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कभी बेमिसाल रहा अस्पताल आज खुद बीमार

अवध क्षेत्र में अपनी विशिष्टता और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए जाना जाने वाला बहराइच का अस्पताल अब यहां तैनात चिकित्सकों के गैर-जिम्मेदाराना रवैए और भ्रष्टाचार के चलते खुद बीमार हो गया है।

Author बहराइच | Updated: November 27, 2015 11:00 PM
Thirty year old woman, birth, 5 infants, same time, gujarat newsप्रतीकात्मक तस्वीर।

अवध क्षेत्र में अपनी विशिष्टता और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए जाना जाने वाला बहराइच का अस्पताल अब यहां तैनात चिकित्सकों के गैर-जिम्मेदाराना रवैए और भ्रष्टाचार के चलते खुद बीमार हो गया है। आपातकालीन सेवाओं तक से डॉक्टरों के विमुख रहने के चलते चिकित्सालय के चारों ओर प्राइवेट नर्सिंग होम का संजाल फैल चुका है। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का जायजा लेने के लिए स्वास्थ्य महानिदेशालय की ओर से गठित चार सदस्यीय टीम ने अपने निरीक्षण में पाई गई गंभीर खामियों का उल्लेख करते हुए इस बाबत अपनी रिपोर्ट भी शासन को भेज दी है।

राज्य के सर्वाधिक पिछड़े जिलों में से एक बहराइच के बाशिंदों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए सन 1962 में तत्कालीन सरकार में खाद्य मंत्री हुकूम सिंह विसेन और जिला पंचायत अध्यक्ष रहे पं भगवान दीन बैद्य की कोशिशों से नगर से सटे लगभग दो एकड़ बेशकीमती जमीन पर इस चिकित्सालय की स्थापना की गई थी। दो सौ शैया वाले इस अस्पताल ने कम समय में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के चलते अपनी साख समूचे जिले के अलावा पड़ोसी जिलों श्रावस्ती, बलरामपुर, सीतापुर, लखीमपुर समेत नेपाल तक में बना ली थी। बाद में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सहयोग के चलते बेहतर आपातकालीन सेवाओं की त्वरित उपलब्धता से भी यह चिकित्सालय समूचे अवध क्षेत्र में बेमिसाल बन गया था।

लेकिन अब चिकित्सकीय गुणवत्ता में लगातार गिरावट और यहां तैनात चिकित्सकों के बीच पैसा कमाने की होड़, इलाज में लापरवाही और राजनीतिक वर्चस्व के चलते यहां की स्वास्थ्य सेवाओं पर जैसे ग्रहण लग गया है। सरकारी सेवारत चिकित्सक नियमों को धता बता कर और प्रशासन की आंख में धूल झोंक कर खुद नर्सिंग होम का संचालन कर पैसा बना रहे हैं। दूसरी ओर, गरीब तबकों के मरीज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर पाने की वजह से मरने या बिना इलाज के रहने को लाचार हैं।

यहां हृदय रोग समेत हड्डी रोग विशेषज्ञों की कुर्सी लंबे समय से खाली है। वर्तमान में इस चिकित्सालय में चर्म, शलय, औषधि, पैथोलॉजी, अस्थि रोग, बाल रोग विभाग काम कर रहे हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर विभागों में विशेषज्ञों के पद लंबे समय से रिक्त हैं। महज डिप्लोमाधारी चिकित्सकों के भरोसे प्रदेश सरकार का सबको बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने का नारा कम से कम यहां बेमानी साबित हो रहा है। हालत यह है कि आपातकालीन सेवाओं के लिए भी डॉक्टरों की अनुपलब्धता है। आए दिन दुर्घटनाओं में पीड़ित और तीमारदार दर-दर भटकते रहते हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यहां सभी जीवन-रक्षक और आवश्यक दवाएं उपलब्ध हैं। लेकिन सरकारी खरीद में हुई कमीशनबाजी के चलते खरीदी गई दवाओं का स्तर इतना घटिया है कि न तो मरीजों का इन पर विश्वास है और न चिकित्सकों का। ऐसे में बाहर से दवाएं खरीदने पर सरकारी प्रतिबंध मरीजों के लिए दोहरी मुसीबत बन रहा है। इसके अलावा, अस्पताल में साफ-सफाई की हालत बहुत खराब है। सालों से चतुर्थ श्रेणी के कर्मियों की नियुक्ति नहीं हुई है। दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले लोगों के भरोसे साफ-सफाई कागजों पर चल रही है। लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों और विशिष्ट लोगों या राजनेताओं के आगमन पर यह व्यवस्था जरूर चाक-चौबंद हो जाती है।

जिला चिकित्सालय में व्यापक भ्रष्टाचार, चिकित्सकों की उदासीनता और जनप्रतिनिधियों के असहयोग के चलते परिसर के चारों ओर अवैध नर्सिंग होम फल-फूल रहे हैं। अस्पताल के लगभग सभी विभाग में दलालों की सक्रियता से यहां मरीजों का इलाज ताक पर रख दिया गया है और तीमारदारों से जम कर पैसे का शोषण हो रहा है। यहां पदस्थापित रहे कई वरिष्ठ चिकित्सकों का स्थानांतरण दूसरी जगह हो चुका है। लेकिन वे यहींं आसपास अपने निजी क्लीनिक चला रहे हैं। दूसरी ओर, प्रशासन सब कुछ जानकर भी अनजान है।

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