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उच्च फैसला: संकट में आप

दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (आप) के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के दिल्ली सरकार के फैसले को रद्द करके आप को संकट में डाल दिया है।

Author नई दिल्ली | Published on: September 9, 2016 2:05 AM
केजरीवाल की बढ़ी मुश्किल

दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (आप) के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के दिल्ली सरकार के फैसले को रद्द करके आप को संकट में डाल दिया है। इससे इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने पर फैसला लेने में चुनाव आयोग को आसानी हो सकती है। चुनाव आयोग ने मामला सुनवाई के बाद इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने का फैसला सुरक्षिता रखा था। आयोग अपनी सिफारिशें किसी भी दिन राष्ट्रपति को भेज सकता है। इन विधायकों की सदस्यता रद्द होने से भी दिल्ली सरकार बहुमत में रहेगी लेकिन चौतरफा संकट झेल रही आप में भगदड़ मचने के आसार हैं। दिल्ली के बूते पंजाब विधान सभा जीतने का सपना देख रही आप इस मौजूदा संकट को झेलने के लायक नहीं लग रही।

सेक्स सीडी कांड, पार्टी में बगावत और पंजाब फूट, नेताओं पर गंभीर आरोप और आप में शामिल होने वाले नेताओं बदले सुर से पार्टी सदमें में है। इधर कानूनों में संशोधन बिना 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के अरविंद केजरीवाल के फैसले के खिलाफ विपक्ष नैतिकता के आधार पर उनसे इस्तीफा मांग कर रहा है और यही दबाव इन विधायकों पर भी है। संविधान के जानकार लोक सभा और दिल्ली विधान सभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा कहते है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब ये 21 विधायक संसदीय सचिव नहीं रह पाएंगे, इसी आधार पर चुनाव आयोग भी उन्हें विधायक नहीं रहने देगा। संभव है सदस्यता जाने के बाद ये सदस्य इसे सुप्रीम कोर्ट में यह कह कर चुनौती दें कि जब उनकी सदस्यता रद्द की गई तब वे हाई कोर्ट के आदेश से संसदीय सचिव नहीं थे। वैसे कानून के जानकार इसे ज्यादा दमदार आधार नहीं मानते। 15 मार्च 2015 को 21 विधायकों के संसदीय सचिव बनाने के बाद 19 जून को युवा वकील प्रशांत पटेल की ओर से राष्ट्रपति को याचिका देने के दूसरे ही दिन, आनन-फानन में मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर 24 जून को बिना केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति से संसदीय सचिवों के पद को लाभ के पद से अलग करने के विधेयक को पास कराया गया। जिसे राष्ट्रपति ने नहीं स्वीकार नहीं किया।

इससे पहले भी जिन राज्यों में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी गई है, उनमें ज्यादातर अदालत ने रद्द की है। दिल्ली के विधान में तो इसका कहीं जिक्र ही नहीं है। दिल्ली में शासन व्यवस्था का संचालन चार चीजों से चलता है- भारत का संविधान (अनुच्छेद 239 एए और अनुच्छेद 239 एबी), संसद की ओर से पारित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र शासन अधिनियम, 1991, राष्ट्रपति द्वारा पारित कामकाज की नियमावली (ट्रांजेक्शन आॅफ बिजनेश रूल्स) और कार्य आबंटन नियम और विधान सभा के कामकाज में विधान सभा द्वारा पारित नियमावली। इन चारों में कहीं भी संसदीय सचिव का उल्लेख नहीं है।

विधान सभा ने 1994 में मंत्रियों और विधायकों के वेतन-भत्ते के विधेयक पास किए, जिसका समय-समय पर संशोधन होता रहता है। 2001 में विपक्ष के नेता और 2004 में मुख्य सचेतक को वेतन-भत्ते देने वाला विधेयक विधान सभा ने केंद्र की स्वीकृति से पास किए। दिल्ली को विधान सभा देने वाले संविधान के संशोधन में ही 70 सदस्यों वाली विधान सभा में मुख्यमंत्री समेत सात सदस्यी मंत्रिमंडल बनाए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा विधान में ही दिल्ली महिला आयोग और दिल्ली खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष के पद को भी लाभ के पद से अलग रखा गया है।

बाद के दिनों में शासकीय आदेश से जिला विकास समितियों के अध्यक्ष, दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष आदि पदों पर विधायकों की नियुक्ति को भी लाभ के पद से अलग करने का विधान बनाया। लेकिन संसदीय सचिव के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ। 1993 में दिल्ली में विधान सभा बनने के बाद से अब तक 202 विधेयक पास किए गए हैं उनमें से एक भी विधेयक पास होने से पहले की तारीख में लागू कराने की कोशिश नहीं की गई। जिस तरह चुनाव आयोग ने सुनवाई की उससे ही इसका खतरा ज्यादा था कि इन 21 विधायकों की सदस्यता खत्म होगी। अब हाई कोर्ट के फैसले बाद तो आप पर संकट और ज्यादा बढ़ गया है।

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