असम विधानसभा चुनाव में राजधानी की अहम सीट दिसपुर पर मुकाबला दिलचस्प और जटिल हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता रहे जयंत कुमार दास के निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने से यहां त्रिकोणीय मुकाबला बन गया है।
पहले इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार प्रद्युत बोरदोलोई और कांग्रेस की उम्मीदवार मीरा बर्थाकुर गोस्वामी के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही थी, लेकिन दास के मैदान में आने से चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।
दिसपुर असम की प्रशासनिक राजधानी है, जहां राज्य सचिवालय और विधानसभा स्थित हैं। करीब 2.50 लाख मतदाताओं वाली इस सीट का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्त्व काफी बड़ा माना जाता है।
बीजेपी में क्यों असंतोष?
प्रद्युत बोरदोलोई को टिकट दिए जाने को लेकर भाजपा के भीतर असंतोष सामने आया है। बोरदोलोई पूर्व में कांग्रेस सांसद रह चुके हैं और हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं। वहीं, मौजूदा विधायक अतुल बोरा को टिकट न मिलने से स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी गई है।
प्रफुल्ल कुमार महंता की सरकार में मंत्री रहे अतुल बोरा इस विधानसभा से पांच बार विधायक बने हैं। बोरा 1985 में यहां से निर्दलीय चुनाव जीते थे। इसके बाद 1991 और 1996 का विधानसभा चुनाव उन्होंने असम गण परिषद से लड़ा और जीता। अतुल बोरा ने 2016 और 2021 में भाजपा से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। पिछले चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के अकोन बोरा को 1.30 लाख मतों के अंतर से हराया था।
दिसपुर चुनाव परिणाम 2016
2016 के असम विधानसभा चुनावों में भाजपा के उम्मीदवार अतुल बोरा ने दिसपुर सीट 1,30,197 मतों (46.69 फीसद) के अंतर से जीती। उन्हें 1,98,378 मत मिले, जो कुल मतों का 71.14 फीसद था। कांग्रेस के उम्मीदवार अकोन बोरा को 68,181 मत (24.45 फीसद) मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे। नोटा 2,600 मतों (0.93 फीसद) के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
इस विधानसभा में अतुल बोरा का काफी प्रभाव है और इसका असर चुनाव पर साफ दिखेगा। दूसरी ओर, कांग्रेस उम्मीदवार मीरा बर्थाकुर गोस्वामी भी पहले भाजपा में थीं और 2018 में पार्टी छोड़ चुकी हैं। वे अपने चुनाव प्रचार में जलभराव, शहरी ढांचा और ‘स्मार्ट सिटी’ परियोजनाओं की विफलता जैसे मुद्दों को उठा रही हैं।
जयंत दास खुद को बताया रहे ‘जनता की आवाज’
करीब तीन दशक तक भाजपा से जुड़े रहे जयंत दास खुद को ‘स्थानीय जनता की असली आवाज’ बता रहे हैं। उन्होंने बोरदोलोई को कांग्रेस से आयातित नेता बताते हुए भाजपा पर विचारधारा से भटकने का आरोप लगाया है। जयंत दास का कहना है कि उनका जमीनी जुड़ाव उन्हें बढ़त दिलाएगी।
विश्लेषकों के मुताबिक, जयंत दास भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। यदि 15-25 फीसद वोट भी खिसकते हैं तो भाजपा उम्मीदवार की स्थिति कमजोर हो सकती है, जिससे कांग्रेस को फायदा मिल सकता है।
हालांकि, यह भी संभावना जताई जा रही है कि तीसरे उम्मीदवार की मजबूत उपस्थिति मतों को और बिखेर सकती है, जिससे मुकाबला पूरी तरह अनिश्चित हो जाएगा। दिसपुर सीट पर अब मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहा, बल्कि एक मजबूत बागी उम्मीदवार के कारण यह चुनाव रोचक मुकाबलों में शामिल हो गया है।
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मुख्यमंत्री बनने के बाद आमतौर पर नेताओं के आसपास एक नई दुनिया बन जाती है – सुरक्षा का घेरा, प्रोटोकॉल की दीवारें, और आम लोगों से एक दूरी। लेकिन गोलाप बोरबोरा के साथ ऐसा नहीं हुआ। शपथ लेने के बाद भी उनके जीवन में कोई नाटकीय बदलाव नहीं आया। वे वैसे ही रहे – साधारण कपड़ों में, सहज व्यवहार के साथ और बिना किसी दिखावे के। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
