बिहार के बाद अब UP में भी बनेगा आरक्षण मुद्दा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सभी प्रमुख दल रणनीति बनाने में जुट गए हैं। चुनाव में यों अभी एक साल का समय है, पर सियासी दलों की तैयारी अभी से शुरू हो गई है।

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आरक्षण पर सियासी दलों की तैयारी अभी से शुरू

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सभी प्रमुख दल रणनीति बनाने में जुट गए हैं। चुनाव में यों अभी एक साल का समय है, पर सियासी दलों की तैयारी अभी से शुरू हो गई है। जहां तक भाजपा का सवाल है, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सूबे में विशेष दिलचस्पी है। आखिर वे सूबे के वाराणसी से सांसद हैं और दिल्ली में भाजपा की सरकार बनवाने में उत्तर प्रदेश का सबसे अहम योगदान रहा है। भाजपा ने यहां 80 में से 73 लोकसभा सीटें जीत कर सबको हैरान कर दिया था।

भाजपा जहां अगड़े, पिछड़े और दलित मतों को लोकसभा चुनाव की तर्ज पर हिंदुत्व के बहाने गोलबंद रखने की कोशिश में है, वहीं सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी अखिलेश सरकार की चार साल की उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार में जुट गई है। हालांकि माहौल खराब कानून व्यवस्था के कारण पार्टी के खिलाफ ही दिख रहा है। बिहार चुनाव में भाजपा को सफलता मिल जाती, तो यूपी में भी वही सपा का विकल्प बन सकती थी। लेकिन बिहार के नतीजों ने यूपी में बसपा को संजीवनी दी है। लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता भले न खुल पाया हो, पर विधानसभा में मायावती सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही हैं।

यूपी की सियासत में अभी सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस का ही मुख्य जनाधार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजित सिंह के रालोद का भी प्रभाव है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते हैं कि उनके सूबे की तरह यूपी में भी भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव न हो। मगर यहां सपा और बसपा में तालमेल करीबन असंभव है। कांग्रेस ने बसपा से तालमेल की कोशिश की थी पर मायावती ने चुनाव पूर्व गठबंधन से इनकार कर दिया। भाजपा चुनावी रणनीति के कारण ही अभी तक पार्टी का नया सूबेदार तय नहीं कर पाई है। मौजूदा सूबेदार लक्ष्मीकांत वाजपेयी का तीन साल का कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका है। चर्चा है कि सूबे में पिछड़ों की प्रमुखता को देखते हुए किसी पिछड़े नेता को पार्टी की कमान सौंपने पर विचार चल रहा है।

मायावती की सक्रियता बिहार के चुनावी नतीजों के बाद बढ़ी है। वे तभी से दिल्ली के बजाए लखनऊ में डेरा डाले हैं। इस बार 15 जनवरी को अपना जन्मदिन भी उन्होंने लखनऊ में ही मनाया। लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं को वहां आने की मनाही थी। इसके बजाय उन्हें अपने-अपने इलाके में ही जन्मदिन मनाने की हिदायत थी। मकसद जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाना और मतदाताओं को यह संदेश देना था कि सपा का विकल्प बसपा ही बन सकती है।

जहां तक आरक्षण के मुद्दे का सवाल है, मायावती लगातार कह रही हैं कि भाजपा का आंबेडकर प्रेम छलावा है। असल में तो भाजपा आरक्षण के खिलाफ है। सूबे के पूर्व मंत्री और कद्दावर यादव नेता अशोक यादव का कहना है कि भाजपा ने तो चौदह साल पहले ही आरक्षण से छेड़छाड़ की असंवैधानिक कोशिश की थी, जो यादव ने सफल नहीं होने दी। राजनाथ सिंह सरकार में मंत्री रहते हुए भी यादव ने अपनी ही सरकार के आरक्षण से छेड़छाड़ के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। नतीजन राजनाथ सिंह ने उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट से बाद में फैसला यादव के पक्ष में ही आया था। अशोक यादव सूबे के अकेले यादव नेता हैं जिन्होंने मुलायम सिंह यादव के यादव वोट बैंक का पहली बार बंटवारा किया था। 1993 में वे शिकोहाबाद में मुलायम के मुकाबले कांग्रेस के उम्मीदवार थे। तभी खुलासा हुआ कि मुलायम कमरिया हैं और अशोक घोसी। उन्होंने एटा, मैनपुरी, फिरोजाबाद और इटावा जैसे यादव बहुल जिलों में मुलायम को टक्कर दी तो 1996 में मुलायम शिकोहाबाद छोड़ बदायूं चले गए। उधर, अशोक यादव को अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा में ले लिया। 1996 में वे भाजपा टिकट पर शिकोहाबाद से मुलायम के उम्मीदवार को हरा कर जीते भी थे। 2007 में तो उन्होंने यही सीट निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से जीत कर सबको चौंका दिया था।

अशोक यादव पिछले काफी समय से बसपा सुप्रीमो मायावती की पैरोकारी कर रहे हैं। 2009 में उन्होंने मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई भरथना विधानसभा सीट के उपचुनाव में बसपा के उम्मीदवार शिव प्रसाद यादव को जिता दिया था।
शिव प्रसाद ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि मुलायम के गढ़ में वे अशोक यादव के समर्थन के कारण ही जीत पाए। उनका दावा है कि मौजूदा हालात में सूबे में बसपा की जीत तय लग रही है। वे इसका कारण मायावती के राज में रही बेहतर कानून व्यवस्था को मानते हैं।

बकौल यादव बिहार में जिस तरह एक वक्त मुसलमान और यादव दोनों ही लालू का साथ छोड़ गए थे उसी तरह यूपी में भी मुसलमान अब सपा का साथ नहीं देंगे। वे समझ चुके हैं कि अंदरखाने सपा की भाजपा से साठगांठ है। इसीलिए दोनों सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दे रहे हैं।

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