ताज़ा खबर
 

AAP में कायम हुई केजरीवाल की बादशाहत

आम आदमी पार्टी (आप) में अरविंद केजरीवाल की बादशाहत फिर से कायम हो गई। उन्हें 27 अप्रैल की राष्ट्रीय परिषद ने अगले तीन साल के लिए पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक मनोनीत कर दिया।

Author नई दिल्ली | April 29, 2016 01:19 am
आम आदमी पार्टी (आप) में अरविंद केजरीवाल की बादशाहत फिर से कायम हो गई। उन्हें 27 अप्रैल की राष्ट्रीय परिषद ने अगले तीन साल के लिए पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक मनोनीत कर दिया।

आम आदमी पार्टी (आप) में अरविंद केजरीवाल की बादशाहत फिर से कायम हो गई। उन्हें 27 अप्रैल की राष्ट्रीय परिषद ने अगले तीन साल के लिए पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक मनोनीत कर दिया। करीब चार साल पुरानी पार्टी में पहले भी केजरीवाल को कोई चुनौती नहीं थी।

पिछली कार्यकारिणी की चार मार्च को हुई बैठक से पहले हुई राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को हटाया जाना तय कर लिया गया था। फिर कार्यकारणी से प्रोफेसर आनंद कुमार और अजीत झा को निकाला गया। पार्टी के संस्थापक सदस्य व पूर्व केंद्रीय मंत्री शांति भूषण और संस्थापक लोकपाल एडमिरल (सेवानिवृत्त) रामदास को भी केजरीवाल की लाइन से अलग जाने की कीमत चुकानी पड़ी। यह अलग बात है कि देश में लोकपाल लाने की लड़ाई लड़कर राजनीति की शुरुआत करने वाली पार्टी में फिलहाल कोई आंतरिक लोकपाल नहीं है और दिल्ली विधानसभा में पास कराए गए लोकपाल बिल पर पहले ही दिन से सवाल उठाए जा रहे हैं।

पार्टी से अलग हो कर बनाए गए स्वराज्य अभियान के संयोजक आनंद कुमार ने कहा कि आप की शुरुआत ही वैकल्पिक राजनीति और हर फैसले में ईमानदारी और पारदर्शिता बनाने के लिए की गई थी। अब आप भी देश की अन्य पार्टियों की तरह ही एक पार्टी बन कर रह गई है। पीएसी और राष्ट्रीय कार्यकारणी में जो नाम जोड़े गए हैं उससे भी साबित हो रहा है कि पार्टी में वैचारिक बहस के लिए कोई जगह नहीं रह गई है।
दो बार के सांसद रहे इलियास आजमी के स्थान पर विधायक अमानतुल्ला खान को पीएसी में शामिल किया गया है। पार्टी में राघव चढ्ढा का महत्त्व बढ़ गया है। उन्हें कृष्णकांत सेवदा के स्थान पर कोषाध्यक्ष भी बनाया गया है और पीएसी में जगह दी गई है। प्रशांत भूषण के माध्यम से सक्रिय रहीं आतिशी मार्लिना को उनसे अलग होने के कारण बड़ा पुरस्कार दिया गया है। वैसे उनके पति अभी भी प्रशांत भूषण के साथ हैं।
योगेंद्र यादव के घनघोर विरोधी नवीन जयहिंद को यादव के विदा होने पर भी अपने दो-टूक स्वभाव का खमियाजा भुगतना पड़ा। वे भी पीएसी में नहीं हैं। वैसे उनकी पत्नी स्वाति मालिवाल केजरीवाल की विश्वासपात्र और दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष पद पर काबिज हैं।

पार्टी में विरोध के दो मुख्य कारण थे। एक तो भूषण-यादव-कुमार आदि चाहते थे जो प्रयोग दिल्ली में हुआ है वह देश भर में किया जाए, भले ही कम सफलता मिले। दूसरे अन्य दलों से अलग पार्टी और संगठन की बागडोर अलग-अलग हाथों में रहे। यह अपने आप में लंबी कहानी है कि देश भर में लोकसभा चुनाव लड़ने और अपेक्षित सफलता न मिलने से परेशान केजरीवाल और सलाहकारों ने बाकी लोगों से उनकी दूरी बढ़ाई। हताशा में वे अपने समर्थकों का सामना करने से बचने के लिए जेल तक गए। लेकिन भाजपा के सरकार बनाने या चुनाव में जाने का फैसला न ले पाने के कारण फिर से उनके दिन लौटे। एक तरफ तो भूषण-यादव केजरीवाल पर लोकतांत्रिक दबाव बढ़ाकर पार्टी को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाना चाहते थे। दूसरी ओर उनके साथ रहे नेता पांच साल केजरीवाल का नारा दे रहे थे। जाहिर है, प्रचंड बहुमत आने के बाद संशोधन कराने वाले दरकिनार हो गए जबकि उनकी ही पहुंच संगठन में ज्यादा थी।

केजरीवाल ने 14 फरवरी 2015 को मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए दिल्ली से बाहर पार्टी को न ले जाने की घोषणा कर दी। लेकिन कुछ ही दिनों में लोकसभा चुनाव में अकाली सरकार के नाकारापन और कांग्रेस की कलह से मिली सफलता से वे पंजाब चुनाव लड़ने की घोषणा कर बैठे। पंजाब में भी दिल्ली के कलह का असर पड़ा और चार में से दो सांसद आप से बगावत कर बैठे।

बाकी दोनों में तेजतर्रार यशवंत मान को तो राष्ट्रीय कार्यकारणी में रखा गया है और जो (साधु सिंह) चुप बैठे रहते हैं उन्हें उत्तर प्रदेश के दलित नेता प्रेम सिंह पहाड़िया की जगह पीएसी में जगह दी गई है। कायदे में पंजाब में बेवजह हस्तक्षेप करने और स्थानीय नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाने वाले डॉक्टर धर्मवीर गांधी और हरविंदर सिंह खालसा को तो हाशिए पर डालने की काफी दिनों से कोशिश हो रही है। आप के कुछ नेताओं के प्रयास में उनकी लोकप्रियता आड़े आ रही है। जिस तरह से पीएसी और कार्यकारणी में दिल्ली और एनसीआर के लोगों को जगह दी गई है उससे पार्टी के अखिल भारतीय स्वरूप पर ही सवालिया निशान लगा है। पंजाब विधानसभा चुनाव के कारण कुछ लोग पंजाब के भी शामिल कर लिए गए हैं। पार्टी से अलग होने वालों का विरोध था कि संगठन और सरकार में अलग-अलग लोगों को जिम्मेदारी देनी चाहिए। उसके बजाए कार्यकारणी में चार मंत्रियों को शामिल किया गया है।

अरविंद केजरीवाल ने यह भी कहा कि पार्टी वहीं चुनाव लड़ेगी जहां उसे दिल्ली जैसी सफलता मिलने का भरोसा होगा। इसमें आप से अलग हुए नेता भी एकमत हैं कि पंजाब में आप की सरकार बनने का माहौल है। लोकसभा चुनाव की सफलता ने उसके संकेत दे दिए हैं। अकाली दल और भाजपा की सरकार के खिलाफ दस साल की सत्ता में रहने की नाराजगी है और कांग्रेस का संगठन पूरी तरह से बैठ चुका है। ऐसे में आप के लिए बेहतर अवसर है। अगर आप में विरोध न हुआ होता या स्थानीय नेताओं का महत्त्व ज्यादा होता तो विधान सभा चुनाव जीतना ज्यादा आसान माना जा रहा है। यह भी तय सा माना जा रहा है कि अगर पंजाब चुनाव आप जीत ले तो केजरीवाल प्रधानमंत्री के दावेदारों की लिस्ट में शामिल हो जाएंगे। इसमें अगर झटका लगेगा तो 15 मई को होने वाले दिल्ली के निगमों के 13 उपचुनाव और 2017 के शुरू में होने वाले निगमों के आप चुनाव के नतीजों से लगेगा।

दिल्ली के नतीजों का वैसे तो देश भर में असर होता है लेकिन सबसे ज्यादा असर पंजाब पर होता है। दिल्ली सरकार के सेहत पर इन चुनावों के नतीजों का कोई प्रतिकूल असर नहीं होगा, लेकिर माहौल पर असर होगा। इसलिए केजरीवाल अपनी सरकार को देश की अव्वल सरकार बता रहे हैं। पार्टी में हर तरह से केजरीवाल की बादशाहत बनी हुई है। पार्टी में उन्हें ही महत्त्व मिला है जो केजरीवाल के लिए पूरी तरह से समर्पित हैं। इसलिए कार्यकारणी ने भी उन्हें अगले तीन साल के लिए पार्टी प्रमुख (संयोजक) बनाने का फैसला कर लिया।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App