पंजाब के खडूर साहिब से सांसद और अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के प्रमुख अमृतपाल सिंह अगले विधानसभा चुनाव में मालवा और माझा इलाके की एक-एक सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। पार्टी ने ऐसी संभावना जताई है। दोनों क्षेत्रों में उनकी पार्टी खुद को मजबूत मानती है।
अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि अजनाला थाने पर हुए हमले के मामले में इस समय असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल माझा क्षेत्र की खडूर साहिब सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। यह सीट उनके खडूर साहिब लोकसभा क्षेत्र में ही आती है।
वहीं, मालवा क्षेत्र में पार्टी कई विकल्पों पर विचार कर रही है। इनमें मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता भगवंत मान की धुरी सीट से अमृतपाल को सीधे उनके खिलाफ चुनाव लड़ाने का विकल्प भी शामिल है।
पार्टी के हिंदू चेहरे गंगवीर राठौर ने कहा, “हमारी पार्टी उन्हें (अमृतपाल को) पहले ही अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। दूसरे क्षेत्रीय नेताओं के मुकाबले उनका समर्थन माझा और मालवा दोनों में बहुत ज्यादा है।”
राठौर ने यह भी कहा, “आप मुझे मालवा का ऐसा एक नेता बता दीजिए, जो माझा से चुनाव लड़ सकता हो, या माझा का ऐसा नेता बता दीजिए, जो मालवा से चुनाव लड़ सकता हो। दोनों क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की क्षमता सिर्फ अमृतपाल में है।”
अगर अमृतपाल का यह कदम वास्तव में सामने आता है तो यह पंजाब की राजनीति में असामान्य होगा। पंजाब में आम तौर पर नेता किसी खास क्षेत्र से अपनी पहचान बनाए रखते हैं और मुख्य रूप से अपने गृह क्षेत्र से ही चुनाव लड़ते रहे हैं।
माझा क्षेत्र में लंबे समय से मुख्यमंत्री पद का कोई बड़ा दावेदार नहीं रहा है। 1950 और 1960 के दशक में मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरों इस क्षेत्र के आखिरी बड़े राजनीतिक नेता थे, जिन्होंने यह पद संभाला था। उसके बाद से पंजाब के हर मुख्यमंत्री का संबंध मालवा से रहा है। विधानसभा की 117 सीटों में से 69 सीटों के साथ मालवा राज्य का सबसे बड़ा क्षेत्र भी है। माझा में 25 विधानसभा सीटें हैं, जबकि बाकी 23 सीटें दोआबा क्षेत्र में आती हैं।
अमृतपाल को उनकी पार्टी “दशकों बाद माझा से पैदा हुए ऐसे पहले नेता” के तौर पर पेश कर रही है, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी का दावा कर सकते हैं और साथ ही मालवा के मतदाताओं को भी आकर्षित कर सकते हैं।
इससे पहले माझा क्षेत्र से शिरोमणि अकाली दल (SAD) के नेता और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया को भी मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार के रूप में देखा गया था। हालांकि, मजीठिया काफी हद तक बादल परिवार की राजनीतिक छाया में ही रहे। उनकी बहन हरसिमरत कौर बादल बठिंडा की सांसद हैं, लेकिन उनका राजनीतिक आधार माझा क्षेत्र से अलग स्वतंत्र रूप से बना है।
मजीठिया के मुकाबले अमृतपाल के सामने बादल परिवार के राजनीतिक ढांचे के भीतर काम करने जैसी सीमाएं नहीं हैं। वह खुद को पूरे पंजाब में प्रभाव रखने वाले नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
माझा क्षेत्र से मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार के तौर पर जिन दूसरे नामों की चर्चा हुई है, उनमें गुरदासपुर से कांग्रेस सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा शामिल हैं। हालांकि, कांग्रेस ने इनमें से किसी को भी औपचारिक रूप से अपना मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया है और पार्टी की ओर से ऐसी घोषणा होने की संभावना भी कम मानी जा रही है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने मालवा में दोनों नेताओं की “सीमित पहुंच” की ओर भी इशारा किया है।
मुख्यमंत्री भगवंत मान पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुख्य नेता बने हुए हैं। वहीं, फरवरी 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल पार्टी का मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं।
अमृतपाल के विकल्प
मालवा की कोटकपूरा सीट से अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के उम्मीदवार रशपाल सिंह सोसन ने कहा कि नशे की समस्या ने अमृतपाल को “पारंपरिक क्षेत्रीय बंटवारे से आगे निकलने” में मदद की है।
उन्होंने कहा, “लंबे समय से राजनीतिक दलों ने माझा और मालवा के बीच बंटवारे की धारणा बनाई है। लेकिन नशे के मुद्दे ने इस धारणा को खत्म कर दिया है। मालवा और माझा दोनों जगह की माताएं अपने बेटों के नशे की लत में फंसने को लेकर चिंतित हैं और सिर्फ अमृतपाल ही उन्हें यह भरोसा दिलाते हैं कि उनके बेटों को बचाया जा सकता है।”
अमृतपाल को लेकर बढ़ती अटकलों के बीच अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के प्रवक्ता जसकरण कहन सिंह वाला ने मंगलवार को तलवंडी साबो में पार्टी की बैठक की। उन्होंने कहा कि अमृतपाल की दूसरी सीट को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा, “पार्टी अभी अपने विकल्पों पर विचार कर रही है। एक विकल्प अमृतपाल को सीधे मान के खिलाफ चुनाव लड़ाना है। दूसरा विकल्प सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ चुनाव लड़ाना है। तीसरा विकल्प तलवंडी साबो से चुनाव लड़ना है, जो बठिंडा जिले की ग्रामीण सीट है। सभी विकल्प खुले हुए हैं।”
अकाली दल (वारिस पंजाब दे) में अमृतपाल को भगवंत मान के खिलाफ उतारने के पक्ष में एक तर्क यह है कि पंजाब में बहुत कम नेता ऐसे हैं, जो मुख्यमंत्री की तरह प्रभावी ढंग से भाषण दे सकते हैं। पार्टी नेताओं का मानना है कि अमृतपाल और मान के बीच सीधा मुकाबला अमृतपाल को मुख्यमंत्री पद के एक महत्वपूर्ण दावेदार के रूप में स्थापित करने में मदद कर सकता है। साथ ही इससे मान को अपनी विधानसभा सीट पर ज्यादा ध्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के अंदरूनी सूत्रों का यह भी कहना है कि अमृतपाल को सुखबीर बादल के खिलाफ मैदान में उतारने का प्रस्ताव पार्टी की उस कोशिश से जुड़ा है, जिसमें वह खुद को शिरोमणि अकाली दल के विकल्प के तौर पर पेश करना चाहती है।
वहीं, तलवंडी साबो को उसके रणनीतिक स्थान की वजह से विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। वहां अमृतपाल का चुनाव प्रचार बठिंडा और मानसा की आसपास की ग्रामीण विधानसभा सीटों में भी असर डाल सकता है। साथ ही यह ऐसी जगह हो सकती है, जहां से पार्टी आसपास की सीटों पर अपने उम्मीदवारों को समर्थन दे सके।
इस तरह अमृतपाल और उनकी पार्टी के लिए दूसरी विधानसभा सीट का चुनाव सिर्फ एक सीट जीतने का मामला नहीं है। यह पूरे पंजाब में पार्टी और अमृतपाल की राजनीतिक छवि और कहानी को मजबूत करने की कोशिश भी हो सकती है।
यह भी पढ़ें: सरकारी नौकरी करना चाहते थे प्रकाश सिंह बादल, रिश्तेदार ने फाड़ दिया था अपॉइंटमेंट लेटर… कैसे बने पांच बार पंजाब के सीएम? | Explained
पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने पंजाब में हिंदू-सिख भाईचारे को कायम रखने के लिए काम किया। पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव और प्रकाश सिंह बादल के प्रधान सचिव रहे रमेश इंदर सिंह के मुताबिक, प्रकाश सिंह बादल आम लोगों के नेता थे और उन्होंने जीवन में किसी के भी प्रति यहां तक कि अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भी दुश्मनी का भाव नहीं रखा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
