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वाराणसीः जलती चिताओं के बीच भस्म की होली, औघड़ रूप में दिखे बाबा विश्वनाथ के श्रद्धालु, देखें PHOTOS

काशी की होली न सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी विख्यात है। यहां आम होली नहीं खेली जाती है बल्कि यहां खेली जाती है चिता भस्म से होली।

भस्म की होली, फोटो सोर्स- स्थानीय

काशी की होली सिर्फ देश नहीं विदेश में भी विख्यात है। काशी की होली में धधकती चिताओं के बीच महाश्मशान पर होली खेलने का अड़भंगी अंदाज सभी को पसंद आता है। यह परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि महाश्मशान ही वो स्थान है, जहां कई वर्षों की तपस्या के बाद महादेव ने भगवान विष्णु को संसार के संचालन का वरदान दिया था। इसी घाट पर शिव ने मोक्ष प्रदान करने की प्रतिज्ञा ली थी। यह दुनिया की एक मात्र ऐसी नगरी है जहां मनुष्य की मृत्यु को भी मंगल माना जाता है। यहां शव यात्रा में मंगल वाद्य यंत्रों को बजाया जाता है।

 

औघड़ रुप में श्मशान घाट पर होली: भोले बाबा काशी विश्वनाथ ने सोमवार को अपने औघड़ रुप में श्मशान घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता-भस्म की होली खेली। फिज़ा में डमरुओं की गूंज और हर-हर महादेव के उद्घोष। भांग, पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के बीच एक-दूसरे को मणिकर्णिका घाट का भस्म लगाया गया। यह दृश्य देखते ही बन रहा था और नजारा अद्भुत था। बता गया कि बाबा विश्वनाथ की नगरी की ये है फाल्गुनी बयार जो भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है।

भस्म की होली: भस्म की होली से पहले महाश्मशाननाथ सेवा समिति के अध्यक्ष चैनु साव और व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने महाश्मशाननाथ का विधि-विधान से पूजन अर्चन किया। उसके बाद शुरू हुआ चिता भस्म की होली। शवदाह करने आए लोग भी यह मंजर देख आश्चर्यचकित रहे लेकिन काशीवासी चिताभस्म होली खेलने में मग्न थे। भावों से ही प्रसन्न हो जाने वाले औघड़दानी की इस लीला का को विदेशी पर्यटकों ने भी काफी एन्जॉय किया। अबीर गुलाल से भी चटख चिता भस्म की फाग के बीच वाद्य यंत्रों व ध्वनि विस्तारकों पर गूंजते भजन माहौल में एक अलग ही छटा बिखेरती रही।

रंगभरी एकादशी पर हुआ गौना: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वसंत पंचमी से बाबा विश्वनाथ के वैवाहिक कार्यक्रम का जो सिलसिला शुरू होता है वह होली तक चलता है। बसंत पंचमी को भोले बाबा का तिलकोत्सव मनाया गया तो महाशिवरात्रि को विवाह हुआ और फाल्गुन शुक्ल एकादशी को बाबा, देवी पार्वती को गौना करा कर कैलाश चले। चांदी की पालकी में विराजमान जटाधारी भोलेनाथ के मस्तक पर सुशोभित चन्द्रमा। भभूतधारी के कानों में कुण्डल, गले में सर्प व रुद्राक्ष की माला, त्रिशूल-डमरू धारी बाबा दाहिने हाथ से भक्तों को अभयदान-आशीष देते, कल्याण व मंगल कामना संग आशीर्वाद प्रदान करते तो माता पार्वती सोलहों श्रृंगार किए रजत पालकी में विराजती। देवाधिदेव महादेव की यह युगल जोड़ी देखकर भक्त जहां धन्य हो रहे थे तो हर शख्स इस अद्भुत दृश्य को चक्षुओं में समेट लेने को आतुर दिखा।

 

गुलाल से पटा दरबार: रविवार को रंगभरी एकादशी के पावन पर्व पर भगवान शंकर और देवी पार्वती ने भक्तों संग अबीर-गुलाल व इत्र आदि के साथ क्रीड़ोत्सव किया फिर देखते ही देखते पूरे शहर में होली की धूम मच गई। दिन चढ़ने के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में भक्तों की भीड़ बढ़ने लगी थी। दोपहर एक बजे से ही महंत आवास में शिव-पार्वती की चल प्रतिमाओं का दर्शन-पूजन शुरू हो गया। भक्तों को प्रतीक्षा थी शिव परिवार की मंदिर तक निकलने वाली पालकी यात्रा की। घड़ी में जैसे ही शाम के 5.30 बजे, गौरा के गौने का उत्सव परवान पर पहुंचने लगा। शंख, डमरू, विजयघंट व नाना प्रकार के वाद्य यंत्र की गूंज व हर-हर महादेव के उद्घोष के मध्य महंत परिवार के सदस्यगण पालकी लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर गर्भगृह की ओर बढ़ने लगे। भक्तों की भीड़ व हर-हर महादेव के उद्घोष के बीच ऐसा लगा जैसे सभी इस नयनाभिराम दृश्य को अपनी आंखों में कैद कर लेना चाहते हों। सायं 5.50 बजे पालकी यात्रा गर्भगृह पहुंची, जहां झांकी दर्शन के लिए रात तक भक्तों की कतार लगी रही।

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