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पूर्वोत्तर में BJP को झटकाः AGP ने वापस लिया सरकार से समर्थन, नागरिकता बिल पर किया किनारा

नागरिकता (संशोधन) बिल, 2016 का मकसद अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए प्रवासी हिंदुओं, पारसियों, सिखों, जैनों और ईसाइयों को नागरिकता देना है।

असम गण परिषद की प्रेस कॉन्फ्रेंस (फोटोः इंडियन एक्सप्रेस)

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले पूर्वोत्तर में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा है। नागरिकता को लेकर चल रहे बवाल के बीच असम गण परिषद ने भाजपा की सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। एजीपी के अध्यक्ष अतुल बोर ने इस फैसले का ऐलान किया है। हालांकि इस फैसले से राज्य में भाजपा की सरकार पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

क्या है बिल और क्यों है विरोधः उल्लेखनीय है कि असम भाजपा के दिग्गज नेता और राज्य सरकार में वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने सोमवार को कहा था कि यदि राज्य में नागरिकता (संशोधन) बिल पास नहीं हुआ तो पांच साल में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। गौरतलब है कि नागरिकता (संशोधन) बिल, 2016 का मकसद अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए प्रवासी हिंदुओं, पारसियों, सिखों, जैनों और ईसाइयों को नागरिकता देना है। एजीपी ने इस बिल का विरोध करते कहा कि इस बिल से असम को नुकसान होगा। अक्टूबर में भी गुवाहाटी में इस बिल के विरोध में रैली की थी।

असम विधानसभा में ऐसे हैं समीकरणः फिलहाल 126 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के पास 61 विधायक हैं। वहीं इसकी गठबंधन की साथियों बोडो पीपुल्स फ्रंट के पास 14 सीटें हैं। वहीं अब तक समर्थन कर रही असम गण परिषद के पास 12 सीटें हैं। ऐसे में एजीपी के बाहर जाने के बावजूद भाजपा नीत गठबंधन के पास 75 सीटें हैं जो बहुमत के आंकड़े से ज्यादा है। ऐसे में एजीपी के इस फैसले से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि नागरिकता से ही जुड़े एक और बिल एनआरसी  (नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजंस) को लेकर भी भाजपा काफी विरोधी का सामना कर रही है।

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