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बालिग को अपने पसंदीदा शख्स के साथ रहने का अधिकार- HC

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का अधिकार सबसे बुनियादी अधिकार है।

बालिग को अपने पसंदीदा शख्स के साथ रहने का अधिकार- HC
कोर्ट ने माना कि लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा हमारे समाज में आ गई है और यह स्वीकार कर ली गई है। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस फाइल)

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि देश के हर बालिग इंसान को अपनी पसंद के इंसान के साथ रहने की पूरी आजादी है। उसे रोका नहीं जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी रिश्तेदार या निकट संबंधी उसे ऐसा करने से रोक नहीं सकता है। अगर कोई रोकता है तो कोर्ट को उसकी सुरक्षा करने का आदेश जारी करना चाहिए। अदालत लिव-इन कपल द्वारा सुरक्षा की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

कपल ने अपने रिश्तेदारों से अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताई थी। इसमें पुरुष पहले से शादीशुदा था, हालांकि वह अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना याचिकाकर्ता महिला के साथ रह रहा था। उन्होंने 13 सितंबर को सुरक्षा की मांग करते हुए पंजाब पुलिस से संपर्क किया था, लेकिन अधिकारियों ने उनके आवेदन पर अब तक कोई फैसला नहीं किया था।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के जस्टिस विकास बहल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का अधिकार सबसे बुनियादी अधिकार है। जस्टिस बहल ने प्रदीप सिंह बनाम हरियाणा राज्य में इसी उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया। उस केस में एक लिव-इन कपल को सुरक्षा प्रदान करते हुए, कोर्ट ने देखा था कि लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा हमारे समाज में आ गई है और महानगरों में इसे स्वीकार कर लिया गया है।

जस्टिस बहल ने कहा, “इस प्रकार, इस कोर्ट का विचार है कि भले ही याचिकाकर्ता “लिव इन रिलेशनशिप” में रह रहे हों, वे जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के हकदार हैं।” कोर्ट ने पंजाब पुलिस को कपल की सुरक्षा की मांग करने वाले आवेदन पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का आदेश दिया, ताकि उन्हें खतरे की धारणा का आकलन किया जा सके।

जस्टिस बहल ने कहा “प्रत्येक इंसान, विशेष रूप से बालिग, को अपनी पसंद के इंसान के साथ अपना जीवन जीने का अधिकार है। किसी भी स्थिति में, जब कोर्ट को यह महसूस हो, कि प्रथम दृष्टया, कुछ रिश्तेदार या अन्य लोग उनके संबंधों से नाखुश होने के कारण, उनके जीवन और स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो ऐसी स्थिति में, कोर्ट को उनकी सुरक्षा के आदेश पारित करने की जरूरत होती है।”

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First published on: 28-09-2022 at 05:53:00 pm
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