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दिल्ली मेरी दिल्ली: विवादों की सरकार

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनने के साथ ही उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार में विवाद लगातार जारी है।

Author April 16, 2018 5:32 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर, कटना खरबूजे को ही है। यह कहावत पिछले काफी वक्त से दिल्ली की जनता पर लागू हो रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनने के साथ ही उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार में विवाद लगातार जारी है। राजनिवास (उपराज्यपाल कार्यालय) की ओर से बार-बार कहा जाता है कि सरकार नियमों के तहत काम नहीं करती और सरकार कहती है कि राजनिवास उसे काम करने नहीं दे रहा है। पहले लगा था कि यह विवाद पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग के हटने के साथ खत्म हो जाएगा, लेकिन अनिल बैजल के आने के बाद भी तस्वीर पहले जैसी ही है। इस विवाद के कारण सबसिडी देकर बिजली-पानी के दाम न बढ़ने देने के अलावा सरकार कोई ठोस काम नहीं कर पा रही है। दिल्ली में न तो स्कूल-कॉलेज बने न अस्पताल और न ही फ्लाईओवर। हालात इतने खराब हो गए हैं कि शीला दीक्षित सरकार ने कई योजनाओं को 2013 में जहां छोड़ा था, वे आज भी वहीं है। उन्हीं में से कुछ परियोजनाओं को पूरा करा के मौजूदा सरकार सस्ते में काम कराने का दावा कर देती है और कभी नए स्कूल के बजाए पुराने स्कूलों की मरम्मत करा के ही उसका श्रेय लेने लगती है।

उपवास की राजनीति
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आते ही अनशन किया तो उनकी खूब जगहंसाई हुई। इसी के कारण शायद उन्होंने सीलिंग के विरोध में उपवास करने का फैसला वापस ले लिया। वहीं पिछले दिनों केंद्र सरकार ने भी इसी राह पर चलते हुए लोकसभा न चलने देने को लेकर देशभर में उपवास किया, जिससे दिल्ली के कई इलाकों में यातायात ठप हो गया। संयोग से प्रधानमंत्री ने किसी सार्वजनिक स्थल पर बैठकर उपवास नहीं किया, वरना देश में एक नई बहस छिड़ जाती। इस सरकारी उपवास से दो दिन पहले कांग्रेस के उपवास के दिन कई कांग्रेस नेताओं के छोले-भटूरे खाने की तस्वीर सार्वजनिक होने के बाद भाजपा के नेताओं ने सावधानी बरतते हुए सार्वजनिक रूप से कहीं भी कुछ भी खाने की कोशिश नहीं की। वहीं कांग्रेस का उपवास जहां पांच घंटे का था तो भाजपा ने उससे दो कदम आगे बढ़ के सात घंटे का उपवास किया।

छह घंटे का ‘आमरण’ अनशन
कई बार अति उत्साह में किया गया काम किसी व्यक्ति या संगठन पर भारी पड़ जाता है। कुछ ऐसा एक नजारा दिखा पिछले दिनों भाजपा के सांसदों के उपवास के कार्यक्रम में। हुआ यूं कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व सांसद मनोज तिवारी के कुछ घंटों के उपवास के लिए बने मंच पर ‘आमरण अनशन’ के बड़े-बड़े बैनर लगे थे। इन बैनरों पर जब लोगों की नजर पड़ी तो चर्चा शुरू हो गई कि अति उत्साह में ‘महोदय’ से भूल हो गई होगी। शायद उन्हें पता नहीं था कि सभी सांसदों के लिए अनशन का समय तय था। फिर यह ‘आमरण’ कैसे हुआ?किसी ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘भाई बड़े लोग हैं! हो सकता है छह-सात घंटे भूखे रहने में ही जान निकल जाए! इसलिए छह घंटे के उपवास को ‘आमरण’ का तमगा दिया जाना गलत कैसे हुआ?’

गश्त की जरूरत
दिल्ली पुलिस का साइकिल गश्त अभियान अब चाय-पकौड़े की दुकान की शोभा बढ़ा रहा है। साउथ एवेन्यू में संसद क्लब के सामने बने चार-पांच खोमचों के पास बीते दिनों गश्ती की साइकिल खड़ी देखी गई और पुलिसवालों को कुर्सी पर आराम फरमाते हुए देखा गया तो जिज्ञासा शांत करने के लिए पुलिसवालों से पूछ लिया गया कि गश्त क्या दुकानों पर हो रही है? तो जवाब मिला कि गश्त तो कहीं भी हो सकती है और यहां तो चाय-पकौड़े की दुकान है तो यहां तो गश्त की और भी ज्यादा जरूरत है।

कूड़ामय हुआ शहर
देश के सबसे साफ-सुथरे शहरों की सूची में जगह बनाने के लिए कुछ दिनों पहले नोएडा के बड़े अफसर ऊंचे-ऊंचे दावे कर रहे थे। उसी नोएडा में पिछले एक हफ्ते से कूड़ा नहीं उठाया जा रहा है। जिस शहर में रोजाना करीब 600 टन कचरा निकलता है, वहां कई दिनों तक कूड़ा नहीं उठाने पर क्या हालत होगी, खुद ही सोचिए। अस्पताल, डिस्पेंसरी, सरकारी कार्यालय समेत कारखाने और रिहायशी इलाके कूड़े-करकट से अटे पड़े हैं। कूड़ा न उठाए जाने की वजह यह है कि शहर में उसे डालने की कोई जगह ही नहीं है। सेक्टर-52 और जहां कभी कूड़ा डाला जा रहा था, वहां पर लोगों के विरोध प्रदर्शन के कारण अब कूड़ा नहीं डाला जा रहा है। इसके कारण पूरा शहर ही कूड़ामय हो गया है। -बेदिल

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