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हिंदू संगठनों के हंगामे के बाद रद्द हुआ नास्तिकों का सम्मेलन

वृंदावन में नास्तिकों के दो दिवसीय सम्मेलन में हिंदूवादी संगठनों के हंगामे के बाद प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी।
Author मथुरा/ नई दिल्ली | October 16, 2016 03:33 am

अशोक बंसल
वृंदावन में नास्तिकों के दो दिवसीय सम्मेलन में हिंदूवादी संगठनों के हंगामे के बाद प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी। सम्मेलन में एक हजार नास्तिकों के इकट्ठा होने का एलान किया गया था। वहीं जनवादी लेखक संघ ने श्री बालेंदु स्वामी द्वारा आहूत नास्तिक सम्मेलन के स्थल पर हिंदुत्ववादियों द्वारा की गई तोड़-फोड़, हंगामे और बदसलूकियों की कड़े शब्दों में निंदा की है। जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप-सचिव संजीव कुमार ने शनिवार को कहा कि मथुरा के जिला-प्रशासन और वहां की पुलिस ने इस मौके पर जो भूमिका निभाई, वह निंदनीय है। आरोप है कि हिंदू संगठनों की हाथापाई में एक महिला फोटो पत्रकार को काफी चोट आई है। अपने तरीके का यह अनोखा सम्मेलन वृंदावन के बालेंदु नाम के एक श्वेत वस्त्रधारी ने आयोजित किया था। बालेंदु वृंदावन में एक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र और एक रेस्तरां चलाते हैं। आरोप है कि बालेंदु द्वारा धर्म ग्रंथों को उपन्यास, काल्पनिक कहानियां और मनोरंजन के साधन बताए जाने और नास्तिकों की भीड़ के वृंदावन में जुटने की खबर ने इलाके में टकराव पैदा कर दिया। कार्यक्रम को लेकर हुई प्रेस वार्ता में ईश्वर के अस्तित्व पर बालेंदु ने जैसे ही सवाल खड़ा किए, वृंदावन के साधू-संतों ने हंगामा शुरू कर दिया। सम्मेलन के आयोजक को गिरफ्तार करने की मांग उठने लगी। कई संतों ने इकट्ठे होकर कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शन भी किया और बालेंदु के होटल पर पत्थर भी फेंके। संतों ने विश्व हिंदू परिषद के नेताओं को बुलाकर थाने में लिखित शिकायत भी दर्ज की। इसके बाद मामले में पुलिस ने दखल दिया।


मथुरा के सिटी मजिस्ट्रेट राम अरज यादव ने बताया कि इस सम्मेलन की कोई अनुमति नहीं ली गई थी। अत: इसे आयोजित होने से रोक दिया गया। वृंदावन के पूर्व सभासद हरिओम शर्मा ने बताया कि आस्तिकता और नास्तिकता की बहस समाज में छिड़ती रही है। लेकिन वृंदावन जैसी धर्म नगरी जिसके बाशिंदों की रोजी-रोटी जिसके धार्मिक स्वरूप पर टिकी है, वहां इस सम्मेलन को कराना अच्छे-भले शहर में बवाल मचाना है। मथुरा में कार्यक्रम में शिरकत करने गए डीयू के प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने बताया कि कार्यक्रम 14 अक्तूबर को होना था और इसकी अनुमति ली गई थी। लेकिन 13 की शाम में प्रशासन ने कहा कि हम यह कार्यक्रम नहीं कर सकते। आशुतोष का आरोप है कि कार्यक्रम के सहभागियों पर जो लोग हमले करने आए थे उनके पास विश्व हिंदू परिषद का बैज था। उनके हाथों में लाठियां, पुतला और पेट्रोल था। बहुत से लोगों के हाथों में मंदिरों में रखी जाने वाली तलवारें थीं। कार्यक्रम में शिरकत कर रहीं महिला पत्रकार के साथ भी हाथापाई और दुर्व्यव्हार किया गया। कुमार ने कहा कि नास्तिकता कोई अपराध नहीं, यह हमारा संविधानप्रदत्त अधिकार है। साथ ही, ऐसे सम्मलेनों का आयोजन भी हमारा संविधानप्रदत्त अधिकार है।

वहीं जलेस ने आरोप लगाया कि हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों ने मथुरा प्रशासन को मजबूर किया कि वह देश के कोने-कोने से आए इसके भागीदारों को परेशान करे, उन्हें होटलों में रहने की जगह न मिले और डराने-धमकाने से लेकर मारने-पीटने तक की कार्रवाइयों से उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जाए। सम्मलेन स्थल पर तोड़-फोड़ करते हुए उन्होंने इस आयोजन को प्रतिबंधित करने की मांग की और जैसा कि इन दिनों हर अवसर पर देखा जा रहा है, जिला प्रशासन ने हंगामे की आशंका को देखते हुए आयोजकों को अपना आयोजन रद्द करने की घोषणा करने पर मजबूर किया। संजीव कुमार ने कहा कि यह केंद्र में सत्तासीन भाजपा और उसे निर्देशित करने वाले संगठन आरएसएस का फासीवादी रवैया है जो कला, संस्कृति और विचार-विमर्श की दुनिया में उठ रही आलोचनात्मक आवाजों को कुचल देना चाहता है। 14 अक्तूबर को ही उदयपुर में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के आयोजन स्थल की बुकिंग को कुछ घंटे पहले रद्द करना भी ऐसी ही कार्रवाई थी।

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