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एक आईआईटियन, उम्रकैद का दोषी, पढ़ें गुजरात दंगा मामले में घिरे आईपीएस संजीव भट्ट की कहानी

संजीव ने 2011 में एक गवाह के तौर पर गवाही दी थी कि वो उस बैठक में शामिल थे जिसमें सरकार ने कथित तौर पर हिंसा जारी रखने का आदेश दिया था।

Former IITian | Sanjeev Bhatt | Gujrat Riots
पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट को उम्र कैद की सजाः Photo Credit -Express Archives

मुंबई में जन्मे और पले-बढ़े संजीव भट्ट 1985 बैच से आईआईटी-बॉम्बे से मास्टर इन टेक्नोलॉजी (एम.टेक) हैं, जो तीन सालों बाद गुजरात कैडर में आईपीएस में शामिल हुए। यह लगभग उसी समय की बात है जब उन्होंने शास्त्रीय नृत्यांगना और उनकी तरह ही सिविल सेवा की तैयारी कर रही श्वेता भट्ट से शादी की। संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता संजीव की सजा को रोके जाने के लिए लड़ रही है, क्योंकि संजीव को हिरासत में मौत के सिलसिले को लेकर साल 2019 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

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शनिवार को गुजरात पुलिस ने 2002 के दंगों में राज्य में नरेंद्र मोदी सरकार को एसआईटी की क्लीन चिट को बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक मामले में भट्ट के खिलाफ मामला दर्ज किया था। अदालत के आदेश ने दंगों के समय राज्य खुफिया ब्यूरो के उपायुक्त भट्ट की की भूमिका पर सवाल उठाया था। इसके साथ ही पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार और कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा मोदी प्रशासन के खिलाफ लगाए गए आरोपों में गिरफ्तार किया गया है।

2 दशक से ज्यादा उथल-पुथल भरा करियर
चूंकि अहमदाबाद डिटेक्शन ऑफ क्राइम ब्रांच (DCB) तीनों के खिलाफ जालसाजी, आपराधिक साजिश के आरोपों की जांच कर रही है। इस वजह से संजीव भट्ट को भी बनासकांठा के पालनपुर जेल से अहमदाबाद लाया जाना है, जहां वह अपनी सजा काट रहे हैं। साल 2015 में अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर संजीव भट्ट को उनकी सेवाओं से हटा दिया गया था। भट्ट का हिरासत में मौत के मामले में दोष साबित होने के अलावा, कई आंतरिक पूछताछ और प्राथमिकी का सामना करते हुए, 2 दशक से ज्यादा का समय तक एक उथल-पुथल वाला आईपीएस का करियर रहा था। कई मामले गुजरात की मोदी सरकार से पहले के हैं लेकिन साल 2002 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद कार्रवाई करते हुए देखा गया।

लंबे समय तक नहीं हुआ प्रमोशन
2002 के दंगों के बाद गुजरात भर में आयोजित सीएम मोदी की गौरव यात्रा के ऑडियो क्लिप लीक होने के बाद राज्य सरकार के साथ उनकी पहली मुलाकात उसी वर्ष हुई थी। जब वह उन 3 आईपीएस अधिकारियों में से थे जिन्हें राज्य सीआईडी ​​​​खुफिया विभाग से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया था। साल 2003 में एक बार फिर संजीव भट्ट को फिर से उसी दस्तक का सामना करना पड़ा जब अहमदाबाद में साबरमती जेल के अधीक्षक के रूप में तैनात रहते हुए उन्होंने गोधरा ट्रेन जलाने के आरोपी को एक कैदियों की समिति में शामिल किया। उसी साल सितंबर में जब उनकी पोस्टिंग हुई, तो कैदी विरोध में भूख हड़ताल पर चले गए। उसके बाद लंबे समय के बाद 2007 तक भट्ट एसपी रैंक में रहे उनके खिलाफ कई लंबित पूछताछ के कारण उनके प्रमोशन से इनकार कर दिया गया।

नानावती आयोग में पेश होने के बाद किए गए निलंंबित
2011 में 2002 के दंगों की जांच कर रहे नानावती – मेहता आयोग के सामने पेश होने के तुरंत बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। गुजरात हिंसा के नौ साल बाद इस आयोग के सामने उन्होंने एक गवाह के तौर पर गवाही दी थी कि वो उस बैठक में शामिल थे जिसमें सरकार ने कथित तौर पर हिंसा जारी रखने का आदेश दिया था। यहां तक ​​कि कुछ लोगों ने भट्ट की व्हिसलब्लोअर के रूप में प्रशंसा की लेकिन राज्य सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट इसके बाद धीरे-धीरे सोशल एक्टिविज्म की ओर बढ़ते चले गए।

भट्ट की पत्नी को मोदी के खिलाफ कांग्रेस ने उतारा
ये मामला साल 2012 के लगभग का था तब भारतीय जनता पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर चर्चा की जा रही थी। नरेंद्र मोदी को शर्मिंदा करने के लिए कांग्रेस ने गुजरात में 2012 के विधानसभा चुनावों में मणिनगर विधानसभा क्षेत्र से संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता को मैदान में उतारा। इस चुनाव में नरेंद्र मोदी ने 86,000 से अधिक वोटो के भारी अंतर से जीत हासिल की और एक बार फिर गुजरात की सत्ता में प्रचंड बहुमत के साथ आए। के अंतर से भाजपा के गढ़ में जीत हासिल की, और बाद में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए।

गुजरात सरकार ने 2015 में किया बर्खास्त
इसके तुरंत बाद ही साल 2015 में संजीव भट्ट को अनधिकृत तौर पर अनुपस्थिति के आधार पर गुजरात सरकार द्वारा एक आवेदन पर केंद्रीय गृहमंत्रालय से पुलिस सेवा से बर्खास्त करवा दिया गया। हालांकि वह चार साल के लिए अनिश्चितकालीन निलंबन के तहत ही था। साल 2019 में, जामनगर की एक ट्रायल कोर्ट ने भट्ट सहित सात पुलिस अधिकारियों को हिरासत में यातना और 1990 में प्रभुदास वैष्णानी की मौत के लिए दोषी ठहराया उस समय भट्ट जामनगर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक थे।

आडवाणी की राम मंदिर रथयात्रा के दौरान 133 लोगों की गिरफ्तारी
राम मंदिर के लिए अपनी रथ यात्रा के दौरान बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के विरोध में भाजपा और विहिप के बंद के आह्वान के दौरान सांप्रदायिक दंगा करने के आरोप में पुलिस ने जामजोधपुर से वैष्णानी सहित 133 लोगों को गिरफ्तार किया था। वैष्णनी के भाई अमृतलाल ने उस समय शिकायत की थी कि नवंबर 1990 में भट्ट और अन्य लोगों द्वारा हिरासत में प्रताड़ित करने के बाद इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी। शेष 132 द्वारा चार और शिकायतें भी दर्ज कराई गईं थीं जिसमें प्रताड़ना का भी आरोप लगाया गया।

भट्ट सहित 8 अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज
हालांकि ये शिकायतें दो दशकों से भी ज्यादा समय से लंबित पड़ीं थीं और इनकी एफआईआर में भी नहीं दर्ज की गईं थी क्योंकि राज्य सरकार ने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। जुलाई 2011 में भट्ट के दूसरी बार नानावटी-मेहता आयोग के सामने पेश होने के बाद राज्य सरकार ने इन शिकायतों पर कार्रवाई करने की इजाजत दे दी और भट्ट सहित आठ अधिकारियों के खिलाफ हत्या के लिए प्राथमिकी दर्ज की गई। भट्ट को बनासकांठा की एक विशेष एनडीपीएस अदालत में 1996 से ‘ड्रग-प्लांटिंग’ मामले में भी मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थान के एक वकील सुमेर सिंह राजपुरोहित को पालनपुर के एक होटल से कथित तौर पर 1.5 किलो अफीम के साथ गिरफ्तार किया गया था।

कॉन्स्टेबल के डी पंत ने की शिकायत
इसके अलावा भट्ट को 2002 के दंगों से संबंधित एक और प्राथमिकी का सामना करना पड़ता है जिसमें कॉन्स्टेबल के डी पंत जिन्होंने उस समय सहायक खुफिया अधिकारी के रूप में कार्य किया था ने शिकायत की थी कि भट्ट ने उन्हें आयोग के समक्ष गवाही देने के लिए मजबूर किया था। पिछले सप्ताह डीसीबी द्वारा उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के अनुसार भट्ट ने साल 2011 और 2012 में नानावती-मेहता आयोग को जाली दस्तावेज प्रस्तुत किए थे इन दस्तावेजों में इस बात का दावा किया गया था कि उन्होंने 27 फरवरी और 28 फरवरी 2002 की रात को कई अधिकारियों को फैक्स अलर्ट भेजा था जब गोधरा में कारसेवकों की ट्रेन जलाए जाने के बाद सांप्रदायिक तनाव का माहौल था।

एसआईटी ने कहा फैक्स फर्जी हैं
डीसीबी ने कहा कि हिंसा में मोदी सरकार की भूमिका की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी ने पाया कि दो फैक्स दस्तावेज फर्जी, मनगढ़ंत और एक गुप्त मकसद से टेम्पर्ड (जो गलत तरीके से बनाए गए) थे। प्राथमिकी में आगे दावा किया गया है कि एसआईटी के निष्कर्षों के अनुसार, भट्ट ने जांच आयोग के समक्ष झूठा बयान दिया था कि वह 27 फरवरी, 2002 की रात को गांधीनगर में मोदी के बंगले में एक बैठक के दौरान मौजूद थे जहां सीएम ने कथित तौर पर कहा था कि हिंदुओं को गोधरा कांड पर अपनी नाराजगी जाहिर करने की इजाजत दी।

भट्ट की पत्नी का दावा
प्राथमिकी में भट्ट पर अलग-अलग गैर सरकारी संगठनों, कुछ राजनीतिक नेताओं और संगठनों … के साथ मिले होने का आरोप लगाया गया है … वहीं संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत करते हुए इन आरोपों को झूठा और चौंकाने वाला बताया। उन्होंने दावा किया उनके पास वीडियो टेप है…. माया कोडनानी, बाबू बजरंगी वीडियो टेप हैं … माया कोडनानी और बाबू बजरंगी जैसे लोगों की मिलीभगत जिस पर कोई विवाद नहीं है। मेरे पति ने एसआईटी के समक्ष रिपोर्ट की और एक खुफिया विभाग के अधिकारी के रूप में उनकी क्षमता में उनके सवालों का जवाब दिया। उसके बाद फर्जी दस्तावेज जमा करने का सवाल कहां से उठता है? यह न्याय का सरासर मजाक है। याचिका दायर करने वालों को ही बंद किया जा रहा है। जिस मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया है उस पर श्वेता ने कहा कि जब हम सुप्रीम कोर्ट के सामने जमानत के लिए कोशिश करते हैं तो हमारी एप्लीकेशंस रजिस्ट्रेशन से आगे ही नहीं बढ़ पाती हैं जबकि अन्य मामलों में तेजी से काम होता है।

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