पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से चंद दिन पहले एआइएमआइएम का हुमायूं कबीर की पार्टी (आम जनता उन्नयन पार्टी) गठबंधन से अलग होने से एक बार फिर सियासी समीकरण तेजी से बदलने के आसार बढ़ने लगे हैं। खास तौर पर मुर्शिदाबाद, मालदा और दिनाजपुर समेत तीन जिलों की 43 विधानसभा सीटों पर इसका असर पड़ सकता है।
पश्चिम बंगाल की 294 में पिछले चुनाव में सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस पार्टी को पिछले चुनाव में 213 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि भारतीय जनता पार्टी को 77 सीट पर जीत मिली थी। इस विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ पहले सत्ता विरोधी लहर रही, लेकिन विशेष पुनरीक्षण अभियान के दौरान बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे जाने से उनमें गहरा रोष है।
राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम ने कहा, मुर्शिदाबाद की 22, उत्तर दिनाजपुर की 9 और मालदा की 12 सीट समेत कुल 43 सीटें मुसलिम बाहुल्य हैं। उन्होंने कहा, हुमायूं कबीर के गठबंधन से एआइएमआइएम के अलग होने से अब मतदाताओं का रुख तेजी से बदलने की आशंका जताई जा रही है। संभावना बढ़ गई है। अल्पसंख्यक मतदाता अब उस पार्टी को अपना समर्थन दे सकते हैं, जिनके जीत की उम्मीद अधिक है।
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीनों जिलों में आठ सीट पर जीत मिली थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 35 सीट पर जीत दर्ज की थी। उन्होंने कहा, हूमायूं कबीर विवाद के बाद एएआइएमआइएम के अलग लड़ने के निर्णय से मतदाताओं का रुख भी तेजी से बदलने की संभावना बढ़ गई है। इसका कितना फायदा किस दल को मिलेगा, यह मतदाताओं को ही पता है। मतुआ समेत सभी वर्ग के मतदाताओं के नाम कटने से वास्तविक मतदाता खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
कई परिवार के कुछ सदस्यों के नाम हैं तो कुछ के नहीं, ऐसे में उनका रुख बदलने की आशंका बढ़ती नजर आ रही है। अब सत्ता विरोधी लहर का रुख भी तेजी से बदलता दिख रहा है। राजनीतिक मामलों के जानकार उदयन बंदोपाध्याय ने कहा, चुनाव में जीत-हार से कहीं अधिक नैतिकता मायने रखती हैं। नैतिक मूल्यों के लिहाज से हुमायूं कबीर विवाद को प्रदेश की जनता भद्दे मजाक के तौर पर देख रही है और इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी।
