमत संग्रह करार दिया है। अगर किशोर चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं या भाजपा के आधार को तोड़कर मजबूत दूसरे स्थान पर भी आ जाते हैं तो इससे जन सुराज पार्टी राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, खराब प्रदर्शन से बिहार के पहले से ही प्रतिस्पर्धी राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी हाशिए पर जा सकती है।

प्रशांत किशोर ने जन सुराज पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर नेटवर्क बनाने में कई साल बिताए। मुख्य रूप से पैदल मार्च के माध्यम से ग्रामीण बिहार पर ध्यान केंद्रित किया। पटना के शिक्षित, पारंपरिक रूप से भाजपा समर्थक शहरी मतदाताओं को एक नई पार्टी के साथ प्रयोग करने के लिए राजी करना उनकी पार्टी के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है। जहां एक ओर भाजपा अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए संघर्ष कर रही है और जन सुराज पार्टी यथास्थिति को बदलने की कोशिश कर रही है। वहीं आरजेडी भी शहरी वोटों में किसी भी तरह के विभाजन का फायदा उठाकर सफलता हासिल करने की तलाश में है।

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