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Analysis : चुनावी साल में 30% ज्यादा दिए जाते हैं पद्मश्री, इस बार बिहार पर ज्यादा मेहरबानी

आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान पद्मश्री पुरस्कार दिल खोलकर दिए जाते हैं। पिछले चार बार में हर लोकसभा चुनाव के दौरान पद्मश्री पुरस्कार पाने वालों की संख्या बढ़ गई। पहली बार बिहार के खाते में पांच पद्म पुरस्कार आए हैं और राज्य को लगातार तीसरे साल पद्मभूषण मिला है।

Author January 27, 2019 6:30 PM
पद्मश्री के लिए बिहार से नामित हस्तियां।

चुनाव कोई भी हो, जीत-हार का समीकरण पहले से बनना शुरू हो जाता है। इस बार 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर मानी जा रही है। ऐसे में राजनीतिक दल कोई मौका गंवाना नहीं चाहते। हालांकि, सत्‍ता में रहने वाली पार्टी के लिए ऐसे मौके सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं। सर्वाच्‍च नागरिक सम्‍मान के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण पुरस्कार ऐसे ही मौके हैं। चुनावी साल होने के कारण इस बार दिल खोलकर पद्म पुरस्कार की घोषणा हुई। वहीं, 3-3 भारत रत्न भी दिए जा रहे हैं। पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बहाने बंगाली मानुष को लुभाने की भरसक कोशिश है।

बिहार को मिला फायदा : पद्म पुरस्कार पाने के मामले में इस बार बिहार को काफी फायदा हुआ है। मनोज वाजपेयी को जोड़कर गिनती करें तो राज्‍य की झोली में छह पद्म पुरस्कार आए हैं। मनोज वाजपेयी को अभिनय के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय प्रदर्शन के लिए सम्‍मान मिला है, जो बतौर राज्‍य महाराष्‍ट्र के खाते में दर्ज है। मनोज वाजपेयी का बिहार से महज जन्‍म का वास्‍ता है। उसी पश्चिम चंपारण जिला से जहां से गांधीजी ने सत्‍याग्रह आंदोलन की शुरुआत की थी। पश्चिम चंपारण के भितिहरवा में बापू ने पहले बुनियादी विद्यालय की नींव डाली थी। आज उस बुनियादी विद्यालय की नींव दरक चुकी है और मनोज वाजपेयी का परिवार वर्षों पहले अपने पैतृक गांव को अलविदा कह चुका है। मनोज वाजपेयी को पद्मश्री मिला है। उन्‍हें दरकिनार कर दें तो पहली बार बिहार की झोली में पांच पद्म पुरस्कार आए, जिनमें चार पद्मश्री हैं। पद्म भूषण तो बिहार को लगातार तीसरे साल मिला है। यह भी पहली बार हुआ। इस बार यह सम्‍मान बीजेपी सांसद हुकुमदेव नारायण यादव के नाम रहा, जबकि पिछले साल लोकगायिका शारदा सिन्‍हा को और 2017 में स्‍वामी नीरंजनानंद सरस्‍वती को दिया गया था।

क्या बिहार पर इसलिए मेहरबानी : इस चुनावी साल में बिहार पर काफी ज्यादा दारोमदार है। देखा जाए तो हस्तियों के साथ बिरादरी का अंतर्संबंध होने के चलते चुनावी बिसात पर पद्म पुरस्कारों के मोहरे चले गए हैं। पद्मश्री पाने वाली भागीरथी देवी बीजेपी की विधायक हैं। वहीं, राजकुमारी देवी किसान चाची के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने साइकिल से गांव-गांव घूमकर महिलाओं को संगठित किया और खेती से रोजगार लायक बनाया। गोदावरी दत्ता कला के क्षेत्र की एक हस्‍ती हैं तो ज्योति कुमार सिन्हा सेवानिवृत्‍त आईपीएस अफसर हैं। ज्योति कुमार पटना में मुहसर (अनुसूचित जाति) बिरादरी के बच्‍चों के लिए इंग्लिश मीडियम स्‍कूल चलाते हैं और उनकी पढ़ाई-लिखाई का इंतजाम मुफ्त में करते हैं।

लोकसभा चुनाव वाले साल में इतने बढ़ जाते हैं पद्मश्री पुरस्कार: पिछले चार साल की तुलना करें तो लोकसभा चुनाव वाले साल में 30 प्रतिशत अधिक पद्मश्री पुरस्कार दिए जाते हैं। यह स्थिति पिछले चार लोकसभा चुनावों का आकलन करने पर स्पष्ट होती है। वैसे भी नई सदी में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित गणमान्य की संख्या साल-दर-साल बढ़ रही है। आकलन के चारों चुनाव नई सदी में ही हुए। दो बार कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार रही और 2 बार बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार। दोनों के ही दौर में काफी ज्यादा दरियादिली नजर आई।

पिछली 4 सरकारों ने ऐसे बांटे पद्मश्री पुरस्कार: 2004 में केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। वाजपेयी की सरकार ने उस साल 74 प‍द्मश्री बांटे थे, जबकि उसके पहले चार वर्षों (2000 से 2003 तक) के दौरान हर साल औसतन 57 पद्मश्री दिए गए। 2009 में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। उस साल 93 हस्तियों को पद्मश्री दिए जाने की घोषणा हुई। उसके पहले 4 वर्षों 2005 से 2008 तक यह संख्‍या प्रतिवर्ष औसतन 66 रही। अप्रैल-मई 2014 में मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान लोकसभा चुनाव हुए। उसके पहले जनवरी में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्‍या पर 101 हस्तियों को पद्मश्री से विभूषि‍त करने का एलान हुआ। हालांकि 2010 से 2013 तक प्रतिवर्ष औसतन 80 पद्मश्री पुरस्कार दिए गए थे। इस दरियादिली के बावजूद मनमोहन सरकार की वापसी नहीं हुई। 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने सबसे खराब प्रदर्शन किया। अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार का 5वां साल है। अप्रैल-मई में लोकसभा का चुनाव संभावित है। इस दौरान 94 हस्तियों को पद्मश्री से विभूषित करने की घोषणा हो चुकी है, जबकि पिछले चार साल 2015 से 2018 तक यह संख्‍या प्रतिवर्ष औसतन 76 रही।

बिहार को अब तक कम पद्मश्री : आंकड़े बताते हैं कि देश की करीब 9 प्रतिशत आबादी वाले बिहार को अब तक 2 फीसदी से भी कम पद्मश्री सम्मान मिले, जिसमें इस साल चार फीसदी से अधिक के आंकड़े भी शामिल हैं। इसकी वजह अनुशंसा के साथ सर्वोच्च स्तर पर प्रयास की कमी बताई जा रही है। वैसे भी 2015 में किए गए प्रावधान के बाद मंत्रियों के लिए अनुशंसा की गुंजाइश नहीं रही। बीजेपी प्रदेश संगठन के एक पदाधिकारी का कहना है कि रोजी-रोटी में उलझे बिहार के नागरिकों को फुर्सत ही नहीं कि वे अपने राज्य-समाज के गणमान्य के लिए सम्मान की अनुशंसा करें।

इस बार हुए रिकॉर्ड नामांकन : पद्म सम्मान के लिए इस बार रिकॉर्ड 49992 नामांकन किए गए, जो 2000 की तुलना में 32 गुना ज्यादा हैं। 2017 में 35595 और 2016 में 18768 प्रस्ताव मिले थे। 2016 से सबसे पहले ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था की गई थी। डेटा के मुताबिक, तकनीक में दिल्ली सहित दक्षिण-पश्चिम के राज्य बिहार से काफी तेज हैं। हालांकि, हस्तलिखित आवेदन की व्यवस्था में भी इन्हीं राज्यों को सर्वाधिक पद्म सम्मान मिले।

दक्षिण-पश्चिम के राज्‍यों को तवज्‍जो मिली : बिहार के रहने वाले डॉ. अशोक रंजन शिकायती लहजे में कहते हैं कि उद्योग-अनुदान की तरह सम्मान को लेकर भी बिहार के साथ राजनीति होती रही। ऐसे में यह सच्चाई भी दरकिनार कर दी गई कि बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। हालांकि, पद्म सम्मान वाली हस्तियों पर गौर करने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। दक्षिण और पश्चिमी राज्यों में पद्म पुरस्कार पाने वाली अधिकतर हस्तियां ओपिनियन लीडर हैं। उनके संदेश-विचार से सियासत भी प्रभावित होती है। हालांकि, बिहार का मिजाज कुछ अलग है।

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