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दो घंटे का रास्ता तय कर हरियाणा जा रहे खून के नमूने

एम्स के हृदय वक्ष व तंत्रिका विज्ञान केंद्र (सीएन सेंटर) में पिछले दिनों लगी आग के कारण यहां खून के जांच वाली प्रयोगशाला जल कर खाक हो चुकी है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पिछले साल हुई आगजनी का व्यापक असर पड़ा है। मरीजों की जांच के लिए खून के नमूने एम्स से हरियाणा के झज्जर स्थित नेशनल कैंसर सेंटर भेजा जा रहा है। दो घंटे का सफर कर 60 से 77 किलोमीटर दूर स्थित इस सेंटर पर नमूने भेजे जाने से इसके खराब होने का खतरा रहता है। हालांकि कई पालियों में खून के नमूने भेजने के बावजूद इनमें गड़बड़ी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। जिससे मरीजों के इलाज पर भी फर्क पड़ सकता है। रोजाना करीब छह से सात सौ नमूने इसके सीएन सेंटर पर लिए जाते थे जो अब यहां से बाहर भेजा जा रहा है।

एम्स के हृदय वक्ष व तंत्रिका विज्ञान केंद्र (सीएन सेंटर) में पिछले दिनों लगी आग के कारण यहां खून के जांच वाली प्रयोगशाला जल कर खाक हो चुकी है। जिससे हृदय व न्यूरो विभाग के भर्ती व ओपीडी मरीजों के खून में लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्राल , एचडीएल, एलडीएल, ट्राईग्लिसराइड वगैरह ) की जांच के लिए जा रहे नमूनों की यहां पर जांच नहीं हो पा रही है। पहले कुछ दिन मरीज जांच के लिए इधर-उधर भटकते रहे क्योंकि जांच प्रयोगशाला की जगह आवाजाही बंद थी। तो मरीजों ने तमाम जांच मजबूरन बाहर से कराए। बाद में वैकल्पिक इंतजाम के तहत जांच के लिए नमूने तो यहां निकाले जाने लगे। लेकिन प्रयोगशाला व मशीनें जल चुकी होने की वजह से जांच यहां संभव नहीं हो पा रही।

मुश्किल है नमूनों की सही जांच
सैद्धांतिक रूप से तो यह कोशिश हो रही है कि नमूने खराब होने से पहले जांच प्रक्रिया शुरू हो जाए लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह संभव नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह है कि एक रास्ते से झज्झर की एम्स से दूरी करीब 63 से 68 किलोमीटर व एक अन्य रास्ते से करीब 77 किलोमीटर है। इसमें दो से तीन घंटे पहुंचने में लगते हैं। फिर नमूना वहां पहुंचने पर तुरंत मशीन पर लग जाए यह भी जरूरी नहीं। कई बार दूसरी या तीसरी बार में भेजा जाने वाला नमूना इतनी देर से पहुंचता है कि उस दिन उसे जांच के लिए मशीन पर नहीं लगा पाते हैं।

इसकी एक वजह यह भी है कि जांच में लगे कर्मचारियों को अपनी ड्यूटी आॅफ करने के लिए एम्स के मुख्य परिसर आना पड़ता है। इसलिए उनको अपनी पांच बजे खत्म होने वाली ड्यूटी के लिए झज्जर से करीब डेढ़ से दो घंटे पहले निकलना पड़ता है। इसलिए भी वे नमूने को मशीन पर नहीं लगाते क्योंकि फिर उसकी जांच पूरी होने तक रुकना पड़ेगा।

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