दिल्ली मेरी दिल्ली: नेता और कार्यकर्ता

यदि आम आदमी पार्टी को तीन सीटें कांग्रेस को देनी पड़ती हैं तो इसका सीधा मतलब होगा कि उसके 30 विधायकों और 120 नगर निगम वार्डों के कार्यकर्ताओं पर असर पड़ेगा।

कांग्रेसी किसी भी सूरत में अपनी खोई सत्ता वापस चाहते हैं।

-बेदिल

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी तालमेल में हो रही देरी का भले कोई नतीजा नहीं निकल रहा हो लेकिन दोनों दलों के रणनीतिकारों को यह आशंका जरूर खाए जा रही है कि गठबंधन की सूरत में कहीं उनके नेता व कार्यकर्ता पार्टी छोड़ने पर न आमादा हो जाएं। गठबंधन होने की स्थिति में दोनों ही पार्टियों के लिए अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं को समझाना मुश्किल हो जाएगा। दिल्ली में लोकसभा की एक सीट में 10 विधानसभाएं हैं और 40 निगम वार्ड। यदि आम आदमी पार्टी को तीन सीटें कांग्रेस को देनी पड़ती हैं तो इसका सीधा मतलब होगा कि उसके 30 विधायकों और 120 नगर निगम वार्डों के कार्यकर्ताओं पर असर पड़ेगा। वही हालत कांग्रेस की भी है। लंबे समय बाद बीते कुछ वर्षों से सत्ता से बाहर हुए कांग्रेसी किसी भी सूरत में अपनी खोई सत्ता वापस चाहते हैं और यदि चार सीटों पर आम आदमी पार्टी लड़ी तो 40 विधानसभाओं और 160 नगर निगम वार्डों में चुनाव लड़ चुके कांग्रेसी परेशानी में आ जाएंगे। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इनमें से काफी पाला बदल सकते हैं या भाजपा सहित अन्य दलों में शामिल हो सकते हैं।

अंगूर खट्टे हैं
कहावत है कि किसी को प्रयास के बावजूद कुछ न मिले को कह दिया कि अंगूर खट्टे हैं। यह कहावत आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं पर लागू होती है। बिना चुनाव की तारीख घोषित हुए सात में से पांच के प्रभारी घोषित कर दिए और चुनाव घोषित होते ही हर सीट के उम्मीदवार घोषित करके प्रचार शुरू कर दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस से सीटों का समझौता हो जाए इसके लिए प्रयास भी शुरू कर दिए। उन नेताओं को समझौते के लिए लगाया जिनका दिल्ली की राजनीति के बारे ज्ञान शून्य है। एक तरफ समझौते का प्रयास करना और दूसरी तरफ लगातार कांग्रेस को अपशब्ध बोलकर चुनाव प्रचार करना ‘आप’ के नेताओं के बूते में ही है। और तो और जब दिल्ली में समझौते की बात होने लगी तो चार राज्यों में समझौते पर अड़ गए। लगता नहीं कि ‘आप’ की गाड़ी सही पटरी पर चल रही है। दिल्ली में चुनाव 12 मई को है। इस लिहाज से अभी प्रयोग का समय पार्टी नेताओं के पास काफी है लेकिन उसी में से एक दल उम्मीदवार घोषित करके चुनाव प्रचार कर रही हो तब दूसरों का इस तरह के समझौते में उलझना कहीं आत्मघाती न साबित हो जाए।

जीत की उम्मीद
अभी दिल्ली में भाजपा सभी सातों सीटों पर काबिज है। 2014 के चुनाव में दिल्ली में ही नहीं देश भर में चुनाव प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा गया। चुनाव में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी सरकार पूर्ण बहुमत की बनी। भाजपा के सांसदों को लग रहा है कि उनको तो फिर लोग चुनाव जीता देंगे। भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार की योजनाओं से अधिक भाजपा नेता एयर स्ट्राइक और पराक्रमी प्रधानमंत्री को मुद्दा बनाकर घर बैठे चुनाव जीतने में लगे हुए हैं। कहा यही जा रहा है कि दिल्ली भाजपा के टिकट तो अब चैत्र नवरात्रों के दौरान घोषित होंगे और तब तय होगा कि कितनों के टिकट बदलेंगे लेकिन तब तक दिल्ली भाजपा के नेता और लोक सभा सीटों के उम्मीदवार बड़े नेताओं के दिल्ली में रहने पर उनकी गणेश परिक्रमा में लगे हुए हैं।

चोरों की चालाकी
राजधानी में इन दिनों डिजिटल सामानों की चोरी की ऑनलाइन धरपकड़ को देखते हुए चोरों ने एक नया तरीका इजाद किया है जिसमें वे चोरी का सामान खास कर इलेक्ट्रॉनिक सामान चुरा कर खुद नहीं रखते बल्कि उसे तुरंत बेच देते हैं वह भी कल पुर्जे अलग करके। जैसे ही चोरी का कोई मामला सामने आया उनके सक्रिय दल चोरी के सामनों के कल पुर्जे निकाल कर उनके भाग बेच देते हैं। गफ्फार बाजार के एक दुकानदार ने बताया कि ऐसा इसलिए ताकि ईएमईआइ से कुछ पकड़ा न जा सके और ऑनलाइन मानीटरिंग के बावजूद उनका कुछ न बिगड़े। इसे कहते हैं तू डाल डाल मैं पात पात ।

Next Stories
1 रोजगार के मुद्दे पर युवाओं का ‘पहला वोट’ करेगा चोट
2 गठबंधन का पेच: कड़ी सौदेबाजी जारी, अकेले लड़ने की भी तैयारी
3 बंगाल: वोटर कार्ड में ‘अन्य’ अंकित कराने में हो रही दिक्कत से नाराज हैं किन्नर
आज का राशिफल
X