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भ्रष्टाचार रोकथाम विधेयक का परीक्षण करने वाली समिति का कार्यकाल बढ़ा

सेवारत और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए सीबीआइ या पुलिस द्वारा पूर्व अनुमति लिए जाने के प्रावधान की बात करने वाले भ्रष्टाचार रोकथाम संशोधन विधेयक का परीक्षण कर रही संसदीय समिति का कार्यकाल अप्रैल के अंत तक बढ़ा दिया गया है।

Author नई दिल्ली | March 7, 2016 00:56 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

सेवारत और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए सीबीआइ या पुलिस द्वारा पूर्व अनुमति लिए जाने के प्रावधान की बात करने वाले भ्रष्टाचार रोकथाम संशोधन विधेयक का परीक्षण कर रही संसदीय समिति का कार्यकाल अप्रैल के अंत तक बढ़ा दिया गया है।

भाजपा सांसद अनिल माधव दवे की अध्यक्षता वाली समिति भ्रष्टाचार रोकथाम कानून 1988 में संशोधन करने से संबंधित विधेयक का परीक्षण कर रही है। दवे ने कहा, ‘समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 29 अप्रैल तक का विस्तार मिल गया है ।’ प्रस्तावित विधेयक में प्रावधान है कि कोई भी पुलिस अधिकारी किसी लोकसेवक द्वारा किए गए किसी ऐसे अपराध की जांच (भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के तहत) लोकपाल (केंद्र सरकार के कर्मचारी के लिए) और लोकायुक्तों (राज्य सरकारों के अधीन काम करने वाले कर्मियों के लिए) की पूर्व अनुमति के बिना नहीं करेगा जहां कथित अपराध किसी की गई सिफारिश या इस तरह के लोकसेवक द्वारा अपने आधिकारिक कामकाज या दायित्व को निभाने में किए गए फैसले से संबंधित हो।

केंद्र को अभी लोकपाल और लोकायुक्त कानून 2013 के तहत लोकपाल और लोकायुक्त संस्थान की स्थापना करनी है। पूर्व में, उच्चतम न्यायालय ने 2014 में एक ऐसे कानूनी प्रावधान को अवैध और असंवैधानिक ठहराया था जो संयुक्त सचिव स्तर या इससे ऊपर के अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले की जांच के संबंध में सीबीआइ के लिए सक्षम प्राधिकार की मंजूरी हासिल करने को आवश्यक बनाता है।
दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीइ) कानून की धारा 6-ए (जो भ्रष्टाचार के मामलों में केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना वरिष्ठ अधिकारियोें के खिलाफ जांच को रोकती है) की वैधता पर अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था,‘भ्रष्ट लोकसेवक, उच्च रैंक के हों या निम्न रैंक के, समान पंख वाले पक्षी हैं और समान ढंग से ही निपटा जाना चाहिए।’ सीबीआइ डीएसपीइ कानून से संचालित होती है।

हालांकि रिश्वत लेते हुए स्थल पर ही व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। विधेयक में पिछले साल आधिकारिक संशोधनों के जरिए सरकार द्वारा अनुशंसित नए बदलाव किसी पुलिस अधिकारी या सीबीआइ जैसी जांच एजंसी के लिए भ्रष्टाचार की शिकायत को पहले लोकपाल या लोकायुक्त को भेजना जरूरी बनाते हैं ।

मध्य प्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सदस्य दवे ने कहा कि प्रवर समिति ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, गैर सरकारी संगठनों और अन्य पक्षों से इस महीने के अंत तक विधेयक के विभिन्न पक्षों पर टिप्पणियां मांगी हैं। उन्होंने कहा,‘हम अपनी रिपोर्ट 29 अप्रैल तक सौंपेंगे।’ विधेयक रिश्वत देने वाले और रिश्वत लेने वाले दोनों को दंडित करने की बात कहता है। वर्तमान में देश में रिश्वत देने वालों को दंडित करने के लिए कोई कानून नहीं है।

यह वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को उनसे जुड़े लोगों को किसी लोकसेवक को रिश्वत देने से रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का प्रावधान करता है। इस संबंध में, यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि केंद्रीय सतर्कता आयोग कथित भ्रष्टाचार के एक मामले को लेकर कुछ सरकारी कर्मियों के खिलाफ जांच कर रहा है, जिसमें अमेरिकी कंपनी वाल मार्ट और कन्फेक्श्नरी से संबंधित मोंडेलेज इंडिया लिमिटेड का भी नाम है। विधेयक में भ्रष्टाचार के आरोपी लोकसेवक की संपत्ति को कुर्क और जब्त करने का भी प्रावधान है।

भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) विधेयक संप्रग शासन के दौरान 19 अगस्त 2013 को राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया था। हालांकि इसे संसदीय स्थाई समिति को भेज दिया गया था, जिसने छह फरवरी 2014 को उच्च सदन में अपनी रिपोर्ट रखी, लेकिन विधेयक पारित नहीं हो सका।
पिछले साल 29 अप्रैल को केंद्रीय कैबिनेट ने आधिकारिक संशोधन लाने के बाद संशोधन विधेयक का अनुकरण करते हुए भ्रष्टाचार रोकथाम कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी थी। पिछले साल सात दिसंबर को इसे प्रवर समिति के पास परीक्षण और रिपोर्ट के लिए भेज दिया गया।

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