मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैहर क्षेत्र के चार दूरदराज और बैगा-बहुल गांवों में पिछले एक महीने में छह बच्चों की मौत हो गई है, जबकि करीब 100 अन्य बच्चे बीमार पड़े हैं। स्वास्थ्य विभाग को इन मौतों की जानकारी तब मिली, जब तीन बच्चों की पहले ही मौत हो चुकी थी।

बीमारी और मौतों का सटीक कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है। हालांकि, अधिकारियों के सामने तत्काल चुनौती इन दूरदराज इलाकों में बच्चों को ढूंढना और उनके माता-पिता को उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए राजी करना था। आखिरकार, स्वास्थ्य अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ी कि बच्चों को अस्पताल भेजा जाए।

एक से 13 वर्ष की उम्र के ये बच्चे बैहर क्षेत्र के अडोरी, कुंडेकसा, बोंदारी और कोरका गांवों के रहने वाले हैं। उनमें तेज बुखार, शरीर पर चकत्ते, लाल धब्बे, पेट दर्द और मुंह में छाले जैसे लक्षण पाए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, बीमार पड़े 100 बच्चों में से 47 फिलहाल अस्पतालों में भर्ती हैं, जबकि 54 का इलाज घर पर चल रहा है।

बीमारी का सटीक कारण अभी पता नहीं चलने के कारण रक्त के नमूने कोलकाता स्थित आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च इन बैक्टीरियल इन्फेक्शंस और पुणे स्थित आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी भेजे गए हैं। जबलपुर मेडिकल कॉलेज की एक टीम भी इस प्रकोप की जांच कर रही है।

चुनौतियों की एक श्रृंखला

बीमारी की पहचान करने से पहले अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को ढूंढना थी। बालाघाट जिला अस्पताल में कई प्रभावित बच्चों का इलाज चल रहा है। बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) परेश उपल ने कहा, “हमें मौतों के बारे में तब पता चला, जब तीन बच्चों की मौत हो चुकी थी। एक स्थानीय व्यक्ति से सूचना मिलने के बाद हमने एक टीम भेजी।”

इसके बाद टीम को प्रभावित बस्तियों तक पहुंचने के लिए बेहद कठिन सफर करना पड़ा। उपल ने कहा, “भू-भाग तक पहुंचना बेहद मुश्किल था, क्योंकि कुछ घर छोटी पहाड़ी पर बने हुए थे, जबकि कुछ घने जंगल वाले इलाकों के पास स्थित थे। इसलिए जमीन पर स्वास्थ्य जांच करना बहुत मुश्किल था।”

जब स्वास्थ्य टीमें गांवों तक पहुंचीं, तो अधिकारियों के सामने एक और समस्या आई—परिवार मामलों की जानकारी देने से झिझक रहे थे। उपल ने कहा, “ग्रामीण मामले सामने लाने को लेकर बेहद झिझक रहे थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया जाए।”

उन्होंने कहा, “हम इन लोगों को इलाज के लिए अपने बच्चों को सौंपने के लिए राजी नहीं कर पा रहे थे।” अधिकारी वहां से लौटे और पुलिस के साथ वापस आए। उपल ने कहा, “हमें वापस जाकर पूरे पुलिस प्रशासन की मदद लेनी पड़ी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हम उन बच्चों को अस्पताल पहुंचा सकें।”

तब तक कुछ परिवार बीमार बच्चों का इलाज करने या उन्हें ठीक करने के प्रयास में झाड़-फूंक और अन्य पारंपरिक उपायों का सहारा लेने लगे थे। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, “इसमें भी काफी समय लगा।”

‘माता-पिता ने बच्चों को जंगलों में छिपा दिया’

मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। उपल ने कहा, “हमारे सामने ऐसा मामला भी आया, जिसमें माता-पिता ने अपने बच्चों को जंगलों में छिपा दिया था।” स्वास्थ्य अधिकारियों को बच्चों को ढूंढकर उन्हें चिकित्सा सुविधा तक लाना पड़ा। हालांकि, बच्चों के अस्पताल पहुंचने के बाद भी विरोध खत्म नहीं हुआ।

उपल के अनुसार, कुछ मामलों में माता-पिता अपने बच्चों के पीछे अस्पताल तक पहुंच गए और उन्हें औपचारिक रूप से छुट्टी मिलने से पहले ही वहां से ले जाने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “हमारे सामने ऐसा मामला भी आया, जिसमें माता-पिता ने अस्पताल में अपने बच्चों का पता लगा लिया और फिर उन्हें बिना डिस्चार्ज स्लिप के वहां से ले जाने की कोशिश की।”

विभाग ने परिवारों को बच्चों को चिकित्सकीय निगरानी में रखने के लिए राजी करने में काफी समय लगाया। प्रकोप की जांच जारी रहने के बीच स्वास्थ्य विभाग ने अब प्रभावित क्षेत्र में कई टीमें तैनात कर दी हैं। एक पहाड़ी पर एक चिकित्सा केंद्र स्थापित किया गया है, जहां दो चिकित्सा अधिकारियों को मामलों की निगरानी के लिए तैनात किया गया है।

जिला प्रशासन ने प्रभावित गांवों में अस्थायी स्वास्थ्य शिविर भी स्थापित किए हैं। दो आईसीएमआर प्रयोगशालाओं में नमूनों की जांच किए जाने के साथ-साथ बच्चों में दिखाई देने वाले लक्षणों की निगरानी की जा रही है।