महाराष्ट्र के अमरावती जिला महिला अस्पताल के नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में सोमवार तड़के आग लगने से तीन नवजात शिशुओं की मौत हो गई। आग अस्पताल की तीसरी मंजिल पर रखे वेंटिलेटर में विस्फोट के बाद लगी जहां 39 नवजातों का इलाज चल रहा था। बच्चों की मौत के बाद कुछ परिवार सदमे में हैं क्योंकि उन्होंने नवजातों का चेहरा भी नहीं देखा था।
सोमवार को मुर्दाघर के बाहर बैठे स्वप्निल बोर्गे सदमे में थे। उनके बेटे का जन्म एक दिन पहले ही हुआ था और उन्होंने अभी तक उसका चेहरा भी नहीं देखा था। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान स्वप्निल ने कहा, “मैंने तो उसका चेहरा भी नहीं देखा था। मुझे नहीं पता कि मैं अपनी पत्नी को इसके बारे में कैसे बताऊँ। अगर उसे पता चला तो बहुत बुरा होगा।” बोर्गे का नवजात बेटा उन तीन नवजात शिशुओं में से एक है जिसकी आग में मौत हो गयी।
आंखों के सामने NICU को आग की लपटों में घिरते देखा
शवगृह के बाहर, कुछ राहगीरों ने स्वप्निल बोर्गे को सांत्वना दी। ऊपर देखते हुए उन्होंने कहा, “मैंने अपनी आंखों के सामने एनआईसीयू को आग की लपटों में घिरते देखा। मैं अपने बच्चे को ढूंढ रहा था तभी मुझे एक महिला की चीख सुनाई दी। मुझे सुबह 7 बजे पता चला कि मेरा बच्चा अब इस दुनिया में नहीं है। मैंने उसके बारे में बहुत सोचा था। मैं उसके लिए सोने का गहना खरीदता, उसका नाम रखता लेकिन उन्होंने मेरे बेटे को जिंदा ही खा लिया।”
अस्पताल में मौजूद कर्मचारियों और प्रत्यक्षदर्शियों ने अफरा-तफरी का ब्योरा दिया। एक कर्मचारी ने बताया, “हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। चारों तरफ़ बहुत धुआं था इसलिए हमने तुरंत बच्चों को बचाना शुरू कर दिया और फायर ब्रिगेड यंत्रों का इस्तेमाल किया। हमें कुछ भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। धमाके के तुरंत बाद पूरा वार्ड आग की लपटों में घिर गया था।”
मुरा भाई का पोता एनआईसीयू में था, उन्होंने शिशुओं को बचाने में मदद की। उन्होंने बताया, “हम अस्पताल के बरामदे में सो रहे थे जब हमें फोन आया। वार्ड के अंदर पूरी तरह अंधेरा था और हम अपने मोबाइल फोन की टॉर्च लेकर नर्सों की मदद के लिए तुरंत वहां पहुंचे। कुछ बच्चे पहले ही फंस चुके थे और उन्हें बचाया नहीं जा सका।”
सदमे में हैं परिवार
इनमें से एक गायत्री चोपड़े का परिवार उन्हें उनके पैतृक शहर अंजनगांव ले गया है और यह सुनिश्चित किया है कि वहां कोई टेलीविजन न हो जिस पर उस आग की खबर प्रसारित हो जिसमें उनके बच्चे की मौत हो गई। गायत्री के पति प्रफुल्ल चोपड़े ने बताया, “गर्भ में ही बच्चे ने मल निगल लिया था और उसे वारुड से अमरावती ले जाया गया था। बच्चा लगभग ठीक हो गया था और गायत्री को इस सप्ताह वारुड अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी। हमें बच्चे की मृत्यु के बारे में सुबह लगभग 7:30 बजे पता चला।”
किरण बेठेकर का परिवार जिनकी नन्ही बेटी की आग में मौत हो गई भी सदमे में है। उनकी मां वासंती काले ने कहा, “हमने एक हफ्ते तक बच्ची को नहीं देखा। हम बच्ची को पिछले सोमवार रात 10 बजे अचलपुर से अस्पताल लेकर आए थे।”
हीना कौसर तस्लीम खान के परिवार ने उन्हें आग के बारे में नहीं बताया है। हीना ने 22 अगस्त को जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, जिनमें से एक की सर्जरी के दौरान मौत हो गई। जीवित बची बच्ची को आग से बचा लिया गया और उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हीना की मां सुल्ताना बी शेख कलंदर ने कहा, “डॉक्टरों ने हमें सलाह दी है कि हम उन्हें उनकी दोनों बेटियों के बारे में न बताएं।”
अस्पताल में 2022 में भी वेंटिलेटर में विस्फोट हुआ था
अधिकारियों ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने वेंटिलेटर उपलब्ध कराए थे। एक अधिकारी ने कहा, “इसी अस्पताल में 2022 में भी एक वेंटिलेटर में इसी तरह का मामूली विस्फोट हुआ था, हालांकि तब कोई हताहत नहीं हुआ था। बाद में वेंटिलेटर बदल दिए गए थे। बदले गए वेंटिलेटरों में से एक में आग लग गई थी।”अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि इमारत का अग्नि सुरक्षा ऑडिट 21 अगस्त को समाप्त हो गया था और अस्पताल ने विभाग को इसकी सूचना दे दी थी। उन्होंने यह भी बताया कि वार्ड में लगा फायर सिक्योरिटी अलार्म भी काम नहीं कर रहा था। इस बीच, परिवार अभी भी इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।
जिला सर्जन डॉ पवार ने बताया कि उन्हें घटना की सूचना सुबह मिली और उन्होंने तुरंत दमकल विभाग को सूचित किया। उन्होंने कहा, “तब तक अस्पताल के कर्मचारियों ने छह शिशुओं को बचा लिया था। अग्निशामक यंत्रों का प्रयोग किया गया और दमकल कर्मियों ने पानी का छिड़काव भी किया, लेकिन धुआं कम नहीं हुआ।” हालांकि, परिजनों का आरोप है कि दमकल कर्मी आग बुझने के बाद पहुंचे। खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
