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‘आप’ के तीन साल: चश्मा नया, नजर और नजरिया पुराना

सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर मुख्यमंत्री व उनके मंत्री मीडिया के सवालों से तो बच ही गए, विपक्ष द्वारा पूछे जाने वाले सवालों पर भी चुप्पी साध गए। सवाल तो कई थे, लेकिन जवाब नहीं मिले।

Author February 15, 2018 05:29 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

अजय पांडेय

सूबे में आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की तीसरी वर्षगांठ के मौके पर बुधवार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चश्मा भले नया पहन रखा था, लेकिन मुद्दों को देखने की उनकी नजर व नजरिए में किसी किस्म का नयापन नहीं था। पहले की तरह ही वे चतुराई से उन चुभते सवालों से कन्नी काट गए जो उनकी हुकूमत को लेकर दिल्ली में पूछे जा रहे हैं। नई दिल्ली नगरपालिका परिषद के सम्मेलन केंद्र में बमुश्किल जुटी 400 समर्थकों की भीड़ की तालियों की गड़गड़ाहट से मुख्यमंत्री का चेहरा बार-बार दमक रहा था, लेकिन बीते तीन साल में अपनी सरकार की उपलब्धियों की जो फेहरिस्त उन्होंने पेश की वह दिल्ली की हकीकत के आगे बेमेल मालूम पड़ी।

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपनी नाकामियों का ठीकरा एक बार फिर से केंद्र सरकार के सिर फोड़ा। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि उनकी सरकार जो कुछ नहीं कर पा रही है, उसके लिए वे या उनके मंत्री नहीं, बल्कि केंद्र सरकार जिम्मेदार है क्योंकि वह इनको काम ही नहीं करने देती। उपराज्यपाल फाइल दबाकर बैठ जाते हैं। उन्होंने इस बात पर चर्चा नहीं की कि आखिर तमाम नियमों व कानूनों को ताक पर रखकर उन्होंने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बना दिया? केजरीवाल ने यह नहीं बताया कि उन्होंने शुरुआती डेढ़ साल तक सरकार की फाइलें उपराज्यपाल को क्यों नहीं भेजीं? वह यह भी जवाब नहीं दे पाए कि उनकी सरकार राजनिवास और तमाम अधिकारियों से लड़ती क्यों रही? केजरीवाल ने दावा किया कि पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा गठित की गई शुंगलू कमेटी उनकी सरकार के खिलाफ कोई गड़बड़ी नहीं ढूंढ पाई लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार ने सरकार के विज्ञापनों पर 526 करोड़ रुपए का जम्बो बजट क्यों तय किया।

केजरीवाल ने दावा किया कि उनकी सरकार ने कई फ्लाइओवर का काम कम पैसे में पूरा किया। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि ये सारे फ्लाइओवर शीला सरकार में शुरु हुए और इन्हें कम पैसे में पूरा करने के लिए इनकी मूल योजना को ही बदल दिया गया। आखिर एक-एक कर तमाम पुराने साथी उन्हें छोड़कर क्यों चले गए। गोवा से लेकर पंजाब तक और गुजरात से लेकर दिल्ली के अपने गढ़ में ही उनकी पार्टी को शर्मनाक हार का सामना क्यों करना पड़ा। बहरहाल, उनके तेवरों से साफ हो गया कि 20 विधानसभा क्षेत्रों में संभावित उपचुनाव में उनकी पार्टी पहले की तरह इस बार भी अपनी नाकामियों का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़कर बिजली-पानी का राग अलापेगी।

हवा में तैरते रहे सवाल

सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर मुख्यमंत्री व उनके मंत्री मीडिया के सवालों से तो बच ही गए, विपक्ष द्वारा पूछे जाने वाले सवालों पर भी चुप्पी साध गए। सवाल तो कई थे, लेकिन जवाब नहीं मिले। मसलन, उन्होंने नहीं बताया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर सत्ता हासिल करने वाली उनकी सरकार के आधे से ज्यादा मंत्री अलग-अलग किस्म के भ्रष्टाचार में कैसे और क्यों लिप्त हो गए। उनके दो-दो मंत्रियों पर सीबीआइ ने मुकदमा दर्ज कर रखा है इसके बावजूद वे सरकार में कैसे बने हुए हैं। उनसे पूछा गया कि शिक्षा के क्षेत्र में अगर उनकी सरकार इतना ऐतिहासिक काम कर रही है तो प्री बोर्ड परीक्षा में सरकारी स्कूलों के 70 से 90 फीसद बच्चे कैसे फेल हो गए? आखिर सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम क्यों होती जा रही है। उनकी सरकार में 98 हजार बच्चों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिया इस सवाल का जवाब न मुख्यमंत्री ने दिया और न ही उनके शिक्षा मंत्री ने। स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोहल्ला क्लीनिक को क्रांतिकारी परिवर्तन बताने वाली सरकार 111 डिस्पेंसरी बंद होने का कारण नहीं बता सकी। महिलाओं की 181 हेल्पलाइन क्यों बंद हो गई और डीटीसी के यात्रियों में रिकार्ड 54 करोड़ की कमी कैसे आ गई। इसका जवाब भी उनके पास नहीं था।

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