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एम्स के होनहारों का सपना, कैंसर का इलाज है खोजना

डॉ गोपाल का सपना है सर्जन बनकर कैंसर का इलाज करना। वे कहते हैं कि तमाम दूसरी बीमारियां इतनी दर्दनाक व चुनौतीपूर्ण नहीं हैं जितनी कैंसर। इसके मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। उनका सपना है कि इस दिशा में वे उत्कृष्ट काम करें और देश की सेवा में योगदान दे सकें।

दिल्ली स्थित एम्स। (फाइल फोटो)

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हुए दीक्षांत समारोह में एमबीबीएस छात्र रहे डॉ गोपालपुरी को चार स्वर्ण पदक के साथ संस्थान में सर्वश्रेष्ठ स्नातक होने के लिए संस्थान मेडल से नवाजा गया। वहीं, मनोचिकित्सा में बेहतर प्रदर्शन के लिए डॉ पीयूष अग्रवाल को डॉ सत्यानंद मेडल दिया गया। संस्थान में बहुआयामी प्रतिभा की धनी डॉ अक्षिता गुप्ता को आॅलराउंडर घोषित कर दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन मेडल से नवाजा गया। इसी तरह तमाम अन्य विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए द्युति शाह, उमंग अरोड़ा अशंक खेतान सहित अन्य छात्रों को सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले विद्यर्थियों का सपना कैंसर जैसी जटिल व चुनौतीपूर्ण बीमारी के इलाज व शोध की दिशा में काम करने का है। एम्स में दीक्षांत समारोह के बाद चौतरफा उत्साह का माहौल था। दीक्षांत गाउन में सजे चिकित्सक सेल्फी लेते, हंसी-मजाक में मशगूल व भविष्य के सपने साझा करते दिखे। इस मौके पर लोगों की बधाइयों से घिरे डॉ गोपालपुरी के हाथ में ढेरों मेडल व पुरस्कार दिखे। उन्हें एमबीबीएस के कुल पांच में से चार विषयों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया था।

डॉ गोपाल का सपना है सर्जन बनकर कैंसर का इलाज करना। वे कहते हैं कि तमाम दूसरी बीमारियां इतनी दर्दनाक व चुनौतीपूर्ण नहीं हैं जितनी कैंसर। इसके मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। उनका सपना है कि इस दिशा में वे उत्कृष्ट काम करें और देश की सेवा में योगदान दे सकें। वे चिकित्सा शिक्षा के लिए महानगरों में रहना अनिवार्य बताते हैं लेकिन अनुभव से खुद को निखारने व सही समझ पैदा करने के साथ ही काम करने के लिए देश के गांवों में सेवाएं देने को अहम मानते हैं, बशर्ते गांवों में बुनियादी संसाधनों की उपलब्धता हो।

चिकित्सा जगत के तमाम विभागों में तालमेल न होने को अहम चुनौती बताते हुए वे कहते हैं कि अगर तालमेल हो व पता हो कि अमुक विभाग किस क्षेत्र में शोध कार्य कर रहा है, उनके नतीजे क्या कहते हैं तो दूसरे विभाग की ओर से उनके काम के अनुभव को भी उसमें शामिल किया जा सकता है। इससे उनके काम में भी बढ़ोतरी होगी व बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं। पढ़ाई के तरीके व समय पर बात करने पर डॉ गोपालपुरी बताते हैं कि वे 12 से 18 घंटे पढ़ाई करते हैं। उन्होंने कहा कि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए सबसे अहम होता है उस विषय के प्रति रुझान, फि र सब आसान होता जाता है। वे बताते हैं कि पढ़ते वक्त वे अपना फोन दूसरे कमरे में रखकर तब पढ़ाई करते हैं। यहीं से एमबीबीएस की पढ़ाई में आॅलराउंडर रही डॉ अक्षिता गुप्ता को बाल चिकित्सा में स्वर्ण पदक से नवाजा गया है। अक्षिता का सपना भी कैंसर में शोध कार्य करना है। वे बताती हंै कि एम्स में तमाम मासूम बच्चे आते हैं जो इस बीमारी की चपेट में हैं। वे इस बीमारी की भयावहता से अनजान होते हैं। उन बच्चों की भोली आंखें उन्हें इस क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित करती हैं।

वे इस दिशा में शोध करके उन्हें राहत देना चाहती हैं। डॉ गुप्ता कहती हैं कि इंटरनेट व मोबाइल वाले इस दौर में पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन वे इसमें सफल रहीं। वे मेडिकल की पढ़ाई को सतत शिक्षा बताते हुए डॉ अक्षिता कहती हैं कि वे गांवों में जाकर कुछ दिन जरूर काम करना चाहती हैं क्योंकि वहां काम करके वे अपने भीतर की कमियां दूर सकती हैं और वहां सीखने को बहुत कुछ है। गांवों के परिवेश से लेकर परेशानी के तमाम आयामों तक की समझ हासिल की जा सकती है।

एम्स में प्रतिरक्षा विज्ञान में शोध (पीएचडी) कार्य पूरा कर चुकीं डॉ दिव्या अपनी बेटी को गोद में लेकर अपनी डिग्री लेने आई थीं। उन्होंने बताया कि उनका काम तपेदिक के इलाज में शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का उपयोग करना है। डॉ दिव्या बताती हैं कि जैसे कैंसर में आज प्रतिरक्षा विज्ञान सफलता से काम करने लगा है उसी तरह कुछ खानपान व कुछ दवाओं से वे शरीर के उसी प्रतिरक्षा तंत्र को सशक्त करने की खोज कर रही थीं। वे बताती हैं कि इससे तपेदिक के इलाज में और अधिक प्रभावी व किफायती सफलता हासिल की जा सकती है।

मेरा सपना सर्जन बनकर कैंसर का इलाज करना है। दूसरी बीमारियां इतनी दर्दनाक व चुनौतीपूर्ण नहीं हैं जितनी कैंसर। इसके मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। चिकित्सा शिक्षा के लिए महानगरों में रहना अनिवार्य है लेकिन अनुभव से खुद को निखारने व सही समझ पैदा करने के साथ ही काम करने के लिए गांवों में सेवाएं देना भी अहम है, बशर्ते वहां बुनियादी संसाधनों की उपलब्धता हो।
डॉ गोपालपुरी

मेरा सपना भी कैंसर में शोध कार्य करना है। एम्स में कई मासूम बच्चे आते हैं जो इस बीमारी की चपेट में हैं। वे इस बीमारी की भयावहता से अनजान होते हैं। उन बच्चों की भोली आंखें मुझे इस क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित करती हैं। मैं गांवों में जाकर भी कुछ दिन जरूर काम करना चाहती हूं क्योंकि वहां काम करके अपने भीतर की कमियां दूर की जा सकती हैं और वहां सीखने को बहुत कुछ है।
-डॉ अक्षिता गुप्ता

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