UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब 7-8 महीने का ही वक्त बचा है। उससे पहले सत्तारूढ़ बीजेपी से लेकर मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी तक अपनी चुनावी तैयारियों का पुख्ता करने और संगठन को सक्रिय करने में जुटे हुए हैं। वर्तमान में यूपी की सियासत का सबसे ज्वलंत मुद्दा अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर के चढ़ावे की चोरी से जुड़ा है और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इस पर सबसे ज्यादा आक्रामक हैं।

अखिलेश यादव ने खुद ये दावा किया है कि उन्होंने और समाजवादी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी का मुद्दा उठाया है। यूपी चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी तक को जिम्मेदार बता रहे हैं। इस मुद्दे के जरिए परोक्ष रूप से अखिलेश के निशाने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी हैं।

अखिलेश यादव ने बदला रुख

राम मंदिर चढ़ावा चोरी वाले विवाद के चलते पिछले कुछ हफ्तों में अखिलेश यादव ने अपने राजनीतिक स्टाइल में कुछ बदलाव के संकेत दिए हैं। दरअसल, हाल ही में अखिलेश यादव ने कहा, “एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, पर सड़कें धंस रही हैं। हर तरफ लूट, झूठ और चोरी का चक्र अबाध गति से चल रहा है। चढ़ावा-चंदा-दान चोरी खुलने के बाद बीजेपी, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के काले कारनामे उजागर हुए हैं। बीजेपी में बदहवासी छा गई है और वह जनता का ध्यान भटकाने के लिए बचकाने बयान दे रही है।”

इतना ही नहीं, अखिलेश यादव ने वादा भी कर चुके हैं कि 2027 के यूपी चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी तो अयोध्या को धर्म और अध्यात्म और धर्मनगरी के तौर पर डेवेलप करेंगे। इसके अलावा वे चढ़ावा चोरी के मामले में नए सिरे से जांच करने और दोषियों के खिलाफ सख्त-से-सख्त एक्शन लेने का वादा भी कर चुके हैं।

अखिलेश ने हाल ही में कहा था, “इस घटना ने दुनिया भर के सनातनियों को चिंतित कर दिया है, जिसे जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने भगवान राम की स्थापित गरिमा को विकृत करके बड़ा पाप किया है।” अखिलेश ने राम मंदिर दान विवाद पर SIT के गठन पर भी सवाल उठाए. उनका तर्क है कि यह सनातन धर्म का अपमान है।

सॉफ्ट हिंदुत्व की पिच पर अखिलेश

राम मंदिर चढ़ावे का मुद्दा तो जून में सामने आया है लेकिन अखिलेश यादव ने इससे पहले ही सॉफ्ट हिंदुत्व के पिच पर खेलना शुरू कर दिया था। ज्येष्ठ महीने के मंगलवार यानी बड़े मंगल के दिन हनुमान चालीसा का पाठ, और भंडारा का पाठ करने की उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब चली थीं। इसके अलावा सॉफ्ट हिंदुत्व की पिच पर अखिलेश यादव का सबसे बड़ा कार्ड, उनके पैतृक शहर इटावा में बन रहा केदारेश्वर मंदिर है, जिसमें करीब 50 करोड़ रुपये के खर्ज की चर्चा है। सूत्र बताते हैं कि अखिलेश यादव सावन के महीने में इटावा के इस केदारेश्वर मंदिर का उद्घाटन कर सकते हैं, इस दौरान बड़ी संख्या में संतों को भी बुलाया जा सकता है।

केदारेश्वार मंदिर में बाल स्वरूप भगवान श्रीराम की मूर्ति भी स्थापित की गई है। अखिलेश ने कहा कि यह मंदिर ‘शिवशक्ति अक्ष रेखा’ के ऊपर स्थित है, जो इसे आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। अप्रैल 2026 में अखिलेश ने मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की और निर्माण कार्य की प्रगति जानी थी। मार्च 2026 में रामनवमी के मौके पर उन्होंने मंदिर में बाल स्वरूप भगवान राम की मूर्ति की स्थापना की जानकारी दी।

शंकराचार्य से मुलाकात के जरिए भी दिया संदेश

अखिलेश यादव ने पिछले हफ्ते 9 जुलाई को अखिलेश यादव ने लखनऊ में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात की। शंकराचार्य से चार महीनों में यह उनकी दूसरी मुलाकात थी। अखिलेश ने एक्स पर तस्वीरें पोस्ट करते हुए लिखा था, “पूज्य शंकराचार्य जी के दर्शन और आशीर्वाद पाना सौभाग्य की बात थी। सनातन धर्म पर आ रहे संकट को दूर करने और धर्म को अधर्मियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए सार्थक चर्चा हुई।”

अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के नेता पार्टी की छवि को बदलने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं और सनातन के मुद्दे पर बीजेपी को घेर रहे हैं। सपा के लखनऊ कार्यालय में एक बड़ा सा पोस्टर भी देखने को मिला, जिसमें ‘सनातन ही समाजवादी है’ की टैगलाइन लिखी है। यह बताता है कि अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए बीजेपी के वोट बैंक में सेंधमारी के प्रयास कर रहे हैं लेकिन उनका विनिंग फॉर्मूला अलग है।

2024 में क्रैक किया था विनिंग फॉर्मूला

अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया था। इस चुनाव में अखिलेश पीडीए, यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे थे। कांग्रेस ने ‘संविधान और आरक्षण बचाओ’ का नारा दिया था। विपक्षी एकता और इस जातीय समीकरण के चलते सपा को यूपी में बड़ा फायदा मिला था। अखिलेश यादव की लीडरशिप में सपा ने उतनी सीटें जीत लीं थीं, जितनी उनके पिता मुलायम सिंह यादव एक चुनाव में कभी नहीं जिता पाए थे।

पीडीए वाले समीकरण के दम पर सपा 37 पर पहुंची थीं और कांग्रेस भी 2019 के मुकाबले 6 सीटें हासिल करने में कामयाब रही थी। बीजेपी 64 से घटकर 33 सीटों पर सिमट गई थी। इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी अयोध्या के तहत आने वाली फैजाबाद लोकसभा सीट तक जीत गई थी, जहां चुनाव से कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का समारोह हुआ था। इसीलिए अखिलेश के पीडीए समीकरण को विनिंग फॉर्मूले के तौर पर देखा जा रहा है।

PDA पर कितना फोकस?

भले ही राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे को आक्रामकता के साथ उठाने के चलते यह अनुमान लगाया जा रहा हो कि अखिलेश सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर हैं लेकिन चुनावी शोर के बीच चुपचाप अखिलेश अपने पीडीए वाले समीकरण को भी धार देने में लगे हुए हैं। पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि सपा इस बार यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर दलित और आदिवासी उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है।

लोकसभा चुनाव के दौरान फैजाबाद जैसी सामान्य सीट पर अखिलेश ने दलित सीटिंग विधायक अवधेश प्रसाद को उतारा था। नतीजा ये कि सपा को सफलता मिली। अयोध्या वाले उसी फॉर्मूले को अखिलेश यूपी की अन्य 14 सामान्य वर्ग बहुल वाली सीटों पर भी लागू करने की तैयारी कर रहे है। इसके चलते सपा आसानी से 100 सीटों पर दलित और आदिवासी प्रत्याशियों को उतारकर ये मैसेज देगी कि वह दलितों के लिए किस हद तक संवेदनशील है।

मुस्लिम-यादव प्रत्याशियों को कम टिकट

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के टिकट बंटवारे की राजनीतिक विश्लेषकों ने काफी तारीफ की थी, और इस रणनीति को सफलता का अहम पहलू बताया था। सपा पर बीजेपी द्वारा ये आरोप लगाया जाता है कि वह मुख्य तौर पर केवल मुस्लिम और यादव समाज के हित के लिए ही काम करती हैं और सपा में उनकी ही चलती है। वहीं 2024 में इस छवि को बदलने के लिए अखिलेश ने अपने परिवार के बाहर के किसी भी यादव नेता को टिकट नहीं दिया था, जबकि मुस्लिम समाज के प्रत्याशियों की संख्या काफी कम ही रखी थी।

2027 के चुनाव में भी अखिलेश कुछ ऐसा ही कर सकते हैं। टिकट बंटवारे में यादव समाज से आने वाले प्रत्याशियों को 2024 की तरह कम टिकट दिए जा सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट में बताया था कि, सपा की संगठन की बैठक अखिलेश यादव मुस्लिम समाज से आने वाले नेताओं को भी ये सदेश दे चुके हैं कि वे पार्टी विधानसभा चुनाव के दौरान कम मुस्लिम उतारेगी। हालांकि अगर पार्टी की सरकार बनती है, तो विधानपरिषद के जरिए। मुस्लिम समाज के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।

बीजेपी को चौतरफा घेरने का प्लान

अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व और अपना पीडीए का विनिंग फॉर्मूला साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सॉफ्ट हिंदुत्व के कार्ड के जरिए बीजेपी के उस कथित नाराज वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि बीजेपी के अलावा यूपी की सियासत में किसी अन्य विकल्प की तलाश कर रहा है। राम मंदिर के मुद्दे को भी वे ब्राह्मण वर्ग से कनेक्ट करने की कोशिश में है। इसीलिए उनका फोकस शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर भी है। हालांकि उनके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं।

अखिलेश यादव के सामने ये एक चुनौती भी बन सकता है क्योंकि बीजेपी लगातार समाजवादी पार्टी का इतिहास याद दिला रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन हमलों में सबसे आगे हैं। वे अखिलेश की इस रणनीति को ‘चुनावी नाटक’ करार दे चुके हैं। सीएम योगी ने हाल ही में उन तंज कसते हुए कहा था कि लगता है अब अखिलेश भी भगवा पहनने वाले हैं। हालांकि, जिस तरह से अखिलेश शंकराचार्य के मुद्दे पर योगी सरकार पर आक्रामक हैं, उसके चलते बीजेपी को डैमेज कंट्रोल भी करना पड़ा था, जिसकी कमान उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संभाली थी। उन्होंने शंकराचार्य के शिष्यों की पूजा करके ब्राह्मणों में नाराजगी को शांत करने की कोशिश की।

कांग्रेस और मुस्लिम वोट बैंक है चुनौती

अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी परेशानी वर्तमान राजनीतिक समीकरणों में कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस के साथ सपा का गठबंधन है, अखिलेश साथ में चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर चुके है। दिक्कत इस बात की है कि कांग्रेस सीट शेयरिंग के तहत सपा पर लगातार दबाव बना रही है। कांग्रेस के नए प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से लेकर इमरान मसूद और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय तक, सीट शेयरिंग के मुद्दे पर आक्रामक है। ऐसे में अखिलेश के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के साथ सहजता से सीटें फाइनल करना होगा।

इसके अलावा जातीय समीकरण का संतुलन बिठाना अभी भी सपा के लिए चुनौती ही है, क्योंकि भले ही प्रदेश स्तर पर अखिलेश पीडीए की बात कर रहे हों लेकिन आज की हकीकत यही है कि सपा के 97 जिला अध्यक्षों में से 70% यादव या मुस्लिम हैं, यानी PDA के नारे के बावजूद संगठन में पिछड़ों-दलितों को पार्टी के अंदर उस स्तर का प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।

इसके अलावा एक थ्योरी ये भी चल रही है कि सॉफ्ट हिंदुत्व सपा के लिए जोखिम भी हो सकता है, क्योंकि उनका यह प्रयोग सपा के मुस्लिम वोट बैंक को नाराज कर सकता है, जो हमेशा से पार्टी का सबसे भरोसेमंद आधार रहा है। बसपा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM अगर आक्रामकता के साथ चुनावी समर में उतरती हैं तो वे ये संदेश भी देने की कोशिश कर सकती हैं कि सपा अब मुस्लिम समाज के लोगों की तरफ ध्यान नहीं दे रही बल्कि हिंदू वोटरों को लुभाने के लिए अपनी मूल विचारधारा से समझौता कर रही है।

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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गुरुवार को अयोध्या राम मंदिर में मिले दान में अनियमितताओं और चोरी को लेकर बीजेपी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इसे सनातन धर्म में ‘महापाप’ बताया और मंदिर ट्रस्ट के पूर्ण पुनर्गठन की मांग की। पढ़िए पूरी खबर…