UP Politics: उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा के चुनाव होने हैं, जिसमें अब कुछ महीनों का ही वक्त बचा है। बंगाल चुनाव के नतीजे घोषित होने के साथ ही यूपी चुनाव देश की राजनीति का मुख्य मुद्दा बनने वाला है। इसके चलते ही यूपी में राजनीतिक बिसात बनने वाली है। प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के सहयोगी के माने जाने वाले गैर यादव ओबीसी वोट बैंक के मजबूत आधार को भेदने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया है।

सपा ने महिलाओं के नेतृत्व में पीडीए अभियान भी शुरू किया है। सपा ने पिछले कुछ वर्षों से बीजेपी राज्य में प्रमुख गैर-यादव ओबीसी निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करने के लिए अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क पर निर्भर रही है। कुर्मी-पटेल समुदाय में अपना दल (सोनेलाल), राजभर समुदाय में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) और निषाद, मल्लाह और केवट जैसी नदी किनारे बसी बस्तियों में निषाद पार्टी का दबदबा माना जाता है। ये समूह मिलकर एक निर्णायक चुनावी गठबंधन बनाते हैं, जिसका बीजेपी को पूर्वी यूपी में बड़ा फायदा मिलता है।

सपा PDA में दे रही महिला नेतृत्व को प्रथमिकता

परंपरागत रूप से मुस्लिम-यादव (MY) गठबंधन पर आधारित समाजवादी पार्टी पिछले चुनाव के बाद से एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने का प्रयास कर रही है और ऐसा लगता है कि उसने इस रणनीति को और भी दृढ़ कर दिया है। उसके हालिया कदम यह संकेत देते हैं कि वह महिला नेतृत्व को केंद्र बिंदु बनाकर एनडीए से जुड़े जातिगत आधारों में प्रतीकात्मक और संगठनात्मक रूप से पैठ बनाने का सुनियोजित प्रयास कर रही है।

एसपी महिला सभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में सीमा राजभर की नियुक्ति को राजभर समुदाय तक सीधी पहुंच बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिसे एसबीएसपी प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने राजनीतिक रूप से संगठित किया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया से ताल्लुक रखने वाली सीमा राजभर के इस प्रमोशन से एसपी की उन जिलों में अपनी पकड़ मजबूत करने की मंशा झलकती है, जहां एसबीएसपी का प्रभाव है। एसबीएसपी की पूर्व कार्यकर्ता सीमा राजभर सार्वजनिक रूप से राजभर की आलोचना करती रही हैं।

राजभर समुदाय के वोट बैंक पर नजर

राज्य की कुल जनसंख्या में राजभर समुदाय की अनुमानित हिस्सेदारी लगभग 4-5% है, जो मुख्य रूप से गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया, चंदौली, गोरखपुर, जौनपुर और मऊ जैसे जिलों में केंद्रित है। वर्तमान में एसबीएसपी के छह विधायक हैं, जो 2022 में सपा के साथ गठबंधन में चुने गए थे और बाद में एनडीए में शामिल हो गए। इनमें से ओम प्रकाश राजभर अब राज्य मंत्री हैं।

इसी तरह सपा द्वारा पूर्व सांसद फूलन देवी की बहन रुक्मणी निषाद को अपनी महिला शाखा का राज्य प्रमुख नियुक्त करना निषाद-मल्लाह-केवट समुदाय तक पहुंचने का एक प्रयास माना जा रहा है। इस समुदाय की अनुमानित जनसंख्या 5-6% है, नदी तटीय क्षेत्रों, तराई क्षेत्र और पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में प्रभावशाली है। यह कदम बीजेपी की सहयोगी, संजय निषाद के नेतृत्व वाली निषाद पार्टी को सीधी चुनौती देता है।

निषाद पार्टी के पास वर्तमान में पांच विधायक हैं। इस समुदाय की उपस्थिति पूर्वी उत्तर प्रदेश से परे मध्य उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है, जिससे संभावित रूप से 25-30 विधानसभा सीटों के परिणामों पर प्रभाव पड़ सकता है।

कुर्मी समाज का भी खेल

यूपी में कुर्मी आबादी 7-8 प्रतिशत है। समाजवादी पार्टी का कुर्मी-पटेल समुदाय तक पहुंचना काफी जटिल माना जा रहा है। पार्टी में कभी बेनी प्रसाद वर्मा जैसे प्रभावशाली कुर्मी नेता थे, जो इसके संस्थापक सदस्य भी थे लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी ने समुदाय के भीतर नए नेतृत्व का निर्माण करने का प्रयास किया है।

2022 के विधानसभा चुनावों से पहले सपा ने अपना दल (कामेरावाड़ी) गुट की नेता और अपना दल के संस्थापक सोने लाल पटेल की बेटी पल्लवी पटेल को मैदान में उतारा। उन्होंने तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ सिराथू से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, जिसे प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण माना गया।

केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की बहन पल्लवी अभी भी सपा की विधायक हैं, हालांकि उनके बीच-बीच में असहमति जताने से सवाल उठते रहे हैं। फिर भी, उनकी मौजूदगी सपा को कुर्मी-पटेल के वोट बैंक तक पहुंचने का एक जरिया मुहैया कराती है, जहां अपना दल (सोनेलाल) एनडीए का एक प्रमुख सहयोगी बना हुआ है, जिसके पास 13 विधायक हैं और केंद्र और राज्य दोनों सरकारों में उसका प्रतिनिधित्व है।

महिलाओं के नेतृत्व वाली पीडीए रणनीति क्यों?

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि महिलाओं पर केंद्रित ये नियुक्तियां कई राजनीतिक मकसदों को पूरा कर सकती है।

पहला मकसद सामाजिक संकेत हो सकता है। हाशिए पर पड़ी ओबीसी समुदायों की महिलाओं को आगे लाकर सार्वजनिक रूप से प्रोत्साहन मिलेगा।  बीजेपी के महिला विरोधी होने के आरोपों का खंडन भी हो जाएगा। दूसरा तरीका लक्षित लामबंदी है। यह दर्शाता है कि पार्टी अपने नेताओं को विशिष्ट जाति समूहों से चुनती है, जिससे उन क्षेत्रों में पहुंच बनाना संभव होता है जहां जातिगत पहचान अभी भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है।

तीसरा यह एनडीए के सहयोगियों के लिए एक सीधा जवाब है। इनमें से दो दल, एसबीएसपी और निषाद पार्टी, कभी सपा के सहयोगी थे। महिला नेताओं के माध्यम से उनके जातिगत आधार को प्रतिबिंबित करके सपा अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का प्रयास कर रही है। इस रणनीति का उद्देश्य बीजेपी के उस नैरेटिव का जवाब देना भी है जिसमें विपक्ष को महिला विरोधी के रूप में चित्रित किया गया है।

सपा की यह रणनीति विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश पर केंद्रित है। जहां एनडीए के सहयोगी दलों की मजबूत उपस्थिति हैं। इनमें मऊ, गाजीपुर, बलिया और जौनपुर में एसबीएसपी; संत कबीर नगर, कुशीनगर और महाराजगंज आदि शामिल हैं। इन समुदायों और क्षेत्रों से चुनी गई महिला नेताओं को स्थापित करके, सपा एक जमीनी स्तर पर लामबंदी का प्रयास करती दिख रही है जो उसके पारंपरिक वोट बैंक से कहीं आगे जाती है।

सामान्य वर्ग की नाराजगी, OBC में सेंधमारी; चुनाव से पहले BJP को सता रहा जातीय गणित बिगड़ने का डर

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसबा के चुनाव होने हैं। इससे पहले राज्य में जातीय समीकरण बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, जिसके चलते बीजेपी एक जटिल संकट से जूझ रही है। पार्टी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें बीजेपी का कथित कोर वोट बैंक माने जाने वाले सामान्य वर्ग का असंतोष, ओबीसी के वोट बैंक में सेंध लगने का डर एक कठिन चुनौती है। इसके अलावा बीजेपी में आंतरिक गुटबाजी और हालिया यूजीसी (UGC) नियमों को लेकर विवाद पार्टी को परेशान कर रहे हैं। पढ़िए पूरी खबर…