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श्रमिक ट्रेन में प्रवासी मजदूर की मौत, परिजन बोले- गाड़ी में पानी के अभाव में नहीं खा पाए दवा और चली गई जान

ट्रेन में टॉयलेट का पानी पीने को मजबूर यात्री। ट्रेन जहां रुकती है, वहां के यात्रियों को भी ले जाया जा रहा 500 किलोमीटर दूर। अव्‍यवस्था और ऊटपटांग व्‍यवस्‍था का शिकार हो रहे मजदूर।

ट्रेन में वापी से भागलपुर आ रहे शख्स की मौत के भागलपुर स्टेशन पर लाश उतारते लोग

गुजरात के वापी से भागलपुर आ रही ट्रेन में लालबाबू कामती की मौत हो गई । परिजनों के अनुसार पानी के अभाव में वे दवा नहीं खा पाए और उनकी मौत हो गई। मिली जानकारी के अनुसार सिक्यूरिटी गार्ड का काम करने वाले लालबाबू कामती 23 मई को वापी से पत्नी और तीन बच्चियों के साथ भागलपुर के लिए चले थे। उन्हें दरभंगा जिला के जाले थानान्तर्गत राढ़ी गांव जाना था। वह मूल रूप से दरभंगा के इसी गांव के वाशिंदें थे। 26 मई को भागलपुर स्टेशन पर ट्रेन से उतरींं मृतक की पत्नी कृष्णा देवी और उनकी बेटी अनुष्का कुमारी ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन में व्याप्त कुव्यवस्था को मौत का जिम्मेवार बताया। श्रमिक ट्रेेेन मेें मौत का यह पहला मामला नहीं है।

परिवारवालों का कहना था कि गुजरात के वापी से चली श्रमिक स्पेशल ट्रेन में न तो बिजली थी और न पंखा और न ही पानी। बाथरूम में भी पानी नहीं था। इस वजह से सफर के दौरान काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मृतक की पत्नी ने कहा कि बीमार पति की दवाइयां मौजूद थीं, लेकिन पीने के लिए पानी का प्रबंध नहीं था जिसके कारण पति को दवाई नहीं खिला सकींं और उनकी मौत हो गई।

बताया जा रहा है कि लालबाबू पैरालाइसिस से ग्रसित थे। उनकी मौत मुंगेर के अभयपुर स्टेशन के आसपास हुई। भागलपुर में ट्रेन के प्लेटफॉर्म संख्या एक पर पहुंचने पर उनका शव उतारा गया। शव को भागलपुर जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कालेज अस्पताल भेज दिया गया गया।

श्रमिक स्‍पेशल ट्रेनों मेें अव्‍यवस्‍था का आलम बदस्‍तूर जारी है। कहां की ट्रेन कहां जा रही है। भागलपुर-बांका के श्रमिक यात्रियों को दरभंगा और कूच बिहार ले जाया जा रहा है। औरंगाबाद और जहानाबाद के मुसाफिर को भागलपुर लाया जा रहा। लेट-लतीफी का भी कोई ठिकाना नहीं। खाना-पानी के बगैर अतड़ियाँ चिपक गई। टॉयलेट का पानी पीने को मजबूर होना पड़ा।

कोरोना के दौर में इन मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनों का सफर किसी यातना से कम नहीं। सोमवार देर रात भागलपुर स्टेशन पहुंचे परवेज, मो.सादाब और सलीम ने बताया कि वे मुंबई के पनबेल से शनिवार को श्रमिक ट्रेन पर सवार हुए थे। सोमवार को बिहार के दानापुर स्टेशन उतारा गया। फिर वहां से बस के जरिए भागलपुर भेजा गया। बस से आने में 14 घंटे लगे। डेढ़ सौ यात्री सवार थे। बस ऊपर नीचे ठूंसी थी। सोमवार को डेढ़ बजे रात तक खाना नसीब नहीं हुआ।

इसी ट्रेन में सफर कर आई अंजू देवी कहती है बच्चे को पानी की प्यास लगी तो टॉयलेट की नल का पानी पिलाना पड़ा। श्रमिक ट्रेन में प्रवासी मजदूर की मौत, परिजन बोले- गाड़ी में पानी के अभाव में नहीं खा पाए दवा और चली गई जान है।

पिछले दिनों भागलपुर-बांका के मुसाफिर दरभंगा उतारे गए। वहां से बस से लाया जा रहा था। नवगछिया में खरीक के नजदीक ट्रक से टक्कर हो गई। छह जनें जख्मी हुए थे। ट्रक पर सवार नौ मजदूरों की मौके पर मौतें हो गई थी। जयपुर से भागलपुर तकरीबन 24 घंटे का सफर है। सोमवार शाम ट्रेन 48 घंटे में पहुंची है। इस ट्रेन पर सवार बांका के महेश पंडित और भागलपुर के संतोष कुमार ने भी भोजन-पानी न मिलने की शिकायत की। इसी ट्रेन पर सवार मुजफ्फरपुर के उमाशंकर, संजय यादव, बेगूसराय के रोहित कुमार, खगड़िया के रौशन कुमार को अपने घर पहुंचने में अभी भी दुश्वारियां झेलनी बाकी थी। इन्होंने कहा पानी के लिए तरस गए।

इससे अलग एक वाकया भागलपुर स्टेशन पर हुआ। दिल्ली से कूचविहार जा रही ट्रेन पर सवार करीब डेढ़ सौ मुसाफिर ट्रेन रुकते ही भागलपुर स्टेशन पर ही उतर गए। सुरक्षाबलों ने उन्हें वापस उसी ट्रेन पर चढ़ाने की जबरन कोशिश की। पर वे वहींं पसर गए। और बोले जान ले लीजिए मगर हम भागलपुर स्टेशन ही उतरेंगे। ये सभी यहीं के वाशिंदें है। जब ट्रेन को यहां रुकना था तो हमें भागलपुर से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर भेजने का क्या तुक था। यह सवाल ट्रेन से उतरे रजौन के रंजय यादव, , बांका के सुधीर ने पूछा। वाजिब है इनकी बात। भागलपुर स्टेशन के बाहर आकर इनके चेहरे की खुशी देखने लायक थी।

रेलवे इन्हें ला तो रही है। मगर ऐसे उटपटांग काम कर रही है। जो शायद ये कभी नहीं भूल पाएंगे। और यह सच है कि देश में कोरोना संक्रमण संकट और लॉकडाउन का सबसे बुरा असर प्रवासी मजदूरों पर ही पड़ा है। पहले देशभर में काम बंद होने के बाद रोजगार गंवा चुके श्रमिकों को लाखों की संख्या में सड़कों पर उतरकर पैदल ही गृह-राज्य लौटते देखा गया। फिर जब केंद्र सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था कराई, तब भी प्रवासियों की समस्या कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। हालिया समय में तो मजदूरों ने ट्रेन में खाने-पीने का इंतजाम न होने के साथ उनकी लेटलतीफी तक की शिकायत की।

हालांकि, अब इसमें एक और समस्या जुड़ गई है। कई ट्रेनें रास्ता भटककर दो दिन में पूरा होने वाला सफर नौ-नौ दिन में पूरा कर रही हैं। इसका असर यह है कि कई लोगों की जान भूख-प्यास और गर्मी से ही निकली जा रही है।

 

ताजा मामला ईद का है। बताते है कि महाराष्ट्र से आ रहे एक मजदूर को जब लोगों ने आरा स्टेशन पर उठाने की कोशिश की, तो पता चला कि उसकी मौत हो चुकी है। व्यक्ति की पहचान 44 साल के नबी हसन के तौर पर की गई।

इससे पहले गुजरात के सूरत से 16 मई को बिहार के सीवान आ रही दो ट्रेनें तो अपना रास्ता ही भटक गईं। एक ओडिशा के राउरकेला, तो दूसरी कर्नाटक के बेंगलुरू पहुंच गई। वाराणसी रेल मंडल ने जब छानबीन की तो पता चला कि इन ट्रेनों को 18 मई को सीवान पहुंच जाना था। लेकिन यह 9 दिन बाद सोमवार 25 मई तक सीवान पहुंच पाईं। इसके अलावा एक अन्य ट्रेन जयपुर-पटना-भागलपुर श्रमिक स्पेशल ट्रेन रास्ता भटककर पटना के बजाय गया जंक्शन पहुंच गई।

बिहार में श्रमिक ट्रेनों से जाने वालों को काफी परेशानियां झेलनी पड़ी हैं। खाने-पीने की कमी और बेतहाशा गर्मी ने ट्रेन यात्रियों का सफर करना मुहाल कर दिया है। हाल ही में यहां मुजफ्फरपुर जंक्शन में चार साल के बच्चे की ट्रेन में चढ़ने के दौरान ही मौत हो गई। इससे पहले सूरत से सासाराम पहुंची एक ट्रेन से उतरने के बाद एक महिला की अपने पति के सामने ही मौत हो गई।

बरौनी में भी एक मुंबई के बांद्रा टर्मिनस से लौटे एक व्यक्ति की पानी लेने के दौरान स्टेशन पर जान चली गई। इसके अलावा राजकोट-भागलपुर श्रमिक ट्रेन से सीतामढ़ी जा रहे एक दंपति के बच्चे की कानपुर में मौत हुई। उसका शव गया में उतारा गया था।

 

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