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शाही स्नान कर बोले दलित महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि, सनातन छोड़कर जाने वालों की धर्म वापसी चाहता हूं

सनातन संस्कृति के इतिहास में किसी दलित को पहली बार जूना अखाड़े ने महामंडलेश्वर उपाधि देने का फैसला किया था। जिसके बाद प्रयागराज के मौजगिरि आश्रम में जूना अखाड़े के साधु-संतो की मौजूदगी में दलित संत कन्हैया कुमार कश्यप, दीक्षा और संस्कार के बाद कन्हैया प्रभुनंद गिरि बनाए गए थे।

Author Published on: January 16, 2019 5:22 PM
कन्हैया प्रभुनंद गिरि, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

सनातन संस्कृति के इतिहास में किसी दलित को पहली बार जूना अखाड़े ने महामंडलेश्वर उपाधि देने का फैसला किया था। जिसके बाद प्रयागराज के मौजगिरि आश्रम में जूना अखाड़े के साधु-संतो की मौजूदगी में दलित संत कन्हैया कुमार कश्यप, दीक्षा और संस्कार के बाद कन्हैया प्रभुनंद गिरि बनाए गए थे। मंगलवार को कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने प्रयागराज में शाही स्नान किया और कहा कि वो दलितों, एसटी और ओबीसी के लोगों की घर वापसी चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग शोषण के डर से बौद्ध, क्रिश्चन या मुसलमान बन गए हैं वो घर वापसी कर लें।

करीब हजार साल बाद बदला दौर: मंगलवार शाम कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने बताया कि दो बंदूकधारी लोगों ने उन्हें धमकाने की कोशिश की जिसकी वजह है कि जो वो हैं। उनके मुताबिक इसकी वजह है कि एक दलित को महामंडलेश्वर बना दिया गया है। जो सभी को पसंद नहीं आ रहा है। कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने बताया कि संत रविदास के बाद करीब एक हजार साल बाद किसी दलित को जगतगुरू का दर्जा मिला है।

सनातन में होगी घर वापसी: कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने कहा कि मैं मेरे उन सभी साथियों को वापस सनातन धर्म में लाउंगा जिन्होंने शोषण और भेदभाव के डर से बौद्ध, क्रिश्चन या मुसलमान बनने की ओर रुख किया। मैं उन्हें बताउंगा की आखिर कैसे जूना अखाड़े ने मेरे साथ दिया है। वहीं कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने कहा कि जाति के नाम पर उनका काफी शोषण हुआ था जो उन्हें किसी गोली के तरह चुभते थे। एक वक्त ऐसा था जब वो भी हिंदुत्व छोड़न चाह रहे थे।

जिस लम्हे ने बदल दी जिंदगी: कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने एक किस्सा बताते हुए कहा कि 1999 में मैं चंडीगढ़ में था जहां सिख गुरुओं की मंडली चल रही थी। जब उनको मेरी जाति का पता लगा तो उन्होंने मुझे सबसे दरवाजे के पास खड़े होने के लिए कहा। लेकिन मैं उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना चाहता था लेकिन मुझे कहा गया कि शुद्रों को पैर छूने की इजाजत नहीं होती है। हालांकि अब मैं उस स्थान पर हूं जहां कई जाति और धर्म के लोग मेरे आगे झुकते हैं। मैं अब एक जगतगुरू हूं जो सभी की बराबरी के लिए लड़ता रहूंगा।

गर्व था पल था रथ पर बैठना: कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने कहा कि शाही स्नान के लिए रथ पर बैठना एक गर्व भरा पल था। मेरे समाज और जाति के लोग हमेशा इस ओहदे से दूर रहे। हमने कई बार मानसिक और शारीरिक रूप से खुद को दमदार साबित किया चाहें संविधान लिखने की बात हो या फिर अंग्रेजों और मुगलों से लड़ने की। बचपन याद करते हुए गिरि ने कहा कि पिता की मौत के बाद हमारे सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई थी। जिसके लिए काफी कुछ करना पड़ा।

संस्कृत चाहता था पढ़ना: गिरि ने बताया कि मैं दसवीं क्लास के बाद संस्कृत पढ़ना चाहता था लेकिन मेरी जाति की वजह से मुझे इजाजत नहीं मिली। जिसके बाद मुझे जगतगुरु पंचानंदजी महाराज ने 2008 में संस्कृत पढ़ाना शुरू किया और जल्दी ही मुझे मंदिर का पुजारी बना दिया गया। हालांकि इसके बाद मेरे ऊपर कई बार हमले भी हुए। मेरी हाथ की शायद की कोई उंगली ऐसी हो जो टूटी न हो। मेरे मंदिर में तोड़ फोड़ भी की गई।

सनातन से इसलिए डरती है मेरी जाति: गिरि ने बताया कि सनातन धर्म से मेरी जाति इसलिए डरती है क्योंकि वो हमे शामिल नहीं करते हैं। उनके लिए संविधान एक पवित्र किताब जैसा है। आज जब मैं उनसे मिलता हूं तो वो मुझे एक राजनीतिक मानते हैं और समझते हैं कि मैं धोखा देने आया हूं। हालांकि जब उन्हें मेरा मिशन समझ आया तब वो सभी मेरे एक इशारे पर मेरे साथ खड़े हो गए। इसके साथ ही गिरि ने कहा कि हमें नेताओं और मीडिया को हमे दलित, एससी, एसटी और ओबीसी कहना छोड़ना चाहिए जो हमें संविधान में मिले हैं। हमनें वेद लिखे, पुराण लिखे, रामायण लिखी, यहां तक की संविधान भी लिखा। हम ही एकलव्य और करण थे और हम ही अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य थे। मैं सभी की सोच बदलकर सभी को एक साथ लाना चाहता हूं।

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