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सगाई के बाद प्रेमिका को हुआ पैरालिसिस, मेजर ने साथ नहीं छोड़ा, शहादत ने दोनों को किया अलग

33 साल के मेज़र शशिधरन वी नायर को रविवार को राजकीय सम्मान के साथ 21 बंदूकों की सलामी दे गई और पुणे में उनके पैतृक गांव में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके 12 साल के चचेरे भाई ने उन्हें मुखाग्नि दी। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा। इस दौरान मेज़र शशि नायर अमर रहे और भारत माता की जय जैसे नारों से पूरा गांव गूंज उठा।

Updated: January 15, 2019 5:34 PM

जम्मू-कश्मीर में एलओसी यानि लाइन ऑफ कंट्रोल पर आईईडी विस्फोट में भारतीय सेना के दो जवान शहीद हो गए। इसी ब्लास्ट में शहीद हुए मेज़र शशिधरन वी नायर सोशल मीडिया पर काफी चर्चे में हैं। देश के लिए जान देने वाले मेज़र शशिधरन की चर्चा उनकी देशभक्ति के साथ-साथ उनकी प्रेम कहानी को लेकर भी हो रही है। लकवा मारने के बाद भी प्रेमिका से शादी का वादा पूरा करने वाले मेज़र शशिधरन की कहानी आइए जानते हैं।

30 जुलाई 1985 को पुणे के पास खडकवस्ला गांव में पैदा हुए मेज़र शशिधरन वी. नायर बचपन से ही सेना में जाना चाहते थे। एनसीसी में जाने के लिए वे रोजाना दोस्त की साइकिल से 15 किलोमीटर का सफर करते थे। केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई कर वे एनडीए में गए और फिर सेना में शामिल हो गए।  मेज़र नायर तृप्ति से प्यार करते थे। सेना में नौकरी मिलने के बाद उन्होंने तृप्ति से शादी करने का फैसला लिया।

दोनों का परिवार उनके इस फैसले से खुश था और दोनों ने सगाई भी कर ली थी। मेज़र नायर ने तृप्ति से हमेशा साथ निभाने का वादा किया था। लेकिन, शादी से पहले ही तृप्ति को लकवा हो गया।  इस कारण वे शरीर के निचले हिस्से से असहाय हो गई थीं। ऐसे में रिश्तेदारों ने शादी ना करने का दबाव डाला लेकिन वादा निभाने में पक्के मेज़र नायर तृप्ति से शादी करने की ज़िद पर अड़े रहे।  तृप्ति की बीमारी दोनों के प्यार की दरार नहीं बन पाई और दोनों की शादी हो गई। शादी के बाद दोनों बहुत खुश थे। मेजर नायर हर पार्टी हो या फंक्शन तृप्ति को हर जगह अपने साथ ले जाते थे। लेकिन, राजौरी में हुए ब्लास्ट ने दोनों को हमेशा के लिए अलग कर दिया। इस नापाक घटना को पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम ने आतंकियों की मदद से अंजाम दिया था।

33 साल के मेज़र शशिधरन वी नायर को रविवार को राजकीय सम्मान के साथ 21 बंदूकों की सलामी दे गई और पुणे में उनके पैतृक गांव में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके 12 साल के चचेरे भाई ने उन्हें मुखाग्नि दी। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा। इस दौरान मेज़र शशि नायर अमर रहे और भारत माता की जय जैसे नारों से पूरा गांव गूंज उठा।

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