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असम: पुलिस के गले पड़ी नई जिम्‍मेदारी, तीन हफ्ते से चरा रहे गाय-बैल

पुलिस अधिकारियों ने राज्य के पशुपालन विभाग, गुवाहाटी नगर निगम और शहर के एक गौशाला को भी लिखा लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया

तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

असम में भाजपा की सर्बानंद सोनोवाल सरकार में पुलिसवाले एक नई जिम्मेदारी मिलने से नाराज और परेशान हैं। वो उच्चाधिकारियों को कई बार लिख चुके हैं लेकिन उनकी समस्या खत्म नहीं हो रही। अलबत्ता, राजधानी गुवाहाटी के बाहरी हिस्से में स्थित एक पुलिस आउटपोस्ट के पुलिसकर्मी पिछले तीन हफ्ते से गाय-बैलों की देखभाल करने को मजबूर हैं। दरअसल, पिछले महीने सितंबर की 10 तारीख को पुलिसकर्मियों ने पशु तस्करों से तीन ट्रकों में भरकर ले जाए जा रहे 85 पशु बरामद किए थे। ये सभी ट्रक असम, बिहार और हरियाणा नंबर के थे। इन पशुओं में से अधिकांश बैल है। बरामदगी के बाद सभी पशुओं को पुलिस आउट पोस्ट के बाहर एक छोटे से मैदान में रखा गया लेकिन तीन हफ्ते से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी न तो कोई पशु मालिक इसे लेने आया, न ही किसी गौशाला ने इसे लेने की जहमत उठाई। नतीजतन, आउटपोस्ट में पदस्थापित पांच पुलिसकर्मी और छह अन्य लोग पिछले पंद्रह दिनों से इनकी देखभाल कर रहे हैं।

एचटी मीडिया के मुताबिक पुलिस अधिकारियों ने पशुओं को वहां से हटाने और कहीं भेजने के लिए उच्च अधिकारियों को लिखा लेकिन किसी ने भी उसका जवाब नहीं दिया। पुलिस अधिकारियों ने राज्य के पशुपालन विभाग, गुवाहाटी नगर निगम और शहर के एक गौशाला को भी लिखा लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। अधिकारी के मुताबिक मजिस्ट्रेट अदालत के दो आदेश दिखाने के बाद भी पशुपालन विभाग मामले में हाथ पर हाथ धरे बैठा है। पुलिस ने पशु तस्करी के आरोप में आईपीसी की धारा 379 और 353 और पशु क्रूरता कानून के तहत भी मामला दर्ज किया है।

सरकारी विभागों की हीला-हवाली से दो पशुओं की मौत हो चुकी है। पुलिस के पास इतना बजट नहीं है कि वो 83 पशुओं को खाना खिला सके। लिहाजा, पुलिसकर्मियों ने स्थानीय लोगों से सहयोग मांगा है। बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं और शहर के समाजसेवियों ने पशुओं के लिए कुछ चारा की व्यवस्था की है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। किसी तरह पशु जिंदा हैं। इधर, पशुपालन विभाग के डॉक्टर रोज आकर पशुओं का स्वास्थ्य जांच करते हैं। बतौर पशु चिकित्सक पशुओं की हालत अच्छी नहीं है। विभाग ने साफ किया है कि ऐसे पशुओं को रखने का उनका काम नहीं है और वो निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाएंगे। बता दें कि असम और मेघालय के रास्ते पशुओं की तस्करी बांग्लादेश तक होती है। आशंका जताई जा रही है कि इन पशुओं को भी तस्कर वहीं ले जाने की फिराक में थे।

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